59।।स्वामी अच्छूतानंद, स्वामी ईशरदास और मंगूराम मुगोवाल।।
।।स्वामी अच्छूतानंद, स्वामी ईशरदास और मंगू राम मुगोवाल।।
स्वामी ईशरदास जी महाराज के, आदेशानुसार, साहिवे कलाम मंगूराम मुगोबाल ने भारत रत्न डाक्टर भीमराव से मन्त्रणा करके लुधियाना में सन्त सम्मेलन की रुपरेखा बना ली। साहिवे कलाम मंगूराम मुगोवाल ने सबसे पहले स्वामी ईशरदास जी महाराज से सन्त सम्मेलन के बारे में विचार विमर्श किया, उन्होंने स्वामी ईशरदास जी को बताया, कि धर्म ग्रँथ के बिना लोथियन कमेटी के सामने हम जीत नहीं सकेंगे, इसीलिये सन्त सम्मेलन में जनमत लेकर ही हम ग्रँथ को सरकार से मान्यता भी ले सकेंगे और ब्रिटिश सरकार को सबूत भी प्रस्तुत कर सकेंगे। उतर प्रदेश कानपुर से स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज को भी सन्त सम्मेलन में शिरकत करने के लिये भी निमंत्रण पत्र भेजा गया। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, मंगूराम जी के प्रयासों से वहुत ही आह्लादित हो उठे और वे आंदोलन की सफलता पर भरोसा करने लगे। स्वामी अच्छूतानंद जी भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंवेदकर की शिक्षा और तार्किक बुद्धि और मंगू राम मुगोवाल जी के तत्कालिक निर्णयों के कायल थे। वे समझ रहे थे, कि अछूतों का भविष्य, उज्ज्वल होता जा रहा है। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज और मंगूराम जी ने अपने अपने साथी साधु संतों को सन्त सम्मेलन में बुला लिया।
लुधियाना में स्वामी ईशरदास जी महाराज की अध्यक्षता में सन्त सम्मेलन शुरू हुआ जिसमें, साहिवे कलाम मंगूराम मुगोवाल ने, मंच का संचालन करते हुए, सभापति से कार्यवाही प्रांरभ करने की अनुमति मांगी, जिसे अध्यक्ष स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, सम्मेलन शुरू करो, कह कर दे दिया। साहिवे कलाम मंगू राम जी ने उपस्थित सन्तों और सँगत को बताया कि, हमने जो मेमोरेंडम, अंग्रेज सरकार को दिये थे, जिनमें हमने अंग्रेज सरकार से कहा था कि, हम भारत के असली आदिवासी हैं और हम आदधर्म के अनुयायी है, हम गुलामों के गुलाम हैं, हमें अलग से विशेष अधिकार दिए जाएं। जिस की रिपोर्ट लार्ड साइमन ने अंग्रेजी हकूमत दे दी है जिसके परिणामस्वरूप, लार्ड लोथियन कमेटी लाहौर आ रही है, वह ये जानेगी कि, क्या आदिधर्मी, हिन्दुधर्मी, क्रिश्चियन धर्मी, सिखधर्म भारत में रहते हैं या नही। इसके लिये लार्ड लोथियन पूछ सकता है कि, तुम्हारा धर्म क्या है? तुम्हारा पंथ क्या है? अपना धर्मग्रँथ बताओ, यही आप सन्त महापुरुषों के समक्ष, मैं प्रस्ताव आप रख रहा हूँ:----
1 हमारा धर्मग्रंथ कौन तैयार करेगा?
2 हमारे धर्मग्रंथ का नाम क्या होगा।
3 हमारे अवतार कौन कौन होंगे?
4 धर्मग्रंथ कब तक बन कर तैयार होगा?
5 किन किन गुरुओं, सन्तों की वाणी इस धर्म ग्रँथ में शामिल की जाए।
उपस्थित सन्त वृन्द ने एक स्वर में कहा, स्वामी ईशरदास जी महाराज ही वाणी लिखते हैं और सस्वर गाते भी हैं, इनसे अच्छा और कोई सन्त, पीर, औलिया नहीं है, जो ग्रँथ रचना कर सकता है, यही ग्रँथ का नामकरण करेंगे और जिन जिन गुरूओं की वाणी ग्रँथ में शामिल की जाएगी, वे ये अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिये इन्हें ये पवित्र दायित्व सौंपा जाए। करतल ध्वनि में ये प्रस्ताव पास हो गया। सभी ने खालस आदि गुरूओं की वाणी को आदिवासियों के धर्म ग्रँथ में शामिल करने की भी स्वीकृति दी।
अप्रेल सन 1932 में लार्ड लोथियन कमीशन को सभी धर्मों की वास्तविकता का आकलन करने केलिये, लार्ड रैम्जे की ब्रिटिश सरकार ने भारत भेजा। लार्ड लोथियन जब लाहौर पहुँचा तो उन्हें सवर्णों के विरोद्ध का सामना करना पड़ा। लाहौर असेंबली हाल में सम्मेलन शुरू हुआ था, जिसमें आदिधर्म, हिन्दू, सिख, मुसलमान, ईसाई धर्मों के नेताओं ने अपने अपने आसन ले लिए थे। आदिधर्म के पलीडर के डाक्टर भीमराव अंवेदकर भी हाल में पहुँच गए थे मगर आदिधर्म का कोई नेता सम्मेलन मे इसलिये नहीं बुलाया गया था, क्योंकि गांधी के साथ, समूचा मनुवाद ही नही, सिख, मुस्लिम तंत्र ब्रिटिश सरकार को कहता था कि, आदिधर्म और आदिधर्मी, भारत में हैं ही नहीं, परन्तु इस सच्चाई को प्रमाणित करने के लिये साहिवे कलाम मंगूराम जी ने पांच हजार आदिधर्मियों का जत्था लाल पगड़ियां पहन कर, तैयार किया हुआ था। ज्यों ही लाहौर असेंबली में लोथियन की अध्यक्षता में, सम्मेलन प्रारंभ हुआ, त्यों ही मंगूराम जी के बहादुर लाल वीर सपूत लाल पगड़ीधारी परबानों ने सड़कों के ऊपर गुरु रविदास शक्ति अमर है, नारे लगाने शुरू करते हुए असेंबली हाल की ओर बढ़ते हुए चल पड़े, जब हजारा राम और उनके साथियों ने, नारे लगाने शुरू कर दिए और उनकी आवाज लोथियन के कानों में पड़ी, जिन्हें सुन कर वह घवरा गया, उसने सोचा, स्वतन्त्रता सेनानियों ने विद्रोह कर दिया, जिससे भयभीत होकर लार्ड लोथियन भाग कर असेंवली हाल की बाहर बनी हुई गैलरी में आ गया, डाक्टर भीमराव अंवेदकर ही इस आंदोलन के बारे में जानते थे, क्योंकि उनके अतिरिक्त किसी को भी मंगूराम जी ने इस आयोजन की भनक नहीं लगने दी थी। जब सहमा हुआ, लोथियन दौड़ता कर बाहर आया, तो उनके पीछे पीछे ही डाक्टर भीमराव भी बाहर गैलरी में आ गए। डरे हुए लोथियन ने, डाक्टर भीम राव अंवेदकर से पूछा, ये लाल पगड़ीधारी कौन हैं? तब डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने, लार्ड लोथियन को बताया, ये वे लोग हैं, जिन्हें मिस्टर गांधी कहता है, कि अछूत भारत में हैं ही नहीं। लोथियन को जब सत्य का पता चला, तब उसे सांस भी ठीक ढंग से आने लगा। लार्ड लोथियन ने डाक्टर अंवेदकर से कहा, ठीक है, इन्हें कहीं छाया में बैठा दो और इनके पांच मुख्य सदस्य असेंवली हाल में बुला लो।
स्वामी ईशरदास जी महाराज के, आदेशानुसार, साहिवे कलाम मंगूराम मुगोबाल ने भारत रत्न डाक्टर भीमराव से मन्त्रणा करके लुधियाना में सन्त सम्मेलन की रुपरेखा बना ली। साहिवे कलाम मंगूराम मुगोवाल ने सबसे पहले स्वामी ईशरदास जी महाराज से सन्त सम्मेलन के बारे में विचार विमर्श किया, उन्होंने स्वामी ईशरदास जी को बताया, कि धर्म ग्रँथ के बिना लोथियन कमेटी के सामने हम जीत नहीं सकेंगे, इसीलिये सन्त सम्मेलन में जनमत लेकर ही हम ग्रँथ को सरकार से मान्यता भी ले सकेंगे और ब्रिटिश सरकार को सबूत भी प्रस्तुत कर सकेंगे। उतर प्रदेश कानपुर से स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज को भी सन्त सम्मेलन में शिरकत करने के लिये भी निमंत्रण पत्र भेजा गया। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, मंगूराम जी के प्रयासों से वहुत ही आह्लादित हो उठे और वे आंदोलन की सफलता पर भरोसा करने लगे। स्वामी अच्छूतानंद जी भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंवेदकर की शिक्षा और तार्किक बुद्धि और मंगू राम मुगोवाल जी के तत्कालिक निर्णयों के कायल थे। वे समझ रहे थे, कि अछूतों का भविष्य, उज्ज्वल होता जा रहा है। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज और मंगूराम जी ने अपने अपने साथी साधु संतों को सन्त सम्मेलन में बुला लिया।
लुधियाना में स्वामी ईशरदास जी महाराज की अध्यक्षता में सन्त सम्मेलन शुरू हुआ जिसमें, साहिवे कलाम मंगूराम मुगोवाल ने, मंच का संचालन करते हुए, सभापति से कार्यवाही प्रांरभ करने की अनुमति मांगी, जिसे अध्यक्ष स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, सम्मेलन शुरू करो, कह कर दे दिया। साहिवे कलाम मंगू राम जी ने उपस्थित सन्तों और सँगत को बताया कि, हमने जो मेमोरेंडम, अंग्रेज सरकार को दिये थे, जिनमें हमने अंग्रेज सरकार से कहा था कि, हम भारत के असली आदिवासी हैं और हम आदधर्म के अनुयायी है, हम गुलामों के गुलाम हैं, हमें अलग से विशेष अधिकार दिए जाएं। जिस की रिपोर्ट लार्ड साइमन ने अंग्रेजी हकूमत दे दी है जिसके परिणामस्वरूप, लार्ड लोथियन कमेटी लाहौर आ रही है, वह ये जानेगी कि, क्या आदिधर्मी, हिन्दुधर्मी, क्रिश्चियन धर्मी, सिखधर्म भारत में रहते हैं या नही। इसके लिये लार्ड लोथियन पूछ सकता है कि, तुम्हारा धर्म क्या है? तुम्हारा पंथ क्या है? अपना धर्मग्रँथ बताओ, यही आप सन्त महापुरुषों के समक्ष, मैं प्रस्ताव आप रख रहा हूँ:----
1 हमारा धर्मग्रंथ कौन तैयार करेगा?
2 हमारे धर्मग्रंथ का नाम क्या होगा।
3 हमारे अवतार कौन कौन होंगे?
4 धर्मग्रंथ कब तक बन कर तैयार होगा?
5 किन किन गुरुओं, सन्तों की वाणी इस धर्म ग्रँथ में शामिल की जाए।
उपस्थित सन्त वृन्द ने एक स्वर में कहा, स्वामी ईशरदास जी महाराज ही वाणी लिखते हैं और सस्वर गाते भी हैं, इनसे अच्छा और कोई सन्त, पीर, औलिया नहीं है, जो ग्रँथ रचना कर सकता है, यही ग्रँथ का नामकरण करेंगे और जिन जिन गुरूओं की वाणी ग्रँथ में शामिल की जाएगी, वे ये अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिये इन्हें ये पवित्र दायित्व सौंपा जाए। करतल ध्वनि में ये प्रस्ताव पास हो गया। सभी ने खालस आदि गुरूओं की वाणी को आदिवासियों के धर्म ग्रँथ में शामिल करने की भी स्वीकृति दी।
अप्रेल सन 1932 में लार्ड लोथियन कमीशन को सभी धर्मों की वास्तविकता का आकलन करने केलिये, लार्ड रैम्जे की ब्रिटिश सरकार ने भारत भेजा। लार्ड लोथियन जब लाहौर पहुँचा तो उन्हें सवर्णों के विरोद्ध का सामना करना पड़ा। लाहौर असेंबली हाल में सम्मेलन शुरू हुआ था, जिसमें आदिधर्म, हिन्दू, सिख, मुसलमान, ईसाई धर्मों के नेताओं ने अपने अपने आसन ले लिए थे। आदिधर्म के पलीडर के डाक्टर भीमराव अंवेदकर भी हाल में पहुँच गए थे मगर आदिधर्म का कोई नेता सम्मेलन मे इसलिये नहीं बुलाया गया था, क्योंकि गांधी के साथ, समूचा मनुवाद ही नही, सिख, मुस्लिम तंत्र ब्रिटिश सरकार को कहता था कि, आदिधर्म और आदिधर्मी, भारत में हैं ही नहीं, परन्तु इस सच्चाई को प्रमाणित करने के लिये साहिवे कलाम मंगूराम जी ने पांच हजार आदिधर्मियों का जत्था लाल पगड़ियां पहन कर, तैयार किया हुआ था। ज्यों ही लाहौर असेंबली में लोथियन की अध्यक्षता में, सम्मेलन प्रारंभ हुआ, त्यों ही मंगूराम जी के बहादुर लाल वीर सपूत लाल पगड़ीधारी परबानों ने सड़कों के ऊपर गुरु रविदास शक्ति अमर है, नारे लगाने शुरू करते हुए असेंबली हाल की ओर बढ़ते हुए चल पड़े, जब हजारा राम और उनके साथियों ने, नारे लगाने शुरू कर दिए और उनकी आवाज लोथियन के कानों में पड़ी, जिन्हें सुन कर वह घवरा गया, उसने सोचा, स्वतन्त्रता सेनानियों ने विद्रोह कर दिया, जिससे भयभीत होकर लार्ड लोथियन भाग कर असेंवली हाल की बाहर बनी हुई गैलरी में आ गया, डाक्टर भीमराव अंवेदकर ही इस आंदोलन के बारे में जानते थे, क्योंकि उनके अतिरिक्त किसी को भी मंगूराम जी ने इस आयोजन की भनक नहीं लगने दी थी। जब सहमा हुआ, लोथियन दौड़ता कर बाहर आया, तो उनके पीछे पीछे ही डाक्टर भीमराव भी बाहर गैलरी में आ गए। डरे हुए लोथियन ने, डाक्टर भीम राव अंवेदकर से पूछा, ये लाल पगड़ीधारी कौन हैं? तब डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने, लार्ड लोथियन को बताया, ये वे लोग हैं, जिन्हें मिस्टर गांधी कहता है, कि अछूत भारत में हैं ही नहीं। लोथियन को जब सत्य का पता चला, तब उसे सांस भी ठीक ढंग से आने लगा। लार्ड लोथियन ने डाक्टर अंवेदकर से कहा, ठीक है, इन्हें कहीं छाया में बैठा दो और इनके पांच मुख्य सदस्य असेंवली हाल में बुला लो।
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