56।।।। स्वामी अच्छूतानंद का विरोधी विहारी।।

।।स्वामी अच्छूतानंद जी का विरोधी विहारी।।
आर्य हिंदुओं की नीति आमने सामने युद्ध करने की कभी नही रही, ये लोग छल बल से दुश्मन को मित्र बनाकर दुश्मन से दुश्मन को मरवाते आए हैं,जिसे मैं तो घात की नीति कह कर ही संबोधित करता हूँ।हिंदुओं ने कभी भी शहीद होने का प्रयास नही किया, कहीं कोई सावधानी बरतने में लापरवाही से कोई मर गया तब भी उसे अमर करने केलिये उसे शहीद की मान्यता दे दी है।इतिहास साक्षी है कि जितने युद्ध हुए उसमे अधिकतर भारत के मूलनिवासी ही शहीद हुए हैं फिर भी उनका कहीं इतिहास में नाम हिन्दू लेखकों, इतिहासकारों ने लिखने की जहमत नही उठाई।ना ही मीडिया ने कभी सत्य और ईमान के रास्ते पर चल कर हमारे अवतारों, महापुरुषों के साथ न्याय किया है।
स्वामी अच्छूतानंद महाराज जब तक ब्राह्मणवाद के पक्ष में काम करते रहे, तब तक तो वे उनके आंख के तारे बने रहे मगर जब उन्हें ज्ञात हो गया कि ये हिन्दू ,स्कूलों में अछूत वच्चों के साथ छुआछूत करके, नफरत भरा व्यवहार करते हैं, छात्रों के साथ ब्राह्मण टीचर अमानवीय व्यवहार करके स्कूल छोड़ने केलिये विवश करते हैं, कुत्तों, विल्लों की तरह नालू से पानी पिलाते हैं, तब उनकी आंखें खुली और उनका बाहिष्कार करके अछूतों के उद्धार केलिये जन आंदोलन शुरू किया।स्वामी जी ने अथक प्रयास करके, आदि हिंदुओं में सामाजिक चेतना के साथ राजनैतिक सोच भी विकसित कर दी जिससे हिंदुओं ने उनकी काट केलिये षड़यंत्र करना शुरू कर दिए। स्वामी जी को उनके रास्ते से हटाने और रोकने केलिये गुंडों का सहारा लिया जाना मगर सफलता नही।
लाला लाजपतराय उन दिनों हिंदुओं के नेता उभर रहे थे,जिसने स्वामी जी को रोकने का दायित्व लिया। अनेकों दांवपेच लगाने पर भी उन्हें सफलता हाथ नही लगी।जब उनके गुर्गे स्वामी जी का भाषण सुनते वे खुद ही उनके मुरीद बन जाते थे। जब लाला लाजपतराय के भी हाथ खड़े हो गए तब उन्होंने फिर वही भाई को भाई से लड़ाने की फूट डालो राज करो की योजनाएं बनाई।लाला लाजपतराय ने अछूतों से अछूतों को ही लड़ाने का षडयंत्रकारी कार्यक्रम तैयार किया।उनके साथ ही एक अछूत नेता था जिसका नाम था, चौधरी विहारी लाल। ये आदमी अत्यंत स्वार्थी, बेईमान और कौम का गद्दार नेता था, उसे जहां भी धन मिलता था उस के साथ ही हो लेता था।लाला लाजपतराय ने उसे बुलाकर पूरी ट्रेनिंग दी कि आपने स्वामी जी की सभाओं में किस किस प्रकार हुड़दंग मचाकर उन्हें लक्ष्य से भटकाना है।किस प्रकार उनके स्वच्छ चरित्र का हनन करके अपमानित करना है। कौम के गद्दार, विहारी लाल को तीखी धार देकर तैयार किया गया।
जहां कहीं भी स्वामी जी का कार्यक्रम होता, सभा, सम्मेलन होता, विहारी लाल और उसके साथी वहां पहुँच जाते और उनकी सभाओं में हुड़दंग मचाते। उनके चरित्र हनन की झूठी गाथाएं बनाकर आदि हिंदुओं को गुमराह करने का नाटक करते, जन समूह को बरगलाने का काम करते, जनसभाओं में खलल मचा कर स्वामी जी और उनके साथियों को परेशान करते, कई बार स्वामी जी के शालीन कार्यकर्ताओं ने उसे समझाया मगर कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं हुई,जब उसे अकल नहीं आई तो आदि हिंदुओं ने उसकी सेवा भी की।इसके बाबजूद भी वह बेशर्म हरकतें करता ही रहा।
स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज,अपनी चाल से तनिक भी विचलित नहीं हुए,वे निर्वाध गति से आदि हिंदुओं को जागृत करते ही गये,जो उनके समक्ष अड़ा, वह वहुत बुरी तरह झड़ा।

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