51।स्वामी अच्छूतानंद का मनुस्मृति अनुशीलन।।

अब स्वामी अछूतानंद जी मनुस्मृति के अध्ययन में जुट गए जिससे वे ब्राह्मणवाद के छलों ढोंगों आडंबरों को पूरी तरह जान गए जिसके खिलाफ युद्ध करने केलिये उन्होंने कमर कस ली।अध्ययन के बीच ही उनका कवित्व भी जाग गया और उन्होंने लिखा :----
वेद में भेद छुपाया था,हमें मालूम नहीं था।
हाल पोशीदा रखा था,हमें मालूम नहीं था।
मनु के सख्त थे कानून,हमें मालूम नहीं था।
पढ़ना कतई मना था, हमें मालूम नहीं था।
उपरोक्त पंक्तियों से स्पष्ट ज्ञात होता है कि स्वामी जी को मनस्मृतियों के काले ही नहीं अपितु पाशविक कानूनों के बारे में तनिक भी ज्ञान नहीं था।उनसे ये भेद छुपा कर रखा गया था और सत्यार्थ प्रकाश का ही उन्हें रंग चढ़ाया गया था। मनु के सख्त कानून जब मन मष्तिस्क में विचरण करने लगे तबउन्होंने, ये लिखा कि हमें इनके बारे पता नही था।
आर्य समाज का भांडाफोड़:---स्वामी जी ने सत्य को जानकर जन आंदोलन खड़ा करने केलिये वैराग धारण कर लिया और मूलनिवासियों को मनुवाद के षड़यंत्र के प्रति, नवचेतना जागृत करने लगे।अपने समाज को समझाने लगे कि हम आदिवसी है, मूलनिवासी है, विदेशी आर्यो ने हमारा भारत छीन रखा है, कड़े कानून लागू करके तुम्हें शिक्षा, धन धरती से वंचित कर रखा है।गेहूं चावल दूध घी अच्छे भोजन पर भी प्रतिबन्ध लगा रखा है।बंधुआ मजदूर बना कर शोषण किया जा रहा है। हम अपनी ही धरती पर गुलाम है।
स्वामी जी ने 1912 से लेकर निरन्तर अपने मूलनिवासी समाज मे जागृति पैदा की उतर प्रदेश, मध्यप्रदेश, विहार उड़ीसा, गुजरात तक जनचेतना जगाई।1925 में साहिब मंगूराम मुगोवाल जी से कानपुर में ऐतिहासिक भेंट हुई ।मंगू राम जी भी उतर भारत मे आदिवासी समाज को जगा चुके थे,वे भारत भ्रमण पर थे जिसके अंतिम पड़ाव पर वे उतर प्रदेश की जनता से संपर्क कर रहे थे।दोनों महापुरुषों के मिलन से आदिवासी आंदोलन को बल मिला।एक तरफ स्वामी जी आदि हिन्दू आंदोलन का झंडा तैयार कर चुके थे वहीं मंगू राम जी आदिधर्म की पताका को लहराने केलिये विशाल सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय ले चुके थे।दोनों ही सन्तों ने वहुजन आंदोलन को गति देने केलिये योजनाओं को अंतिम रूप दिया।
स्वामी अछूतानंद जी ने अपने धुंआधार प्रचार से सोए हुए मूलनिवासियों को मनुस्मृतियों, वेदों पुराणों के छलकपटों से मूलनिवासियों को अबगत कराया। उनमें लिखे अमानवीय कानूनों की जानकारी दी, जिससे आदिवासी समाज को एक मंच पर इकठ्ठा कर लिया।जब स्वामी जी का आंदोलन चारों ओर फैल गया, घर घर मे स्वामी जी का यश फैल गया, तब सारे ब्राह्मण व्याकुल हो गए और तत्कालीन प्रकांड ब्राह्मण पण्डित उपदेशक, कविरत्न अखिलानंद ने स्वामी जी को शास्त्रार्थ की चुनोती दे डाली जिसे स्वामी जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।ये शास्त्रार्थ बाइस अक्टूबर 1921 को हुआ जिसमें अखिलानंद बुरी तरह पराजित हुआ जिससे स्वामी जी का यश चारों ओर गुंजायमान होने लगा।इसी कारण दिल्ली स्थित शाहदरा समाज ने एक विशाल सम्मेलन आयोजित करके स्वामी हरिहर अछूतानंद जी को श्री 108 सन्त की उपाधि से अलंकृत किया।अब स्वामी जी को सन्त श्री श्री 108 से पुकारा जाने लगा।

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