23।।शव्द।।

            ।।शव्द कलँगड़ा।।
सच्चे सतगुर दे लड़ लग के दिल दा मतलब पाया मैं।
ढूंढ देखी सभी लुकाई,भोंदा फिरदा आया मैं।।
पहिलां इक मैं पन्थ चलाया खाना पीणा सब छड़वाया।
वसदी छड जंगल नूं धाया ना कुछ हासिल पाया मैं।।
दुए पन्थ दी सेवा लाई,उसने सिर ते जूत रखाई।
तन ते अंग भबबूत रमाई,मथे तिलक लगाया मैं।।
फिर मैं वन वन खोजन जाई, जाई के देवी जोत जगाई।
मेरे करमा ना कुझ भी आई,हो नराशा मन मे आई ।।
फिर मैं तीर्थ में जा के नहाया ,कन्द मूल फल वन के खाया।
उड़क रव ने मेल मिलाया,सतगुर चरनी लाया मैं।।
जब घुंडी गुरु बतलाई, सारा अंधेर कुफ़र दा जाई।
गैवी समा दी होई रूशनाई, अपना नाम सुधाया मैं।
मम भली है जिन्द पियारी, ईशरदास मुझ मिले अवतारी।
भजन दास मैं सद बलिहारी अपना आप लभाया मैं।।
--::कर्ता::--
रामलोक, पुन्नू राम सकना,गुलजारी राम पनपुर, डाकखाना सेंसोवाल,जिला होशियारपुर।
।।शव्द तिलंग।।
वीरो जी सानूं लुट लिआ आन ही जाति।
अनक देवी देहरे बुत बना कर अनक धाम पूजाति ।।
नवें पुराणे मत चला कर पुस्तकां मध फंसाती।।
भोली भाली कौमे नस नस फाथे हेड़िया जाल लगाती।।
आपणा गुआवन अवराँ बणावण भुल गई साडी जाति।
तुसीं उहनां नूं रव कर पूजे जेहड़े कौम दे घाती।
प्रिथमे मगर लगा कर सानूं पाछे दुर दुर कराती।
धाम बनाए कोई जयदाद बनाई, खा लई अवरण जाति।
भगवानदास कुझ होश करो,तां निज क्यों ना धाम बनाती।
।।शव्द मारू।।
ना खाबो ना खाबो धक्के चल चल,तुसीं उहनां वल हो गेडे जांदे ओह कहिन्दे पिछाँ नूं घल घल।
सदियां लाँघियां क्यों ना बणिया बैठे सभ कुझ मल मल।
पाछे होश नाशी हुन आई खा गए बदन की खल खल।
कौम दा हाल देख देख के आफत मद रोन रोन पल पल।

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