गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।
।।गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।।
गुरु रविदास जी उस समय अवतरित हुए थे, जब मुस्लिम शासक वर्ग हिन्दुओं का नामोनिशान मिटाता जा रहा था, केवल बादशाहों की तलबार ही कानून था, वही जल्लाद थीं, वही भारत के हिंदुओं के लिये आतंकवाद था, निरीह, असहाय, अनाथों की तरह भारतीय जीवन जी रहे थे, कोई भी राजा महाराजा भारतीय प्रजा की सुध लेने वाला नहीं बचा था, चालाक ब्राह्मण और राजे महाराजे तो, खूनी बादशाहों के पास आत्मसमर्पण कर के, अपनी और अपने परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करके आराम से, सुखी जीवन बसर कर रहे थे मगर प्रजा भाड़ में चनों की तरह भुनती ही जा रही थी, ऐसे हालातों में, गुरु रविदास जी ने, भारतीयों की सुरक्षा की कमान अपने हाथों में ले ली थी, जिसके सेनापति, कमांडर, सतिगुरु कबीर साहिब, सतिगुरु नानकदेव जी थे।
गुरु रविदास जी के महासंग्राम के हथियार थे, वाणी के ऐटम बम, दूर और नजदीक से मार करने वाले मिजायल, शब्द ही राकेट लांचर थे, जिनके कोई बंकर नहीं थे, अगर बंकर थे तो, गुरु कबीर साहिब, और गुरु रविदास जी के मन-मस्तिष्क ही थे, जहाँ से ये हथियार, तत्काल निकलते थे, जब जरूरत हुआ करती थी। कबीर साहिब की वाणी के मिजायल तो इतने निष्ठुर, निर्मम और इतने सटीक निशाना लगाते थे कि, ब्राह्मणवाद और, मुस्लिम बादशाहों के, मन मस्तिष्क और दिलों को छलनी छलनी कर देते थे, हजारी प्रसाद द्विवेदी तो, उन्हें सभी भाषाओं का तानाशाह कहते थे, गुरु रविदास जी महाराज तो आज से पाँच सौ साल पहले, एक मिजायल से दो दो निशाने करते करते थे, ब्राह्मणवाद और तत्कालीन शासक वर्ग में, तरथल मचा देते थे, क्रांतिवीर, क्रान्तिनायक गुरु रविदास जी ने, सामाजिक आतंकवाद फैलाने बालों को मारने के लिए, तीक्ष्ण मारू राग को, सबसे अधिक प्रयोग किया और अत्यचारियों को बुरी तरह से, इस के निशाने पर रखा और आत्मसमर्पण करने के लिए विवश किया था, उनकी जवान तक बन्द कर दी थी। गुरु जी के मारू राग नामक मिजायल का, कोई बादशाह, महाराजा सामना नहीं कर पाया था और उन्हें हाथ खड़े करके, अपने चरणकमलों पर झुकाने के लिए मजबूर कर दिया था। गुरु रविदास के अस्त्र शस्त्र दोधारी थे, एक ही पंक्ति के दो दो अर्थ, निकालने वाले, मारू राग में गाए गए शब्द शासकों, मुल्लों, मौलवियों, पादरियों, पँडे पुजारियों, पोंगापंथियों, तिलकधारियों के लिए आफत बनी हुई थी।
प्रोफेसर लालसिंह जी अपने शोध काव्य, "आदिधर्म बनाम विश्व धर्मग्रंथ आदि पोथी साहिब दे सिरजक सतिगुरु रविदास जी" के पृष्ठ संख्या,118 पर राँगों के उपयोग और दोधारी मारकाट का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि, गुरु ग्रँथ साहिब के बीच,गुरु रविदास जी का, एक शब्द दो राँगों में दर्ज है, ये एक वहुत बड़ा चमत्कार है और है भी अर्थपूर्ण तथा भरपूर। कुछ एक लफ्जों को बदल कर, एक शब्द को दूसरे राग के बीच ओतप्रोत करके एक सुर करना एक महान संगीत सम्राट का ही काम है, ये काम आम संगीतकार का नहीं है, यही कारण है कि, गुरु रविदास जी के बिना, किसी भी और ज्योतिर्ज्ञानी महापुरुषों का एक शब्द, दो दो राँगों में दर्ज नहीं है। ये तथ्य केवल गुरु रविदास जी को ही एक महानतम संगीत सम्राट और राँगों के स्वभाव समझने वाले महानतम मनोविज्ञानी और राँगों का उत्तम माहिर साबित करते हैं। उदाहरण के तौर पर, गुरु ग्रँथ साहिब में दर्ज," सुख सागर सुरतर चिन्तामणि कामधेनु बस जा के" पहले सोरठ राग में दर्ज है, फिर यही शब्द, 'सुख सागर सुरितरि चिंता मणि कामधेनु वस जा के रे" मारू राग में दर्ज है। इस तथ्य का अर्थ भरपूर मन्तव्य भी है और महत्व भी मन्तव्य है।
1 विश्व शान्ति बनाए रखने के लिए दुश्मन को प्यार से समझाना है, क्योंकि सोरठ राग प्रेम और शान्ति का राग है।
2 दूसरा मन्तव्य है, यदि दुश्मन को प्रेम और शान्ति की बोली समझ ना आए, तो हथियारबन्द शक्ति के साथ क्रान्ति मचाने का हुकम है, वह भी उन लोगों के द्वारा जिन को समाज ने, सबसे घृणित निम्न दर्जे के गुलाम बनाया गया है। हथियारबन्द क्रान्ति मचाने का हुकम सही है, क्योंकि मारू राग, युद्ध का राग है, जिस्मानी युद्ध (मैदानी युद्ध) का राग है, मानसिक या बातचीतें करने वाला युद्ध का राग नहीं है, इसके महत्वपूर्ण तथ्य हैं:-----
1 गुरु रविदास जी ने, एक शब्द को दो राँगों के बीच देकर जीव को, प्रेम और शान्ति कायम रखने के लिए दिशा-निर्देश दिए हैं।
2 यदि कोई जालिम प्रेम की भाषा को ना समझे तो पीड़ितों को, कहने का भाव दूसरे दर्जे के लोगोँ को, हकीकी युद्ध लड़ने का अचूक और परिपक्व हुक्म है।
3 इस तरह गुरु रविदास जी ने, एक शब्द को दो राँगों में दर्ज करके, दो विचारधारों का सृजन किया है
क विश्व, समाज में प्रेम और शान्ति का वातावरण बनाए रखने के लिए, गुरु जी की प्यार से भरपूर विचारधारा है।
ख यदि जालिम विश्व समाज की शान्ति भंग करने पर तुला हुआ है, किसी भी तरह बार बार समझाने पर भी नहीं रुकता है, तो क्रान्तिकारी विचारधारा का सृजन कर के उसे क्रान्ति मचा कर, शान्ति का वातावरण स्थापित करने का हुकम है।
गुरु रविदास जी महाराज ने, अपनी वाणी के प्रत्येक शब्द में, जहाँ पर शान्ति के शूक्ष्म जीवाणुओं का समावेश किया है, वहां पर उन्होंने राग मारू जैसे राग के माध्यम से क्रान्ति करने का भी, आह्वान किया हुआ है जिस से, अत्याचारी का मनोबल तो गिरेगा और जो मन में अत्याचार के भाव पाले हुए है, वह भी हतोउत्साहित होंगे, जिससे निम्न वर्ग में सुरक्षा की भावना जन्मेगी, आत्मबल बढ़ेगा, आतताईयों पर नकेल कसती जाएगी। गुरु रविदास जी की वाणी का पहला अर्थ, सभी जातियों को प्यार और सदभाव से जीना सिखाता है, अगर फिर भी वह नहीं सुधरता है, तो महाप्रलय का भी अर्थ समझाते हैं, क्योकि रोज रोज के मरने से बेहतर है कि, एक बार ही मार कर मरें, वह भी बड़े स्वाभिमान, सम्मान, शान्ति और आत्मिक सन्तोष से।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
सितंबर 03, 2020।
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