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Showing posts from July, 2020

।।शव्द।।

                      || शब्द|| पहले आदिधर्मी सी सदाबो फिर नेह कलंक बन जावो, सदियां दे रूल्दे जाग पवो हुण नहीं पाछे पछतावो|| जिधरों आए असीं कढ दियाँगे जिन्ह हमें दबाबो|| आदि मुल्क दे वसिंदियाँ नूं तंगियाँ बाहरों आए ऐश उड़ावो|| हक भी दवाया बथेरा जोर लगाया पल्ले कुछ ना पावो,  खानपान ते असीं दुखी हो गए, पेश साडी कोई ना जावो || जिधर किधर है दूरकार पैंदी नक पर स्वास डाकू खाबो|| घास साग लकड़ी दी मनाही खानाबदोस करावो|| कचेहरियाँ दे विच कोई ना दर्दी साडा खून जवत {खत्म}हो जावो|| जेहड़े साडे हो गए बडे बड़े लीडर झोली चक बण जावो || कदे कांग्रेसी, कदे अंग्रेजी बुलावो, कौम का दर्दी वणिआ ना कोई, सारे अपनी ऐश उड़ावो|| ईशरदास नेह कलंकी बण बोले, हुण सारे डंका फतेह बजावो||  शव्द  गुरु आदि प्रगाश के गुण गावो रे, जेहड़ा सचड़ा ग्रंथ सदावो रे|| कलियुग बितिया हुण जो युग बणिया सतयुग सदावो, कलियुग दे अंत विच लग लड़ी सतयुग बुलावों रे || हुण वेद पुराण सब मिट जावो, इस सतयुग दा हुण धर्म ग्रंथ आदि प्रगाश कहावो रे || दुए दी वस्तु वल धियान ना धरना, इस युग दा...

।।गुरु रविदास महाराज के गुरु परम ब्रह्म।।

।।गुरु रविदास महाराज के गुरु परम ब्रह्म।। गुरु रविदास जी के समूचे जीवन को ही भ्रामक बनाने में ब्राह्मणों ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी, मगर उन्हीं के भाई, बाँधब सिखों ने भी सारी सीमाएं तोड़ रखी हैं। गुरु जी को ब्राह्मणों ने पिछले जन्म का ब्राह्मण सिद्ध किया, गुरु जी को अगले जन्म चमार बनाया, रामानंद ब्राह्मण का शिष्य बनाया, जबकि गुरु रविदास जी स्वयं अपनी वाणी में अपने गुरु के बारे में लिखा जो गुरु ग्रँथ साहिब के पृष्ठ 346 पर भी सुनहरे शव्दों में अंकित हैं कि:--- पार कैसे पाईवो रे। मो सऊ कोऊ ना कहि समझाऊ। जा ते आवागण बिलाई।।रहाउ।। गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे परमेश्वर! मैं भवसागर से किस प्रकार, पार जा सकता हूँ अर्थात इस संसार रूपी समन्दर के किनारे पर किस प्रकार पहुँच सकता हूँ अर्थात हे आदपुरुष! आपके रहस्य को किस तरह समझूं। मुझे कोई भी, इस गुप्त रहस्य को नहीं समझा सका है, जिससे आवागमन समाप्त हो जाए अर्थात जन्म मरण का बंधन खत्म हो जाए। इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि उन के समय में, उनके लायक कोई भी गुरु नहीं था, जिसमे रामानंद, परमानंद सभी शून्य हो गए हैं। गुरु रविदास जी अपने गुरु ...

गुरु रविदास और वैदिक साहित्य की निःसारता।।

।।गुरु रविदास और वैदिक साहित्य की निःसारता।। गुरु रविदास जी महाराज ने, वैदिक शास्त्रों का गंभीर आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए, उनकी वास्तविकता को, सारे विश्व में उजागर करने का जोखिम भरा ऐतिहासिक उद्यम किया है, जिसके लिए उन्होंने अनेकों परेशानियां सहन कीं थी। वैदिक साहित्य की अश्लीलता से समाज वहुत विकृत हुआ है, जो जो कारनामे, तेती करोड़ देवी और देवताओं ने किए हैं, उन्हें पढ़ कर, सुन कर सिर शर्म से झुक जाता है। इस साहित्य पर कोई भी स्त्रियों,वहू-बेटियों, माताओं-बहनों के साथ बैठकर चिंतन नहीं कर सकता। हिन्दू फिर भी बड़े गर्व से, वैदिक साहित्य को ही प्रभु प्रदत ज्ञान सिद्ध करते नहीं थकते हैं, आज विज्ञान के इरा में भी इन्हें आदर्श साहित्य मानकर, अखबारों रेडियो दूरदर्शन पर दिखाते फिरते हैं, इन्हीं देवियों देवताओं के नकारात्मक हरकतों, विचारों, छलात्मक पैंतरों को भावी नागरिकों को पढ़ाया और समझाया जाता है, जिस से वच्चों की मानसिकता भी विकृत होती जा रही है, वही देवी देवताओं के चारित्रिक गुण सीख कर, भारतीय समाज को दूषित करने का नकारात्मक ज्ञान हासिल करते जा रहे हैं। सड़कों पर युवा, लड़कियों को मशख्रियाँ ...

61।।डाक्टर भीमराव आंबेडकर का जबाब।।

 डाक्टर भीमराव अंवेदकर का जबाब:-----डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने बहस में बोलते हुए ,लार्ड लोथियन और हिन्दू मैंबरों को बताया कि,पंजाब आदिधर्म मंडल के नेताओं ने जो जो किताबें बहस में पेश की हैं, ये सारी आप की ही हिन्दू यूनिवर्सिटी बनारस और इलाहाबाद द्वारा छापी हुई हैं, इसलिये जो कानून इन किताबों में लिखे हैं,वही हमने यहां बताए हैं, जिनके आधार पर हिन्दू अछूतों पर अत्याचार करते आए हैं।ये सत्य पर ही आधारित हैं। डाक्टर भीमराव अंवेदकर का लाला रामदास से सवाल:----–लाला रामदास जी आपने अपने दयानंद दलित उद्धार मंडल की ( रिपोर्ट की प्रति उछालते हुए) रिपोर्ट में ये लिखा हुआ है,कि पंजाब में करीब बाईस लाख आदमी ऐसे निवास करते हैं,जिनके साथ हिन्दू , कुत्ते बिल्ले जैसा सलूक करते हैं, वे कौन हैं? ये क्या अच्छूतों के बन्दे नहीं हैं? क्या ये किसी दूसरे देश से किराए पर लाए गए हैं? बताओ ,आप की संस्था के प्रधान कौन हैं? लाला रामदास की ओर से जबाब:-----जिस रिपोर्ट के बारे में कहा गया है,वह हमारी ही संस्था है,इस संस्था के प्रेजिडेंट लाला देवी चंद हैं, जो जाति के हिन्दू हैं, मैं उस संस्था का महासचिब हूँ।जो जो प...

60।।लार्ड लोथियन और डाक्टर भीमराव अंवेदकर।।

 ।।लार्ड लोथियन और डाक्टर भीमराव अंवेदकर।। चार मार्च सन 1932 को फ्रेंचाइज कमेटी ने सभी धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता शुरू कर दी। लार्ड लोथियन के आदेशानुसार पुलिस ने आंदोलनकारियों को छाया में बैठा दिया।मंगूराम जी अध्यक्ष पंजाव आदिधर्म मण्डल, महासचिब हजारा राम बीडीओ, मिस्त्री लभूराम, सेठ सुंदर दास,भगत गुलाबा राम, श्री गणेश दलपति, सन्तराम आजाद, हकीम प्रताप चंद, हरनाम दास जंडाली, श्री साहिबा राम, खड़कू राम जमादार, किरपा राम जी, सुंदर सिंह, गुरदित जी, लाल चंद, पूर्ण चंद रमता, भुल्ला सिंह फौजी असेंबली हाल में चले गए। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई धर्मों के प्रतिनिधियों से वही सवाल पूछे जिन की कल्पना डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने की थी।लोथियन ने सभी से पूछा, कि आप कौन हैं, आप का धर्म क्या है, आपके अवतार कौन कौन हैं, आपके धर्म ग्रँथों के क्या नाम हैं और अपने अपने धर्म ग्रँथ भी दिखाओ, आपके ध्यान लगाने वाले पवित्र शव्द क्या क्या हैं। सभी ने ये उतर बड़ी आसानी से दे दिए।उनके बाद मंगू राम जी से भी लोथियन ने सवाल पूछने शुरू किये। पहला सवाल:----आप कौन हो? जबाव हम आदिधर्मी है। लोथियन का सवाल। ...

59।।स्वामी अच्छूतानंद, स्वामी ईशरदास और मंगूराम मुगोवाल।।

।।स्वामी अच्छूतानंद, स्वामी ईशरदास और मंगू राम मुगोवाल।। स्वामी ईशरदास जी महाराज के, आदेशानुसार, साहिवे कलाम मंगूराम मुगोबाल ने भारत रत्न डाक्टर भीमराव से मन्त्रणा करके लुधियाना में सन्त सम्मेलन की रुपरेखा बना ली। साहिवे कलाम मंगूराम मुगोवाल ने सबसे पहले स्वामी ईशरदास जी महाराज से सन्त सम्मेलन के बारे में विचार विमर्श किया, उन्होंने स्वामी ईशरदास जी को बताया, कि धर्म ग्रँथ के बिना लोथियन कमेटी के सामने हम जीत नहीं सकेंगे, इसीलिये सन्त सम्मेलन में जनमत लेकर ही हम ग्रँथ को सरकार से मान्यता भी ले सकेंगे और ब्रिटिश सरकार को सबूत भी प्रस्तुत कर सकेंगे। उतर प्रदेश कानपुर से स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज को भी सन्त सम्मेलन में शिरकत करने के लिये भी निमंत्रण पत्र भेजा गया। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, मंगूराम जी के प्रयासों से वहुत ही आह्लादित हो उठे और वे आंदोलन की सफलता पर भरोसा करने लगे। स्वामी अच्छूतानंद जी भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंवेदकर की शिक्षा और तार्किक बुद्धि और मंगू राम मुगोवाल जी के तत्कालिक निर्णयों के कायल थे। वे समझ रहे थे, कि अछूतों का भविष्य, उज्ज्वल होता जा रहा है। स्वामी अच्...

58।। स्वामी अच्छूतानंद और साइमन रिपोर्ट।।

।।स्वामी अच्छूतानंद और साइमन रिपोर्ट।। 13 साईमन कमीशन की रिपोर्ट पर चर्चा करने केलिये ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने बारह नबंबर सन 1930 को लन्दन में गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई जिसमें मुस्लिम कायदे आज़म सर आगा खान, मुहंम्मद अली जिन्नाह, मौलवी फजल हक, सर मुहंम्मद शफी, हिंदू महासभा की ओर से बी एस मुन्जे, एम आर जयकर, लिबरल फ्रंट की ओर से तेज वहादुर सप्रू, सी वाई चिंतामणी, श्री निवास शास्त्री, सिखों की ओर से सरदार उज्ज्वल सिंह, अवसादग्रस्त वर्ग की ओर से डाक्टर भीमराव अंवेदकर, रियासतों और राज्यों की ओर से अक़ीद हैदरी, मिर्जा इस्माइल,महाराजा भूपेंद्र सिंह, सयाजी राव गायकबाड़, हरिसिंह, गंगा सिंह, हम्मी दुल्ला खान, के एस रणजीत सिंह, जयसिंह प्रभाकर ने भाग लिया। ये सम्मेलन तेरह जनबरी1931 तक चला। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय लोकतंत्र की स्थापना केलिये मुख्यतः सँविधान मसौदे पर ही अधिक चर्चा की। सरकार को भारत के अलग अलग फिरकों की जानकारी और उनकी समस्याओं के बारे में साईमन ने सरकार को रिपोर्ट में लिख कर दिया था जिसपर भी चर्चा शुरू हुई जिससे हिन्दू मुस्लिम नेता आहत हो गए क्योंकि ये लोग अछूतों के बारे में कोई वार्ता कर...

57।।स्वामी अच्छूतानंद और प्रथम गोलमेज सम्मेलन।।

।।स्वामी अच्छूतानंद और प्रथम गोलमेज सम्मेलन।। भारत मे उथल पुथल का दौर जारी था।भगत सिंह राजगुरु सुखदेव की फांसी से अंग्रेजों को मुशीबत खड़ी हो चुकी थी।जनता भी स्वतंत्रता प्राप्ति केलिये बेचैन होती जा रही थी।ब्रिटिश सरकार ने असन्तोष को दबाने केलिये भारत को आजाद करने के फीलर छोड़ने शुरू कर दिए,जिस की प्रथम कड़ी में ,ब्रिटिश सरकार ने सँविधान तैयार करने केलिये भारतीय नेताओं को खंगालने केलिये प्रयास शुरू किए।सन 1927 को ब्रिटिश सरकार ने भारत केलिये भावी सँविधान मसौदा तैयार करने की योजना बनाई,जिसके लिये लार्ड जान साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन की घोषणा की, जिसे साईमन कमीशन के नाम से पुकारा गया। साईमन कमीशन के बारे में जब भारत के हिन्दू मुस्लिम नेताओं और राजाओँ महाराजाओं को पता चला तो वे भी अपनी अपनी गोटियां फिट करने लगे।हिंदुओं का प्रतिनिधित्व मिस्टर गांधी और मुस्लिमों का नेतृत्व मुहंम्मद अली जिन्नाह कर रहे थे, पंजाब के मंगूराम मुगोबाल ने 11/12 जून सन 1926 को पंजाब आदिधर्म मंडल की स्थापना करके सारे भारत के अछूत नेताओं से सम्पर्क स्थापित कर लिया था और सवर्ण षड़यंत्र के खिलाफ आंदोलन भी शुरू कर दि...

56।।।। स्वामी अच्छूतानंद का विरोधी विहारी।।

।।स्वामी अच्छूतानंद जी का विरोधी विहारी।। आर्य हिंदुओं की नीति आमने सामने युद्ध करने की कभी नही रही, ये लोग छल बल से दुश्मन को मित्र बनाकर दुश्मन से दुश्मन को मरवाते आए हैं,जिसे मैं तो घात की नीति कह कर ही संबोधित करता हूँ।हिंदुओं ने कभी भी शहीद होने का प्रयास नही किया, कहीं कोई सावधानी बरतने में लापरवाही से कोई मर गया तब भी उसे अमर करने केलिये उसे शहीद की मान्यता दे दी है।इतिहास साक्षी है कि जितने युद्ध हुए उसमे अधिकतर भारत के मूलनिवासी ही शहीद हुए हैं फिर भी उनका कहीं इतिहास में नाम हिन्दू लेखकों, इतिहासकारों ने लिखने की जहमत नही उठाई।ना ही मीडिया ने कभी सत्य और ईमान के रास्ते पर चल कर हमारे अवतारों, महापुरुषों के साथ न्याय किया है। स्वामी अच्छूतानंद महाराज जब तक ब्राह्मणवाद के पक्ष में काम करते रहे, तब तक तो वे उनके आंख के तारे बने रहे मगर जब उन्हें ज्ञात हो गया कि ये हिन्दू ,स्कूलों में अछूत वच्चों के साथ छुआछूत करके, नफरत भरा व्यवहार करते हैं, छात्रों के साथ ब्राह्मण टीचर अमानवीय व्यवहार करके स्कूल छोड़ने केलिये विवश करते हैं, कुत्तों, विल्लों की तरह नालू से पानी पिलाते हैं, तब ...

55।।स्वामी अच्छूतानंद जी का चार बाग सम्मेलन।।

।।स्वामी अच्छूतानंद जी का चार बाग सम्मेलन।। ब्राह्मणवाद वहुजन मुक्ति की बात कभी नहीं करता था, ना ही अब करता है औऱ ना ही कभी भविष्य में करेगा,जिसके लिये वहुजन को ही, वहुजन समाज की मुक्ति केलिये सँघर्ष करना था,इसीलिये पंजाब में साहिब मंगूराम मुगोवाल, अध्यक्ष पंजाब आदिधर्म मंडल, कानपुर में स्वामी अच्छूतानंद जी,आदि हिन्दू आंदोलन, आंध्रा में, आदि आंध्रा आंदोलन, आदि कर्नाटक आंदोलन ,वहुजन समाज के राजनैतिक आंदोलन चल रहे थे। 29 सितंबर 1928 को लार्ड साईमन भारत में भारतीयों की सामाजिक व्यवस्था का आकलन करने केलिये ब्रिटिश सरकार ने भेजा गया।लाहौर से उसने जनता से संपर्क शुरू किया, इसी यात्रा में साहिब मंगूराम मुवोबाल ने सबसे पहले पंजाब में अछूतों की दुर्दशा के बारे में साईमन को लाहौर में अपने आदिधर्म मंडल के नेताओं के साथ ज्ञापन देकर जानकारी दी थी।उसके बाद साईमन उतर प्रदेश केलिये रवाना हुए जहां स्वामी अच्छूतानंद जी ने लखनऊ के ऐतिहासिक चार बाग में लार्ड साईमन से मिलने की तैयारी की हुई थी। ।। चार बाग की महत्ता।। लखनऊ के चार बाग का आकर्षण अपने आप में अनूठा ही है।लखनऊ जंक्शन की ये भव्य इम...

54।।स्वामी अच्छूतानंद और कांग्रेसी स्वराज आंदोलन।।

।।स्वामी अच्छूतानंद और कांग्रेसी स्वराज आंदोलन।। साहिब मंगूराम मुगोबाल औऱ स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, वहुजन समाज की दोहरी गुलामी की बेड़ियों को काटने केलिये सिरधड़ की बाजी लगाए हुए थे।वहुजन समाज विदेशी शासकों की गुलामी के साथ हिंदुओं की गुलामी को सहन करता आ रहा था जिससे मुक्ति दिलाने केलिये वहुजन समाज सुधारकों ने ही बीड़ा उठाया हुआ था।हजारों वर्षों की अनपढ़ता औऱ दासता ने वहुजन समाज की राजनैतिक सोच को समाप्त कर रखा था।हिन्दू वहुजन समाज को अपने हथियार के रूप में अंग्रेजों और मुसलमानों के खिलाफ प्रयोग करते आए थे मगर अंग्रेजों ने वहुजन समाज के लिये शिक्षा प्राप्त करने के, जो रास्ते खोल दिये उससे वहुजन भी शिक्षा ग्रहण करने लगे।कुछ पढ़ लिखकर हिंदुओं की मानसिकता को समझने परखने लगे और मनुवादी षडयन्त्रों के खिलाफ विद्रोह करने पर उतारू हो गए। कांग्रेस स्वराज केलिये लड़ रही थी मगर अछूतों को गुलाम ही बनाए रखने केलिये अंदर ही अंदर षडयंत्र चला रही थी। अगर हम स्वतन्त्रता आंदोलन के इतिहास के पन्नों को खंगालें तो पता चलेगा कि,कहीं भी किसी भी अछूत नेता को इतिहास में किसी भी इतिहासकार ने कोई सम्मानजनक स्थान...

53।।स्वामी अच्छूतानंद महाराज पर हमले।।

 ।।स्वामी अच्छुतानन्द महाराज पर हमले ।। ब्राह्मनबाद की नीति ही गुंडागर्दी पर टिकी हुई है,जिसके सहारे भारत की सभ्यता,संस्कृति, शासन प्रशासन को मूलनिवासियों से छीना था।मूलनिवासी शासकों ने अहिंसा का मार्ग कभी नहीं छोड़ा और ना ही प्रकृति के नियमों को समझा,क्योंकि प्रकृति ने ताकतवर को ही जीने का हक दिया है।निर्बल को बलशाली अपनी ताकत से डरा कर अपनी सत्ता स्थापित करता आया है, जब वही सत्ताधीश निर्बल हो जाता है,तो उसे भी सत्ता छोड़ कर निर्बलों की पंक्ति में आना पड़ता है, शक्तिशाली की गुलामी स्वीकार करके जीवन बसर करना पड़ता है, मगर मूलनिवासी शासकों ने, इन नियमों की अनदेखी करके अपने मूलनिवासियों को आर्य हिंदुओं का गुलाम बनने दिया,जबकि इनकी बिसात ही छीनकर खाने और जीवन बसर करने की रही है।जो भी इनके रास्ते पर अड़चन बनने का प्रयास करता है उसे ये लोग अपने ही दुश्मन को उकसा कर,भड़का कर मरवाकर, उनमें आतंक फैला कर अपना उल्लू सीधा करता आया है, जबकि खुद शहीद होने से डरते हैं, ये लोग कभी भी नहीं मरते केवल कांटे से कांटे को ही निकाल कर जिंदा रहते आए हैं। स्वामी जी ने उत्तर प्रदेश में आदि हिन्दू आंदोलन शुरू क...

51।स्वामी अच्छूतानंद का मनुस्मृति अनुशीलन।।

अब स्वामी अछूतानंद जी मनुस्मृति के अध्ययन में जुट गए जिससे वे ब्राह्मणवाद के छलों ढोंगों आडंबरों को पूरी तरह जान गए जिसके खिलाफ युद्ध करने केलिये उन्होंने कमर कस ली।अध्ययन के बीच ही उनका कवित्व भी जाग गया और उन्होंने लिखा :---- वेद में भेद छुपाया था,हमें मालूम नहीं था। हाल पोशीदा रखा था,हमें मालूम नहीं था। मनु के सख्त थे कानून,हमें मालूम नहीं था। पढ़ना कतई मना था, हमें मालूम नहीं था। उपरोक्त पंक्तियों से स्पष्ट ज्ञात होता है कि स्वामी जी को मनस्मृतियों के काले ही नहीं अपितु पाशविक कानूनों के बारे में तनिक भी ज्ञान नहीं था।उनसे ये भेद छुपा कर रखा गया था और सत्यार्थ प्रकाश का ही उन्हें रंग चढ़ाया गया था। मनु के सख्त कानून जब मन मष्तिस्क में विचरण करने लगे तबउन्होंने, ये लिखा कि हमें इनके बारे पता नही था। आर्य समाज का भांडाफोड़:---स्वामी जी ने सत्य को जानकर जन आंदोलन खड़ा करने केलिये वैराग धारण कर लिया और मूलनिवासियों को मनुवाद के षड़यंत्र के प्रति, नवचेतना जागृत करने लगे।अपने समाज को समझाने लगे कि हम आदिवसी है, मूलनिवासी है, विदेशी आर्यो ने हमारा भारत छीन रखा है, कड़े कानून लागू करके तुम...

50।। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज का उदय।।

।।स्वामी अछूतानंद जी महाराज का उदय।। मनुस्मृति के शिकंजे में तड़फ रही मॉनवता को देखकर, आदिपुरुष से रहा नही गया और मॉनवता के दुश्मन आतताइयों ,अत्याचारियों को नकेल डालने केलिये सर्वप्रथम गुरु रविदास जी महाराज के रूप में अवतार लिया, उनके बाद कबीर जी ने प्रकट होकर मनुस्मृति के काले नियमों का अपनी अक्खड़, निर्मम वाणी से ब्राह्मणवाद को आहत करके मनुस्मृतियों को जख्मी किया जिससे दुखी होकर ब्राह्मणवाद ने उन्हें असंख्य कष्टों से पीड़ित किया मगर मनुवादी हर कदम पर उनसे बुरी तरह पराजित हुए और उनके समक्ष आत्मसमर्पण किया।इन्ही अवतारों के विद्रोह से प्रभावित होकर भावी पीढ़ियों ने भी उनके रास्ते पर चलकर उनका अनुशरण किया जिनमे,एक हुए स्वामी हरिहर अछूतानंद जी महाराज। उतर प्रदेश के गाँव सौरिख (फर्रुखाबाद ) में मोतीराम औऱ मथुरा प्रसाद दो भाई रहते थे। दोनों ही सेना में कार्यरत थे।मनुवादी आतंक के कारण वे गाँव उमरी तैसील सिरसागंज जिला मैनपुरी में अपने सुसराल आकर बस गए थे।यहीं पर मोतीराम के एक अत्यंत विलक्षण शक्ति ने बुद्ध पूर्णिमा के दिन सन 1879 को अवतार लिया जिनका नाम हीरालाल रखा गया।वच्चे का लालन पालन अत्यंत ...

49।।आदिधर्म मडल की स्थापना।।

।।आदिधर्म मण्डल की स्थापना।। साहिब मंगूराम मुगोबाल, गाँव मुगोबाल,समीप गढ़शंकर, पंजाब के निवासी थे।उनके पिता हरनाम दास चमड़े के व्यापारी थे।वे मंगू राम को अंग्रेजी की शिक्षा देना चाहते थे क्योंकि जब चमड़े की बिल्टी आती थी तो उसे पढ़ने में उन्हें मुश्किल हुआ करती थी।मंगू राम जी को जब छटी कक्षा में होशियारपुर के समीप उच्च विद्यालय बिजबाड़ा में प्रवेश दिलाया गया तो वहां टीचर ने भारी वारिश औऱ तूफान के बीच कमरे में घुसने पर,उन्हें पशुओं की तरह पिटाई की जिससे वे स्कूल नही गए और अमेरिका, नोकरी करने चले गए।वहां वे फल तोड़ने का काम करने लगे।एक दिन उनकी भेंट लालां हरदयाल जी से ही गई जो रास विहारी बोस के साथ ग़द्दर पार्टी में भारत को आजाद कराने केलिये समाज को तैयार कर रहे थे।पार्टी का अखबार गद्दर छपता था जिसके क्रांतिकारी लेखों ने साहिब मंगू राम को भी पार्टी के साथ जुड़ने केलिये विवश कर दिया।वे पार्टी कार्यालय में रास विहारी बोस के क्रांतिकारी भाषण सुन कर क्रांतिकारी बनते गए।उनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर उन्हें छापेखाने ने कंपोजिंग का कार्य भी दे दिया गया,जिससे उन्हें औऱ क्रांतिकारी लेखों, कविताओं क...

48।।ज़वामी अच्छूतानंद हरिहर और आदि हिन्दू।।

स्वामी अछूतानंद हरिहर और आदि हिन्दू। इतिहास साक्षी है, कि मानवता संपन्न साहित्य केवल भारत के मूलनिसियों ने ही लिखा है और सामाजिक परिवर्तन भी भारत के आदवंशी, वहुजन महासपुरुषों ने ही किया है। वैदिक युग में वेद, महाभारत वहुजन सपूत वेदव्यास ने ही लिखे, रामायण वाल्मीकि जी ने लिखा, उनके बाद, आज से छः साल पूर्व संपूर्ण ब्रह्मण्ड केलिये आदर्श सँविधान ही नहीं सर्वश्रेष्ठ धर्म ग्रँथ "पोथी साहिब" सन्त शिरोमणी गुरु रविदास जी महाराज ने लिखा, जिसके दहन के बाद मानवता के कल्याण केलिये धार्मिक ग्रँथ गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ स्वामी ईशरदास जी महाराज ने लिखा, स्वतन्त्रता के बाद भारत का सँविधान भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने लिखा। इसी संक्रमण काल में स्वामी अच्छूतानंद हरिहर जी ने भी पांच हजार साल के अंतराल के बीच विद्वता के धनी अछूतवंश, आदिवासी समाज में लेख, नाटक, कविता लिख कर अछूत समाज को पथ प्रदर्शित किया। आज के संदर्भ में यदि यह, कहा जाए कि शुद्र समाज मे वर्तमान लेखकों, नाटककारों औऱ कवियों की परंपरा अगर शुरू हुई है, तो केवल स्वामी अच्छूतानंद हरिहर से ही मानी जाएगी। साहिब मंगूराम जी औऱ उनके...

42 ।।कलाम कब्बाली।।

            ।।कलाम कब्बाली।। विच दोजक दे ना जामा मैं।दस किवें बहिश्त को पामा मैं। दोजक दे विच भाँबड़ मचदा।जियड़ा सुन सुन जांदा खपदा।।रोज रोज दी क़ियामत ते छुट जामा मैं।दस किवें बहिश्त को पामा मैं। बहिश्त जाण वाली मिलदी ना चाली।अकल मेरी हो गई खाली ।किस किस नूं पूछ पुछाँबां मैं।दस किवें बहिश्त को पामा मैं।। कै रोजे रख नमाज गुजाराँ।मौलवी काजी ना देंवें सहारा।कै रोज काबे दे जामा मैं।दस किवें बहिश्त को पामा मैं।। पढ़ पढ़ किताबां दे दे बांग गुजाराँ ।कै कुरान शरीफ दा पढ़ा छपाराँ ।कै गोरीं सिजदा करामा मैं।दस किवें बहिश्त को पामा मैं।। इह तो सब ही कीनो कारे।अल्ला दे ना होए दीदारे।किदां भेद किताबों पामा मैं।दस किवें बहिश्त को पामा मैं।। पढ़ियाँ किताबां समझ जरा ना आई।मुरशद बांझ भेद ना पाई।ईशरदास किस मुरशद वल जामा मैं।दस किवें बहिश्त को पामा मैं।। ।।कलाम कब्बाली।।ताल ३।। जब हुन मुरशद पाई लिया ,रोजा रोज दा रखाई लिया।मुरशद पंज नमाजां पढाईयाँ ।हक हलाल दियाँ खैर खुदाइयाँ।नियतां साफ सुना दियाँ।जब-----। मुरशद ऐसा कलमा पढ़ाया।बाहद हुतल अल्ला नजरोँ आया।गेंन का पड़द...

41।।बहिश्तनामा।।

              ।।बहिश्तनामा।। हजूर परम पिता सुआमी ईशरदास जी महाराज ने बहिश्तनामा बिच हिन्दू अते मुसलमाना प्रति भरमजाल दरशाया है। हिन्दू परमात्मा नूं राम कहिन्दे हन अते मुस्लिम खुदा कहिन्दे हन। इह दोनों ही भरम भुलेखे विच पए होए हन। जद कि असीं परमात्मा नूं प्रेम करके कई नामा नाल याद करदे हन। जिवें इक छोटे बच्चे दे प्रेम विच असीं कई नाम रख लैंदे हन। ऐथे असीं मझवां जातां विच फसे बैठे हन। परमात्मा ही खुदा है, राम है, रहीम है, ईश्वर है, परमेश्वर है, गॉड आदि नाँ हन। सुआमी जी कहिन्दे हन हिन्दू अंधे अते मुस्लिम काणे हन। हिन्दू जदों राम पुकारदे हन तां मुसलमान हसदे हन। जदों मुस्लिम खुदा कहिन्दे हन तां हिन्दू मजाक उड़ादे हन। असल विच परमात्मा कहि लओ, राम कहि लओ, खुदा कहि लओ, परमात्मा सब दा इको ही है। इह दुनियां भरमा विच पई होई है। इस प्रति सुआमी जी ने बहिश्तनामा लिखया है। निवेदक, संगत सिंह। आदि दुआरा आनंदगढ़-महिलांवाली। ।।कलाम कब्बाली।। चार अल्ला दे यार जो आए। पता नही हैं इह कहाँ को जाए। रहे ना अल्ला दे जो जानी है।बन्दे झूठी तेरी जिंदगानी है। पीर पैग...

36 ।। कौम दा इतिहास।।

            ।।भगवानदास सारँगवाल।। ।।दोहे।। याद करूँ जगदीश को जी सबका प्रितपाल। आदि पंथ चों मैँ इक कीटी दो कर जोड़ सुआल। सुणो सभा साजणो सानूं इक बीमारी। आदि नसल विच रम गई मैं खोल सुनामा।। ।।भजन जिला।। बिन इतिहासों पंथ दी शान ते ईमान नहीं।सुआर्थ ते परमार्थ दी हथ बिच कोई कमान नहीं।धार्मिक शास्त्र खा गए मूलों ई पंथ गुआ गए।तृण आतिश ला गए बचदी साडी जान नूं।

32।।भजन।।

                   ।।भजन।। ।।तर्ज ।।सानूं दर्शन दी लोड़ सतगुर मेरा।। वीरो जी सानूं लुट लिया होरनां जाति, अनक देवी देहरे बुत बना कर अनक धाम पुजाती।नए पुराणे मत चला कर पुस्तकां बिच फ़साती।भोली भाली कौमे नस नस फासे बेड़ियां जाल लगाती।आपणा गुआवणं, अवरा बणावण भुल गई साडी जाति तुसीं उन्हां नूं रव कर पूजो जेहड़े कौम दे घाती।पिरथमे सानूं मगर लगा कर पाछे दूर दूर कराती।धाम बनाए कई तादाद खा लई साडी जाती।भगवानदास कुछ होश करो तां निज क्यों ना धाम बनाती। ।।भजन।। ना खावो ना खावो धक्के चल चल।तुसीं उहनां वल डिगे जांदे ओह कहिन्दे पिछा नूं टल टल।सदियां लाँघियां कोई ना बणिया बैठे सब कुछ मल मल ।पाछे होश नहीं सी हुण आई खा गए बदन दी खल खल।कौम दा हाल देख देख दास नूं आए रोंण पल पल। ।।भजन।। ।।तर्ज--वीरो जी सानूं लुटिया होरनां जातियाँ।। भैणो जे तुसीं हरि का नामविचारो,गन्दे मन्दे गीतां ते विरति विगड़दी बोलियाँ ना उच्चारो।आपणे परदे आपे चकदियाँ तदे ना रखिया कुलतारो।तभी सानूं बुरियाँ बणावण जे ना खोटे राग विसारो।मानस जनम एहो हथ नहीं आऊ...

30।।बेंत।।

                    ।। बैंत।। जिस कौम दा जिन्दा इतिहास होवे, हुंदे जग दे विच खुआर भाई।उहदा लोक परलोक खराब हुँदा,जिधर किधर ते हुन्दी दुरकार भाई।ईष्ट आपणे जैसी ना मौज होवे दुए ईष्ट ते वणे बदकार भाई।भगवानदास सब कौम दे ईष्ट वण गए धक्के खांवदे फिरन चमार भाई। ।।बैंत।। साडी कौम दा, पड़दा अकल वाला फट गया बिजली दे तौर भाई।घर दुए दे पूजदे खांदे धक्के घर आप दी,करन ना गौर भाई।इज्जत आपणी दी नी, करदे नित निदिया, दुआ भूंड भी ते कहिन्दे भोर भाई।भगवानदास ऐहदा बेड़ा गर्क जो,करो अजे वी कुझ गौर भाई। ।।बैंत।। कई साडी कौम दे इन्सान ऐसे जेहड़े दुजियाँ दे हैं मगर लगे।खांदे बढियां पटदे कौम तांई पिंड पिंड फिर के हैं झड़न लगे। भोले भाले फसा के वीर साडे अवर कौमा दे विच हैं रगड़न लगे।भगवानदास हुन्दी है दुरदुरे भोले फिर वी उन्हा दे मगर लगे। ।।बैंत।। होर कौमा ने अकल दे नाल पांदे पढ़ विदिया वेद कुरान बैठे।कई होर वी नवें चलाइयो मत जेहड़े वेद कुरान गुआउँण बैठे।बाहज अमल ते ईलम दे कौम साडी बेइलमियाँ मगर लगाऊंण बैठ...

29।।शव्द बेंत।।

                    ।। बैंत।। जिस कौम दा जिन्दा इतिहास होवे, हुंदे जग दे विच खुआर भाई।उहदा लोक परलोक खराब हुँदा,जिधर किधर ते हुन्दी दुरकार भाई।ईष्ट आपणे जैसी ना मौज होवे दुए ईष्ट ते वणे बदकार भाई।भगवानदास सब कौम दे ईष्ट वण गए धक्के खांवदे फिरन चमार भाई। ।।बैंत।। साडी कौम दा, पड़दा अकल वाला फट गया बिजली दे तौर भाई।घर दुए दे पूजदे खांदे धक्के घर आप दी,करन ना गौर भाई।इज्जत आपणी दी नी, करदे नित निदिया, दुआ भूंड भी ते कहिन्दे भोर भाई।भगवानदास ऐहदा बेड़ा गर्क जो,करो अजे वी कुझ गौर भाई। ।।बैंत।। कई साडी कौम दे इन्सान ऐसे जेहड़े दुजियाँ दे हैं मगर लगे।खांदे बढियां पटदे कौम तांई पिंड पिंड फिर के हैं झड़न लगे। भोले भाले फसा के वीर साडे अवर कौमा दे विच हैं रगड़न लगे।भगवानदास हुन्दी है दुरदुरे भोले फिर वी उन्हा दे मगर लगे। ।।बैंत।। होर कौमा ने अकल दे नाल पांदे पढ़ विदिया वेद कुरान बैठे।कई होर वी नवें चलाइयो मत जेहड़े वेद कुरान गुआउँण बैठे।बाहज अमल ते ईलम दे कौम साडी बेइलमियाँ मगर लगाऊंण बैठ...

28।।शव्द कलँगड़ा।।

          ।।शव्द कलँगड़ा।। • जी मिल भाइयो तुसीं कर लाओ कौम सुधार कौमा ते सुधार करांदे, उह छल धोखा कर सानूं खांदे,ज्यों रोटी मरकट, मझार।।गोरां मढ़ियाँ ने लुट लुट खांदे,बैठे पुजारी मजार पाधे,सानूं लिया भरमा ने मार।।रव दे दुआरे नाम नूं जांदे,चौथे पोड़े वाले कहांउँदे, उथे पैंदे धक्के हजार।।जित्थे रब दा दुआरा होवे, उत्थे जात पात छूत छात क्यों होवे, इह सब धोखे दी कार।।आन कौमा दे गुरु बनाई ,उन दिल फरक मूल ना जाए,तुसीं कैहदे गुरु अवतार।। अवताराँ दे मैं हाल सुनामा, इतिहास उन्हां दे कढ दिखाबां,इक रूप समझे वरन चार।। परसूराम अवतार कहावे, बंदियाँ उत्ते खण्डे चलावे, किता भगतां नाल झूठा प्यार।।आजकल जो अवतार कहाँदे, परछांवे दे निकट ना जांदे,साडा किवें करन गे उधार।।समाजी कुरानी सिंघ कहौंउदे, धोखे देकर सानूं फ़साउंदे,छड्डदे ना मन दी खार।।वेद कतेबां दे संगल पाए,हिंदू अंधे तुरक कांणे कहाए,तुसीं फिर भी कहो अवतार।।सानूं कहिन्दे दूसर ना कोई,आप दूसर दे विच खपोई, सानूं लुट लुट अपने महल उसार।।रव दा ठेका उन्हां दे हथ आई, राम दा वेला तुसीं भुलाई,आए भीलणी दे दरबार।।कौंमी सन्त अनामी हुंदे, दर द...

27।।शव्द कलँगड़ा।।

          ।।शव्द कलँगड़ा।। • जी मिल भाइयो तुसीं कर लाओ कौम सुधार कौमा ते सुधार करांदे, उह छल धोखा कर सानूं खांदे,ज्यों रोटी मरकट, मझार।।गोरां मढ़ियाँ ने लुट लुट खांदे,बैठे पुजारी मजार पाधे,सानूं लिया भरमा ने मार।।रव दे दुआरे नाम नूं जांदे,चौथे पोड़े वाले कहांउँदे, उथे पैंदे धक्के हजार।।जित्थे रब दा दुआरा होवे, उत्थे जात पात छूत छात क्यों होवे, इह सब धोखे दी कार।।आन कौमा दे गुरु बनाई ,उन दिल फरक मूल ना जाए,तुसीं कैहदे गुरु अवतार।। अवताराँ दे मैं हाल सुनामा, इतिहास उन्हां दे कढ दिखाबां,इक रूप समझे वरन चार।। परसूराम अवतार कहावे, बंदियाँ उत्ते खण्डे चलावे, किता भगतां नाल झूठा प्यार।।आजकल जो अवतार कहाँदे, परछांवे दे निकट ना जांदे,साडा किवें करन गे उधार।।समाजी कुरानी सिंघ कहौंउदे, धोखे देकर सानूं फ़साउंदे,छड्डदे ना मन दी खार।।वेद कतेबां दे संगल पाए,हिंदू अंधे तुरक कांणे कहाए,तुसीं फिर भी कहो अवतार।।सानूं कहिन्दे दूसर ना कोई,आप दूसर दे विच खपोई, सानूं लुट लुट अपने महल उसार।।रव दा ठेका उन्हां दे हथ आई, राम दा वेला तुसीं भुलाई,आए भीलणी दे दरबार।।कौंमी सन्त अनामी हुंदे, दर द...

24।।शव्द मारू।।

              ।।शव्द मारू।। करतार जी सबहूँ धक्के नामदेव जी नूं मारे। शुद्र जाति नामा जानिया कढण ठाकुर दुआरे। देहरे दे कर वट नामा बैठा रो रो धाही मारे। हे ठाकुर तूँ मृतक देह दे ढोई ना तेरे दुआरे। आए रविदास फेरिया देहरा पंडे रहे पुछबाड़े। पैज रखी ईशवर नाम दी, पण्डे ना घट गुजारे। जिहनाने जुलम गुजारे भारे पूजें ना उन्हाने दुआरे। भगवानदास निज गुरुआँ दे देख लओ नजर नजारे। ।।शव्द पहाड़ी।। जहर खा के मरदे वी नहीं जेहड़े सांई दे पियारे जी। जहर पा प्रसाद लिआये पंड़ियाँ धरोह कमा लिया। शिश वणन नूँ नामदेब नूं करदे निमस्कारे जी। इक इक मोदन सब को बाँटिया,सणे सारे पंडे कटुंबारे। अगल बगल पंड़ियाँ गेरे नामे खाई परवारे रे। आप हरि ने रक्षा किन्ही बच रहे परवारे जी। मलाह पंडे मिल सिंध डुबोया ईशवर पार उतारे जी। मीरांबाई आई शरन गुरां दी, उसनूं वी जहर पिला लिया जी। ईशरदासा घट ना गुजारी रखे सी सिरजन हारे जी।

23।।शव्द।।

            ।।शव्द कलँगड़ा।। सच्चे सतगुर दे लड़ लग के दिल दा मतलब पाया मैं। ढूंढ देखी सभी लुकाई,भोंदा फिरदा आया मैं।। पहिलां इक मैं पन्थ चलाया खाना पीणा सब छड़वाया। वसदी छड जंगल नूं धाया ना कुछ हासिल पाया मैं।। दुए पन्थ दी सेवा लाई,उसने सिर ते जूत रखाई। तन ते अंग भबबूत रमाई,मथे तिलक लगाया मैं।। फिर मैं वन वन खोजन जाई, जाई के देवी जोत जगाई। मेरे करमा ना कुझ भी आई,हो नराशा मन मे आई ।। फिर मैं तीर्थ में जा के नहाया ,कन्द मूल फल वन के खाया। उड़क रव ने मेल मिलाया,सतगुर चरनी लाया मैं।। जब घुंडी गुरु बतलाई, सारा अंधेर कुफ़र दा जाई। गैवी समा दी होई रूशनाई, अपना नाम सुधाया मैं। मम भली है जिन्द पियारी, ईशरदास मुझ मिले अवतारी। भजन दास मैं सद बलिहारी अपना आप लभाया मैं।। --::कर्ता::-- रामलोक, पुन्नू राम सकना,गुलजारी राम पनपुर, डाकखाना सेंसोवाल,जिला होशियारपुर। ।।शव्द तिलंग।। वीरो जी सानूं लुट लिआ आन ही जाति। अनक देवी देहरे बुत बना कर अनक धाम पूजाति ।। नवें पुराणे मत चला कर पुस्तकां मध फंसाती।। भोली भाली कौमे नस नस फ...

12।।शव्द।।

                      || शब्द|| पहले आदिधर्मी सी सदाबो फिर नेह कलंक बन जावो, सदियां दे रूल्दे जाग पवो हुण नहीं पाछे पछतावो|| जिधरों आए असीं कढ दियाँगे जिन्ह हमें दबाबो|| आदि मुल्क दे वसिंदियाँ नूं तंगियाँ बाहरों आए ऐश उड़ावो|| हक भी दवाया बथेरा जोर लगाया पल्ले कुछ ना पावो, खानपान ते असीं दुखी हो गए, पेश साडी कोई ना जावो || जिधर किधर है दूरकार पैंदी नक पर स्वास डाकू खाबो|| घास साग लकड़ी दी मनाही खानाबदोस करावो|| कचेहरियाँ दे विच कोई ना दर्दी साडा खून जवत {खत्म}हो जावो|| जेहड़े साडे हो गए बडे बड़े लीडर झोली चक बण जावो || कदे कांग्रेसी, कदे अंग्रेजी बुलावो, कौम का दर्दी वणिआ ना कोई, सारे अपनी ऐश उड़ावो|| ईशरदास नेह कलंकी बण बोले, हुण सारे डंका फतेह बजावो|| शव्द गुरु आदि प्रगाश के गुण गावो रे, जेहड़ा सचड़ा ग्रंथ सदावो रे|| कलियुग बितिया हुण जो युग बणिया सतयुग सदावो, कलियुग दे अंत विच लग लड़ी सतयुग बुलावों रे || हुण वेद पुराण सब मिट जावो, इस सतयुग दा हुण धर्म ग्रंथ आदि प्रगाश कहावो रे || दुए दी वस्तु वल धियान ना धरना, इस य...

11।। शव्द।।स्वामी ईशरदास जी महाराज।।

                      || शब्द|| पहले आदिधर्मी सी सदाबो फिर नेह कलंक बन जावो, सदियां दे रूल्दे जाग पवो हुण नहीं पाछे पछतावो|| जिधरों आए असीं कढ दियाँगे जिन्ह हमें दबाबो|| आदि मुल्क दे वसिंदियाँ नूं तंगियाँ बाहरों आए ऐश उड़ावो|| हक भी दवाया बथेरा जोर लगाया पल्ले कुछ ना पावो, खानपान ते असीं दुखी हो गए, पेश साडी कोई ना जावो || जिधर किधर है दूरकार पैंदी नक पर स्वास डाकू खाबो|| घास साग लकड़ी दी मनाही खानाबदोस करावो|| कचेहरियाँ दे विच कोई ना दर्दी साडा खून समनः{खत्म} हो जावो|| जेहड़े साडे हो गए बडे बड़े लीडर झोली चक बण जावो || कदे कांग्रेसी, कदे अंग्रेजी बुलावो, कौम का दर्दी वणिआ ना कोई, सारे अपनी ऐश उड़ावो|| ईशरदास नेह कलंकी बण बोले, हुण सारे डंका फतेह बजावो|| ।।शव्द।। गुरु आदि प्रगाश के गुण गावो रे, जेहड़ा सचड़ा ग्रंथ सदावो रे|| कलियुग बितिया हुण जो युग बणिया सतयुग सदावो, कलियुग दे अंत विच लग लड़ी सतयुग बुलावों रे || हुण वेद पुराण सब मिट जावो, इस सतयुग दा हुण धर्म ग्रंथ आदि प्रगाश कहावो रे || दुए दी वस्तु वल धियान ना धरना, इस युग दा नियम है ...

10 ।।शव्द गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ।।

         ।।शव्द।। आदि प्रगाश बिन ना आदि धरमी बचदा। भावें लद के गड़ियाँ पढ़न किताबां नूं।। आदि प्रगाश सहायता करेगा छड दे बड़े बड़े नबाबां नूं।।जो बेमुख होया इस ते,भारी पवे गया अजाबां नूं।रविदास लग रही साभा,इसकी जेकर खतना लाभां नूं।। ।।शव्द तिलंग।। दुखां वाली कटनी रात भारी,सुखां विच लंघ जांदे युग चारी जी।सुखां दा दर्दी हर कोई बनदा दुखां दा कोई कोई। हाउवे(होंके) लै लै बक्त गुजारे,किते ना मिलदी ढोई।सुखियाँ ने चिंता विसारी जी,एक दिन आ जाउ वारी जी ।दुख घनेरे पये हन, सारे बहुता की समझावां।सर्व दुख की ओखद इहो गुरु आदि प्रगाश पढ़ाबां।ओखद इस मर्ज दी सारी ए पूज पूजारी, दिल विच निसचा धारी ए।। ।।शव्द मलहार।। निज ईष्ट, ईष्ट नूं मनाबीं, बच जांवी गुण गावीं गुरु आदि प्रगाश दे।आन मझबां दे तप पुराणे, आदि प्रगाश दी ओखद जाणे।आदि धरमी ,आदि दे गुण नित गावीं।दिल लावीं सुख पावीं धरनी आकाश दे।।और तरीका वचण दा नाहीं आदि प्रगाश दे पाठ करावीं।सच सच जाणी ज्ञान आदिधरमी ।जाए गर्मी पाए नरमी,पी प्याले हुबलाश दे।।इस जुगत विन ओझड़ कहावें, सिरकी बाजां बांग फिरावे।आन पुस्तक जो रखावे, मोद पावे खुस ज...

9नेह कलंक आदिभाषा लओ पढ़ा।।

      ।।नेह कलंक आदि भाषा लओ पढ़ा।। ।।शव्द बिलाबल।। आमी आमी आमी आमी दासां नूं स्वतन्त्र करन वालिया,धार्मिक राजनीतिक दोई, गुलामी हेठ खलोई।दो कर जोड़ कर कराँ अरजोई गुलामी तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ज्यों तन्दुए ते गज छड़बाए, हिरनी हेरि कोलों सहाए,जैहरों अमृत मीरां बनवाए,जाल तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन बालिया।आदि बसिंदियाँ दी खातिर प्रभ जी आवहि, सब दलित दमन दफा ते स्वतन्त्र करामी। धरु भगत नूं पदवी दिलावहि,गुलामी तक तुड़ावही ।आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ।।शव्द पहाड़ी।। है प्रभ जी नेह कलंक जहाज तट में लावो।गरीब जनता नूं कुचलन अहंकारी आ वसा जावो।। सर्व विश्व का तुमहे बानी मख़लूक़ात में औऱ ना सानी।अति गरीबां नूं आ के उठा जावो।। जिनके गल में पाई गुलामी हाथी कीच में कवण अठामी।मेहर करके कढा जामी।। किरखी करण जो साग तुड़ावन गरीब नाराँ जो झिड़कांवण।इन तन्द्ववों से आजाद करा जावो।। जुगड़े वीते पर आर्यन नूं तरस ना आया, ये सचे अखर दास ने सुनाया।जनता दे दारुन संगल लहा जाबे।।

8नेह कलंक आदिभाषा लओ पढ़ा।।

      ।।नेह कलंक आदिभाषा लओ पढ़ा।। ।।शव्द बिलाबल।। आमी आमी आमी आमी दासां नूं स्वतन्त्र करन वालिया,धार्मिक राजनीतिक दोई, गुलामी हेठ खलोई।दो कर जोड़ कर कराँ अरजोई गुलामी तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ज्यों तन्दुए ते गज छड़बाए, हिरनी हेरि कोलों सहाए,जैहरों अमृत मीरां बनवाए,जाल तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन बालिया।आदि बसिंदियाँ दी खातिर प्रभ जी आवहि, सब दलित दमन दफा ते स्वतन्त्र करामी। धरु भगत नूं पदवी दिलावहि,गुलामी तक तुड़ावही ।आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ।।शव्द पहाड़ी।। है प्रभ जी नेह कलंक जहाज तट में लावो।गरीब जनता नूं कुचलन अहंकारी आ वसा जावो।। सर्व विश्व का तुमहे बानी मख़लूक़ात में औऱ ना सानी।अति गरीबां नूं आ के उठा जावो।। जिनके गल में पाई गुलामी हाथी कीच में कवण अठामी।मेहर करके कढा जामी।। किरखी करण जो साग तुड़ावन गरीब नाराँ जो झिड़कांवण।इन तन्द्ववों से आजाद करा जावो।। जुगड़े वीते पर आर्यन नूं तरस ना आया, ये सचे अखर दास ने सुनाया।जनता दे दारुन संगल लहा जाबे।।

7नेह कलंक आदिभाषा लओ पढ़ा

      ।।नेह कलंक आदिभाषा लओ पढ़ा।। ।।शव्द बिलाबल।। आमी आमी आमी आमी दासां नूं स्वतन्त्र करन वालिया,धार्मिक राजनीतिक दोई, गुलामी हेठ खलोई।दो कर जोड़ कर कराँ अरजोई गुलामी तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ज्यों तन्दुए ते गज छड़बाए, हिरनी हेरि कोलों सहाए,जैहरों अमृत मीरां बनवाए,जाल तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन बालिया।आदि बसिंदियाँ दी खातिर प्रभ जी आवहि, सब दलित दमन दफा ते स्वतन्त्र करामी। धरु भगत नूं पदवी दिलावहि,गुलामी तक तुड़ावही ।आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ।।शव्द पहाड़ी।। है प्रभ जी नेह कलंक जहाज तट में लावो।गरीब जनता नूं कुचलन अहंकारी आ वसा जावो।। सर्व विश्व का तुमहे बानी मख़लूक़ात में औऱ ना सानी।अति गरीबां नूं आ के उठा जावो।। जिनके गल में पाई गुलामी हाथी कीच में कवण अठामी।मेहर करके कढा जामी।। किरखी करण जो साग तुड़ावन गरीब नाराँ जो झिड़कांवण।इन तन्द्ववों से आजाद करा जावो।। जुगड़े वीते पर आर्यन नूं तरस ना आया, ये सचे अखर दास ने सुनाया।जनता दे दारुन संगल लहा जाबे।।

6नेह कलंक आदिभाषा लओ पढ़ा।।

      ।।नेह कलंक आदि भाषा लओ पढ़ा।। ।।शव्द बिलाबल।। आमी आमी आमी आमी दासां नूं स्वतन्त्र करन वालिया,धार्मिक राजनीतिक दोई, गुलामी हेठ खलोई।दो कर जोड़ कर कराँ अरजोई गुलामी तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ज्यों तन्दुए ते गज छड़बाए, हिरनी हेरि कोलों सहाए,जैहरों अमृत मीरां बनवाए,जाल तुड़ामी, आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन बालिया।आदि बसिंदियाँ दी खातिर प्रभ जी आवहि, सब दलित दमन दफा ते स्वतन्त्र करामी। धरु भगत नूं पदवी दिलावहि,गुलामी तक तुड़ावही ।आमी आमी आमी आमी स्वतन्त्र करन वालिया। ।।शव्द पहाड़ी।। है प्रभ जी नेह कलंक जहाज तट में लावो।गरीब जनता नूं कुचलन अहंकारी आ वसा जावो।। सर्व विश्व का तुमहे बानी मख़लूक़ात में औऱ ना सानी।अति गरीबां नूं आ के उठा जावो।। जिनके गल में पाई गुलामी हाथी कीच में कवण अठामी।मेहर करके कढा जामी।। किरखी करण जो साग तुड़ावन गरीब नाराँ जो झिड़कांवण।इन तन्द्ववों से आजाद करा जावो।। जुगड़े वीते पर आर्यन नूं तरस ना आया, ये सचे अखर दास ने सुनाया।जनता दे दारुन संगल लहा जाबे।। 

62 ।।गुलाम आदिधर्मी को निर्देश।।

        ।। गुलाम आदि धरमी को निर्देश।। ।।बैत ।। आदि धर्मिया अजे भी जाग ,सुतिया लुट पुट के लै गए होर तैंनूं ।रिहा महल उसारदा उन्हां दे तूँ जिनि कर छडिया कमजोर तैंनूं।बुतपरस्तियाँ खा लिया भरम भरिया बना दिता ने अंतक गैर तैंनूं ।सँगल वेद कतेब दे पा पैरीं आदिधरमी पिछे लाई के रखिया तोर तैंनूं । ।।बैंत ।। खलां बांग तूँ रिहा फोक आदि धरमी कड लिआ ने असली तेल विचों ।फल तोड़ के लै गया होर कोई,रह गई सखनी पई ने वेल विचों ।इम्तिहान सतबंजा दा गया हो हुशियार होंबी ना फेल विचों ।झंडा आदि प्रगाश दा चक के निकल वेद कतेब दी जेल विचों। ।।बैंत ।। जो जो गुरु रविदास नूं मनण वाला कसम खा के कर लै दान धरमी ।गुरु आदि प्रगाश वाणी गुरां वाली बन गई धरम दी कमान धरमी ।।गुरु आदि प्रगाश छपबा हो जाए,बण जाई कौम दी शान धरमी ।बुत बहकदे पए ने थां थांइं, पै जाउ सब मे जान धरमी । ।।बैत।। इस मुलख दा असली बसिन्दा आदि धरमी अज तड़फड़दा फिरदा तूँ दांनियाँ नूं ।।धरम मंदिरां उत्ते हक है ना,धक्के झिड़कां पेंदे ने निमाणियाँ नूं ...

3।।आआदिधर्मी को निर्देश।।

        ।। गुलाम आदि धरमी को निर्देश।। ।।बैत ।। आदि धर्मिया अजे भी जाग ,सुतिया लुट पुट के लै गए होर तैंनूं ।रिहा महल उसारदा उन्हां दे तूँ जिनि कर छडिया कमजोर तैंनूं।बुतपरस्तियाँ खा लिया भरम भरिया बना दिता ने अंतक गैर तैंनूं ।सँगल वेद कतेब दे पा पैरीं आदिधरमी पिछे लाई के रखिया तोर तैंनूं । ।।बैंत ।। खलां बांग तूँ रिहा फोक आदि धरमी कड लिआ ने असली तेल विचों ।फल तोड़ के लै गया होर कोई,रह गई सखनी पई ने वेल विचों ।इम्तिहान सतबंजा दा गया हो हुशियार होंबी ना फेल विचों ।झंडा आदि प्रगाश दा चक के निकल वेद कतेब दी जेल विचों। ।।बैंत ।। जो जो गुरु रविदास नूं मनण वाला कसम खा के कर लै दान धरमी ।गुरु आदि प्रगाश वाणी गुरां वाली बन गई धरम दी कमान धरमी ।।गुरु आदि प्रगाश छपबा हो जाए,बण जाई कौम दी शान धरमी ।बुत बहकदे पए ने थां थांइं, पै जाउ सब मे जान धरमी । ।।बैत।। इस मुलख दा असली बसिन्दा आदि धरमी अज तड़फड़दा फिरदा तूँ दांनियाँ नूं ।।धरम मंदिरां उत्ते हक है ना,धक्के झिड़कां पेंदे ने निमाणियाँ नूं ...

।।गऊ पुकार।।

               ।।गऊ पुकार ।। ।।शव्द राग मझार।। दीनो के नाथ स्वामी तूं आजा आजा आजा ।।गुआउँ तेरियां रुलन चार चफेरे आदि पुरूष कहाँ ला लए डेरे ।।फड़ परना आप चराजा चराजा चराजा ।।आप लिआबो आप छुप जावे ।।घर घराट ना फिर नठाबे।।गल विच संगल पाजा खुलाजा ।।उधर भरन को जेकर जाइए सो सो आगे टेंगे खाइए ।।तरस ना कोई कराजा ना कराजा ।।हकूमत नेहरू आई गऊ गरीब ना तरस कराई ।।हकूमत जुलमी खत्म कराजा कराजा ।।अपने करमा हकूमत करले ।।गऊ गरीब करदे ने तरले।।इनका जतन बनाजा बनाजा ।।सुआमी ईशरदास कहेंदे नेह कलंक कलगीधर जी सुनेदे ।आनंदगढ़ इजलास लगांदा लगांदा ।। ।।भंडाली छंद ।। जब सी कांशी दे विच रहन्दा,कलसां नाल बहिंदा ।।काम पैन ते गाउँआँ उपजियाँ अज जाई जंगल विच रुल गईंआँ ।।तेरी खुशबू आए निश बासर, आया सी इजलास धर्म मंडल में ।।हमरी माता गुरदेई पछान सकी ना पहरा रोज लगाया ।।अमृत धेन सिर हमारा दोह दोह किसे दलाया।।सम्मत विक्रमी दो हजार सोलह पोह महीना खतम कराया ।मंगल दी रात चढ़ गए बुद्ध रो रो हाल सुनाया।।सुआमी ईशरदास तूं बन बैठा दीवाना अपना भेद छपाया ।।जिला होशिय...

गुरु रविदास महाराज द्वारा, वैदिक साहित्य अमान्य।

।।गुरु रविदास महाराज द्वारा वैदिक साहित्य अमान्य।। गुरु रविदास जी महाराज ने वैदिक साहित्य में वर्णित सुखसागर, देववृक्ष, कामधेनु,चिन्तामणि, चार पदार्थ, नव निद्धियाँ और अठारह सिद्धियों की निर्मूलता को प्रमाण देकर अमान्य कर दिया है। उनके अनुसार भगवान घर पर रह कर ही पाए जा सकते हैं, कहीं गुफाओं में मक्खियों मच्छरों, कीड़े मकोड़ों से परेशान होने की जरूरत नहीं हैं, सबसे बड़ा तीर्थ तो वही जगह है, जहाँ पर आदमी जन्म लेता है, जहां पर आदमी पहली बार संसार देख कर, माँ का पवित्र दूध पी कर, युवा होता है। गुरु रविदास जी आगे फरमाते हैं कि:---- नाना खिआन, पुराण वेद विधि। चौतीस अछर माहीं। विआस विचारहि करिउ,परमारथु।। राम नाम सरि नाही। गुरु रविदास जी ने उपरोक्त पंक्तियों में तर्क देकर क्रांतिकारी शव्दों में, मूलनिवासियों को रक्तविहीन क्रान्ति करने का उपदेश देते हुए कहा है कि, हे मूलनिवासियो! वैदिक साहित्य ब्राह्मणवाद की, आपके खिलाफ एक वहुत बड़ी साजिश है। आप सब को जन्म मरण, स्वर्ग, नरक, पारसमणि, देव वृक्ष, चिन्तामणि, कामधेनू, चार पदार्थ, ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ आदि काल्पनिक संसार में धकेला हुआ है, जो बिलकुल तर्कसंग...

गुरु रविदास और वैदिक पुस्तकों का भांडाफोड़।।

।।गुरु रविदास और वैदिक पुस्तकों का भांडाफोड़।। गुरु रविदास जी महाराज ने वैदिक साहित्य का भांडाफोड़ करके, मूल भारतीयों को तर्कपूर्ण ढंग से चिन्तन और मनन करने के लिये विवश कर दिया था। इस विश्व में ऐसा कोई महापुरुष नजर नहीं आता है, जिसने खूंखार भेड़ियों से टक्कर ली हो, फिर उन्हें बुरी तरह से घायल भी किया हो, उन्हीं से अपना सिक्का चलवाया हो, गुरु तेगबहादुर भी जालिम की तलवार के शिकार हो गये और गुरुद्वारे में देवता बन कर बंद हो गए, पापी को दंड नहीं दे सके, ईशा मसीह भी सूली पर झूल गए मगर अपने आपको जालिमों से बचाकर अत्याचारियों को दण्ड नहीं दे पाए, मंसूर आदि भी अपने बहुमूल्य प्राण नहीं बचा सके और हत्यारों को हत्या की सजा नहीं दे सके, अगर जीवित रहते तो कुछ परिवर्तन तो करते और हत्यारों को सबक सिखाते मगर उनके पास गुरुओं के गुरु रविदास जी के, वाणी रूपी मिजायल नहीं थे, गुरु रविदास जी के खिलाफ भी तिलकधारियों ने पूरी की पूरी शासकीय शक्ति झोंकी, परन्तु, गुरु जी का बाल भी बांका नहीं कर सके थे। गुरु रविदास जी ने कई बहिशियों को बहिशियों के हाथों नरक लोक अवश्य पहुँच दिया था।  इसलिए गुरु महाराज ने लंबे सम...

गुरु रविदास और ब्राह्मणवाद में परिवर्तन।।

।।गुरु रविदास और ब्राह्मणवाद में परिवर्तन।। गुरु रविदास जी महाराज ने जो, वहुजन क्रान्ति का शंखनाद, जन्म लेते ही किया था, उससे, ब्राह्मणवाद कांप उठा था। ब्राह्मणों ने बीसवीं शदी में आकर अपने छलप्रपंचों, आडंबरों का गहन अध्ययन किया जिससे, ये लोग इस निर्णय पर पँहुच चुके हैं कि, जो वेदों, पुराणों, मनुस्मृतियों, ब्राह्मण ग्रँथों, दर्शन शास्त्रों में, बेतुके ही नहीं तर्कहीन प्रक्षिप्तांश जोड़े गए हैं, उनसे ब्राह्मणवाद की सारे संसार में बुरी तरह से किरकिरी होती आई है, तर्कहीन बेसिरे, बेमुँहें हनुमान, ब्रह्मा, गणेश, देवी, देवताओं के चित्र, शूद्रों को अमानवीय तरीकों से जलील करने वाले, शास्त्रों के प्रसंग, मूल निवासी महाऋषियों के कत्ल, सन्तों और महापुरुषों की जेल यात्राएँ, ब्राह्मण धर्म की मिट्टी पलीत करते आए हैं, जिन का पुनः आलोचनात्मक विश्लेषण करके, ब्राह्मणों द्वारा नए ढंग से लिखने का चलन शुरू हो गया है, गीता प्रेस गोरखपुर ने जो ताजा नई वाल्मीकि रामायण छपवाई है, उसमें से महाऋषि शंबूक, कत्ल कांड हटा दिया गया है। अब ये चिंतन और आत्मविश्लेषण का विषय है कि, ब्राह्मण इतना बड़ा निर्णय किन किन परिस्थित...