क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज!!
चौहदबीं, पंद्रहबीं शताब्दी में भारत के जनता राजाओं, बादशाहों की तलवारों की खनखनाहटों, तोपों के बिस्फोटों के साए में जी रही थी। विदेशी मुस्लिम बादशाहों के दिलों में लोगों के प्रति कोई दया, दर्द नहीं होता था। भारत के राजपूत राजा भी विलासिता के समंदर में डूब कर आनंदपरस्ती करते हुए जिंदा रहने का यत्न कर रहे थे, जनता जाए भाड़ में। ऐसी परिस्थितियों में जब भारत की जनता की शुद्ध लेना वाला कोई भी मनुवादी नहीं बचा, तब जनता की सुरक्षा का दायित्व केवल गुरु रविदास जी महाराज ने निभाया था। तभी तो स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु आदि प्रगास ग्रंथ में फरमाया है कि---
रविदास सोई शूर भला जउ लरै धरम कै हेत।
अंग अंग काटि भूइं गिरै तउ वी ना छांडे खेत।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं, कि वही शूरवीर अच्छा होता है, जो धर्म की रक्षा के लिए लड़ता है। चाहे उस के शरीर के अंग अंग कट कट कर धरती पर गिर जाएं, वह शूरवीर तब भी रणक्षेत्र को नहीं छोड़ता है,  जो व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिए, अपने धर्म का निर्वहन करता है, जो अपने प्राणों की बाजी लगा कर के रणभूमि के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे देता है, वही सच्चा शूरवीर और योद्धा होता है, इस कथन से गुरु रविदास जी महाराज की वीरता का भी एहसास हो जाता है क्योंकि जो व्यक्ति खुद शूरवीर होता है, वही शूरवीरता की बात करता है, जो शूरवीर नहीं होते हैं वे कभी भी ऐसी तर्कसंगत बात मुख से उच्चारण नहीं करते हैं। कायर कभी भी युद्ध क्षेत्र में बड़ी देर तक दुश्मन का मुकाबला नहीं कर पाते हैं और इसलिए वे रणभूमि को छोड़ कर अपने प्राणों की रक्षा करते हुए भाग जाते हैं, इसलिए स्वामी ईशर दास जी महाराज ने भी गुरु आदि प्रगाश ग्रंथ के पृष्ठ नंबर ३४० पर फरमाया है कि--
शूरवीर सोई जानिए जो लड़हूँ दल माहे।
रविदास जउ भाग गया सो तउ सूरा नाही।
सेना संग लड़ने वाला ही वीर योद्धा है:--- गुरु आदि प्रगास ग्रन्थ के रचयिता स्वामी ईशर दास जी महाराज फरमाते हैं, कि गुरु रविदास जी महाराज उसी को शूरवीर बहादुर बताते हैं, जो युद्ध भूमि में अपनी सेना के साथ घमासान युद्ध करते करते दुश्मनों को मार मार कर ढेर लगा देते हैं और खुद भी ईमानदारी से कत्लेआम करते हुए शहीद हो जाते हैं, जो युद्ध भूमि में पीठ दिखा कर भागते नहीं हैं। शरीर का अंग अंग कट जाने के बाद भी दुश्मन को पीठ नहीं दिखाते हैं, वही वीर योद्धा होते हैं। गुरु जी फरमाते हैं कि जो रणक्षेत्र को छोड़ कर के भाग जाते हैं, वे शूरवीर नहीं होते हैं अर्थात वे लोग कायर होते हैं।
खुद शूरवीर होने वाले ही शूरवीरता की बातें कर सकते हैं:--- गुरु रविदास जी महाराज स्वयं शूरवीर और निडर योद्धा थे, तभी तो वे शूरवीरता की बातें करते हैं और समझाते हैं। वे वीरता की मिसालें देते हैं, इसी कारण उन्होंने भारत के मूलनिवासियों की आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस कर जंग ए मैदान में उतरे थे। स्वयं राजनीतिक, धार्मिक, धार्मिक, और सामाजिक लड़ाई लड़ने के लिए भारत की समर भूमि के ऊपर उतर कर मनुवादियों और मुस्लिम बादशाहों के आतंक का मुकाबला किया था, जिन से पूर्व किसी भी समाज सुधारक ने ऐसा क्रांतिकारी खूनी संघर्ष करने का साहस नहीं किया था।
आज धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक वीर क्रांतिकारियों की आवश्यकता:--- गुरु रविदास जी महाराज के मोक्ष प्राप्त करने के बाद भारत में सामाजिक सुधारकों की शून्यता हो गई थी जिन के बाद बिरसा मुंडा, ज्योतिवा फूले, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवालिया, स्वामी अछूतानंद जी महाराज ने सामाजिक क्रांति का बिगुल बजा कर अंग्रेजों को मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए विवश किया था। आज मूलनिवासी राजनेता और धार्मिक नेता इतने स्वार्थी हो गए हैं, कि इन लोगों को केवल मात्र अपने अपने वाल बच्चे, पत्नी और परिवार ही दिखाई देते हैं, जिन के सुधार के लिए ये स्वार्थी लोग दिन रात मनुवाद की जूतियां और तलवे चाट रहे हैं, उन की गुलामी काट रहे हैं और जी, जी कर मर रहे हैं। स्वार्थ सिद्धि के लिए ये लोग अपने मान आत्मसम्मान को भी गिरवी रख रहे हैं। ये इतने बेशर्म हो चुके हैं कि विधायक और सांसद बनने के लिए मनुवादियों की खुशामद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। कांग्रेस, भाजपा पार्टी का टिकट प्राप्त करने के लिए चटाईयां और दरियां तक बिछाने के लिए निम्न से निम्न काम करते जा रहे हैं।
क्रांतिकारी सत्गुरुओं का इतिहास:---सतगुरु रविदास, कबीर जी, और नामदेव जी ऐसे समाज सुधारक हुए हैं, जिन्होंने कभी भी किसी विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय का मुँह तक नहीं देखा था और ना ही इन्होंने क्रांतिकारी शूरवीरों का कोई इतिहास पढ़ा था, इस के बावजूद भी इन वीर मूलनिवासी क्रांतिकारी समाज सुधारकों ने दबे कुचले, अछूत भारतीयों को स्वाभिमान से जीने के लिए मार्ग प्रशस्त करके जीवन के मूल्यों को समझाया था। स्वयं कड़ी से कड़ी मुसीबतों को झेलते हुए अपने सामाजिक क्रांतिकारी आंदोलन में व्यस्त रहे। इन शूरवीर महापुरुषों ने कभी भी अपने प्राणों की परवाह नहीं की थी और तत्कालीन शासकों और धर्म के ठेकेदारों के साथ लोहा लेते रहे, अपनी तर्कसंगत विचारधारा और खूनी क्रांतिकारी आंदोलनों से राजाओं, महाराजाओं, बादशाहों और तिलकधारियों को बुरी तरह पराजित कर के विजय हासिल करते रहे।
मनुवादी गुलामी से मुक्ति पाने की जरूरत:--- आज पुन: जरूरत है, कि गुरु रविदास जी महाराज, सतगुरु कबीर जी, सेंन जी, नामदेव जी, स्वामी अछुतानन्द जी महाराज, गद्दरी बाबा मंगू राम मुगोवालिया, बिरसा मुंडा, साहिब कांशी राम जी के संघर्ष और क्रांति को जिंदा रख कर उन के बताए पथ पर चल कर भावी संतानों को मार्ग प्रशस्त किया जाए। इन सभी शूरवीर योद्धाओं, राजनीतिज्ञ, धार्मिक युद्धवीरों और सामाज सुधारकों की तरह पचासी प्रतिशत मूलनिवासियों के दिलों में क्रांतिकारी भाव पैदा कर के मनुवादी गुलामी से मुक्ति दिलाई जाए।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष,
विश्व आदि धर्म मंडल।। 

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