।।शव्द।।
|| शब्द|| पहले आदिधर्मी सी सदाबो फिर नेह कलंक बन जावो, सदियां दे रूल्दे जाग पवो हुण नहीं पाछे पछतावो|| जिधरों आए असीं कढ दियाँगे जिन्ह हमें दबाबो|| आदि मुल्क दे वसिंदियाँ नूं तंगियाँ बाहरों आए ऐश उड़ावो|| हक भी दवाया बथेरा जोर लगाया पल्ले कुछ ना पावो, खानपान ते असीं दुखी हो गए, पेश साडी कोई ना जावो || जिधर किधर है दूरकार पैंदी नक पर स्वास डाकू खाबो|| घास साग लकड़ी दी मनाही खानाबदोस करावो|| कचेहरियाँ दे विच कोई ना दर्दी साडा खून जवत {खत्म}हो जावो|| जेहड़े साडे हो गए बडे बड़े लीडर झोली चक बण जावो || कदे कांग्रेसी, कदे अंग्रेजी बुलावो, कौम का दर्दी वणिआ ना कोई, सारे अपनी ऐश उड़ावो|| ईशरदास नेह कलंकी बण बोले, हुण सारे डंका फतेह बजावो|| शव्द गुरु आदि प्रगाश के गुण गावो रे, जेहड़ा सचड़ा ग्रंथ सदावो रे|| कलियुग बितिया हुण जो युग बणिया सतयुग सदावो, कलियुग दे अंत विच लग लड़ी सतयुग बुलावों रे || हुण वेद पुराण सब मिट जावो, इस सतयुग दा हुण धर्म ग्रंथ आदि प्रगाश कहावो रे || दुए दी वस्तु वल धियान ना धरना, इस युग दा...