।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।।

 

   ।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।।
गुरु रविदास जी महाराज ने मानव मन के, शक, संशयों, संदेहों को परमपिता परमेश्वर के मिलने के रास्ते में सब से बड़ी रुकावट बताया है। गुरु जी संगत को उपदेश देते हुए फरमाते हैं, जब तक मन के संदेह दूर नहीं हो जाते हैं, तब तक किसी को भी मानसिक सुख, शांति नहीं मिल सकती है, आदिपुरुष का सपना देखना तो, दिवा स्वप्न देखने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं।
राम बिन संशय ना गाँठि ना छूटे।।
काम किरोध लोभ मद माया इन पंचन मिलि लूटे।। टेक।।
गुरु रविदास जी महाराज संगत को संशयों के बारे में विस्तार से समझाते हुए फरमाते हैं, कि हे संगते! जब तक आप के मन के संदेहों की गांठ नहीं खुलती हैं, तब तक परमपिता परमेश्वर अर्थात आदपुरुष के दर्शन नहीं हो सकते हैं। उस के रास्ते में काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार डेरा डाले हुए हैं। इन पांचों ने मिल कर के प्रभु मिलन के रास्ते को रोक रखा है और जो भक्ति रूपी धन दौलत हम इकट्ठा करते हैं, उस को ये पांचों लुटेरे लूट लेते हैं अर्थात इन पांचों विकारों के आधिक्य से मनुष्य अपने भक्ति के मार्ग से भटक जाता है। इसलिए इन पांचों को वश में रख कर के उचित अनुपात में काम लेना चाहिए।
हम बड़ कवि कुलीन हम पंडित हम जोगी सन्यासी।।
ज्ञानी गुणी सूर हम दाता याहू कहे मति नासी।।१।।
गुरु रविदास जी महाराज बड़े बड़े तिलकधारियों पंडितों और पुजारियों के अहंकारों पर तीव्र पाषाण प्रहार करते हुए फरमाते हैं, कि ये लोग बड़े अहंकार से कहते हैं, हम तो बड़े-बड़े कुलीन हैं, हम बड़े प्रख्यात कवीश्वर हैं, हम बड़े-बड़े प्रकांड, पंडित, योगीश्वर और सन्यासी हैं, ज्ञानी और गुणवान हैं। हमारे जैसा कोई शूरवीर, कोई दाता नहीं है। इन्हीं खोखले घमंडों के कारण इन की बुद्धि का नाश हो गया है अर्थात ये लोग अहंकार के नशे में डूब कर अपनी बुद्धि को भी नष्ट कर बैठे हैं।
पढ़ें गुणे कछू समझि ना परई जो लों भाव ना दरसै।।
लोहा हिरण होई धों कैसे जो पारस नहि परसै।।२।।
गुरु रविदास जी महाराज तिलकधारियों, धोती धारियों की मूर्खता का वर्णन करते हुए कहते हैं, कि ये लोग कुछ पढ़ते, लिखते तो हैं नहीं और ना इन को कोई समझ होती हैं, जिस के कारण इन के कारनामे सँगत के सामने दिखाई नहीं आ पाते हैं। गुरु महाराज फरमाते हैं, कि लोहे का हिरण बन जाए तो क्या वह दौड़ सकता है? पारस को छूने के बिना क्या कभी लोहा, सोना बन सकता है अर्थात गुरु रविदास जी महाराज संगत को समझाते हुए फरमाते हैं, कि संपूर्ण गुरु के बिना लोहे जैसे मूर्ख लोग कभी भी हिरण की तरह दौड़ नहीं सकते हैं अर्थात गुणवान नहीं बन सकते, और ना ही लोहा, पारस को छुए बिना कभी सोना नहीं बन सकता है अर्थात परिपूर्ण गुरु के सानिध्य के बिना कोई भी ज्ञान हासिल कर सकता है।
कह रविदास और असमुझ सी चालि परै भ्रम भोरे।।
एक आधार नाम नरहरि को जिवन प्राण धन मोरे।।३।।
गुरु रविदास जी महाराज मूर्खों को उन की, नासमझी पर तीखा व्यंग्य कसते हुए कहते हैं, कि यह भ्रमित लोग भंवरे की तरह गुनगुन करते रहते हैं, मगर सत्य की गति को समझ नहीं पाते हैं। जीवन का आधार केवल परमात्मा का नाम ही है, वही मुझे प्राणों से प्यारा धन दौलत है।
नोट:--- काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के बिना भी मनुष्य का जीवन कठिन ही होता है। इसलिए इन पांचों का मनुष्य के जीवन में बड़ा महत्व है। काम के कारण ही मनुष्य का वंश हीनहीं सारे जीवों का वंश आगे से आगे बढ़ता आया है। क्रोध के कारण ही कोई भी किसी को दुखी नहीं करता है। लोभ के कारण ही मनुष्य कार्य करता है। मोह ममता के कारण ही मनुष्य बच्चों से प्यार कर के पालन  करता है। अहंकार के कारण ही मनुष्य सिर ऊंचा उठा कर के चलता है, मगर जब कोई इन पांचो विकारों का सीमा से अधिक प्रयोग करता है, तब ये पांचों ही हानिकारक सिद्ध होते हैं।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।।

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