57।।स्वामी अच्छूतानंद और प्रथम गोलमेज सम्मेलन।।

।।स्वामी अच्छूतानंद और प्रथम गोलमेज सम्मेलन।।
भारत मे उथल पुथल का दौर जारी था।भगत सिंह राजगुरु सुखदेव की फांसी से अंग्रेजों को मुशीबत खड़ी हो चुकी थी।जनता भी स्वतंत्रता प्राप्ति केलिये बेचैन होती जा रही थी।ब्रिटिश सरकार ने असन्तोष को दबाने केलिये भारत को आजाद करने के फीलर छोड़ने शुरू कर दिए,जिस की प्रथम कड़ी में ,ब्रिटिश सरकार ने सँविधान तैयार करने केलिये भारतीय नेताओं को खंगालने केलिये प्रयास शुरू किए।सन 1927 को ब्रिटिश सरकार ने भारत केलिये भावी सँविधान मसौदा तैयार करने की योजना बनाई,जिसके लिये लार्ड जान साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन की घोषणा की, जिसे साईमन कमीशन के नाम से पुकारा गया।
साईमन कमीशन के बारे में जब भारत के हिन्दू मुस्लिम नेताओं और राजाओँ महाराजाओं को पता चला तो वे भी अपनी अपनी गोटियां फिट करने लगे।हिंदुओं का प्रतिनिधित्व मिस्टर गांधी और मुस्लिमों का नेतृत्व मुहंम्मद अली जिन्नाह कर रहे थे, पंजाब के मंगूराम मुगोबाल ने 11/12 जून सन 1926 को पंजाब आदिधर्म मंडल की स्थापना करके सारे भारत के अछूत नेताओं से सम्पर्क स्थापित कर लिया था और सवर्ण षड़यंत्र के खिलाफ आंदोलन भी शुरू कर दिया था।मंगू राम जी ने लाहौर में ही साईमन को अछूतों की दुर्दशा विस्तार से बता दी थी।उसके बाद जब वह लखनऊ गए तो वहां स्वामी अच्छूतानंद जी ने साईमन को अछूतों की दयनीय अवस्था के बारे में बताया था जिसकी रिपोर्ट साईमन ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडानाल्ड को विस्तार से लिखकर दे दी थी जिसके परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार अछूतों के बारे में चिंतन कर रही थी।ब्रिटिश सरकार ने साईमन की रिपोर्ट के आधार पर इंग्लैंड में गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई,जो बारह नबंबर 1930 से तेरह जनबरी 1931 तक लन्दन में चली।अपनी अपनी जनसँख्या बढ़ाने केलिये, हिन्दू मुस्लिम दोनों ही मूलनिवासियों को अछूत समझ कर अपने अपने गुलाम बनाए रखने के ढोंग रचे रहे थे कि,पंजाब के मंगूराम मुगोबाल,उतर प्रदेश के स्वामी अच्छूतानंद और भगत राम ने, तीसरा ध्रुव बनाकर, हिंदूओं और मुसलमानों का खेल बिगाड़ दिया। इन्होंने सम्मेलन में अछूतों की ओर से डाक्टर भीमराव अंवेदकर को अपना प्रतिनिधि बनाकर लन्दन भेज दिया।जब लन्दन में गोलमेज सम्मेलन के प्रथम दिन,मोहनदास कर्म चंद गांधी ने अंवेदकर को देखा तो आग बबूला हो गया मगर कुछ बोल नही सका।
जब गोलमेज सम्मेलन शुरू हुआ तो सभी का परिचय करते हुए प्रधानमंत्री ने ये भी पूछा, कि कौन किस का प्रतिनिधि है, ये भी साथ बताएं।कायदे आज़म मुहंम्मद अली जिन्नाह ने बताया कि मैं मुसलमानों का, गांधी ने कहा मैं हिंदुओं का और भीमराव अंवेदकर ने कहा मैं अछूतों का प्रतिनिधि हूँ,जिसे सुन कर गांधी भड़क उठा और बोला नहीं,अछूतों का प्रतिनिधि मैं हूँ, उधर डाक्टर भीमराव अंवेदकर बोल रहे थे कि अछूतों का प्रतिनिधि मैं ही हूँ जिस पर प्रधानमंत्री क्रोधित हुए और बोले, कि क्या आपके मुंह पर लिखा हुआ है कि आप ही अछूतों के प्रतिनिधि हो,जिसे सुन कर दोनों निराश हुए। गांधी ने भारत में सम्पर्क करके अपनी समस्या बताई जिसके कारण सवर्ण लोगों ने गांधी के पक्ष में झूठी तारें भेज दीं, डाक्टर अंवेदकर का कोई ऐसा साथी नहीं था जो इस समस्या को समझ कर समाधान करता, उन्होंने मंगूराम मुगोबाल से सम्पर्क करके बताया कि गांधी, कहता है कि मैं ही अछूतों का प्रतिनिधि हूँ। मंगूराम ने उन्हें कहा चिंता मत करो। मंगूराम जी ने खुद भी तारें भिजबाईं और स्वामी अच्छूतानंद जी और अपने परिचित सभी अछूतों से भी तारें भिजबाईं।जब दूसरे दिन गांधी और अंवेदकर ने अपने अपने समर्थन की तारें, प्रधानमंत्री की मेज पर रखीं, और जब गिनी गईं तो अंवेदकर की सात तारें अधिक पाई गईं, जिससे अंवेदकर को ही अछूतों का प्रतिनिधि माना गया, इससे रुष्ट होकर गांधी गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार करके भारत लौट आया। गांधी को सम्मेलन से भगाने और डाक्टर भीमराव अंवेदकर को एकछत्र अछूतों का राष्ट्रीय नेता घोषित करने की ऐतिहासिक सफलता साहिब मंगूराम और स्वामी अच्छूतानंद दोनों के ही सामूहिक प्रयासों से मिली थी।

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