54।।स्वामी अच्छूतानंद और कांग्रेसी स्वराज आंदोलन।।

।।स्वामी अच्छूतानंद और कांग्रेसी स्वराज आंदोलन।।
साहिब मंगूराम मुगोबाल औऱ स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, वहुजन समाज की दोहरी गुलामी की बेड़ियों को काटने केलिये सिरधड़ की बाजी लगाए हुए थे।वहुजन समाज विदेशी शासकों की गुलामी के साथ हिंदुओं की गुलामी को सहन करता आ रहा था जिससे मुक्ति दिलाने केलिये वहुजन समाज सुधारकों ने ही बीड़ा उठाया हुआ था।हजारों वर्षों की अनपढ़ता औऱ दासता ने वहुजन समाज की राजनैतिक सोच को समाप्त कर रखा था।हिन्दू वहुजन समाज को अपने हथियार के रूप में अंग्रेजों और मुसलमानों के खिलाफ प्रयोग करते आए थे मगर अंग्रेजों ने वहुजन समाज के लिये शिक्षा प्राप्त करने के, जो रास्ते खोल दिये उससे वहुजन भी शिक्षा ग्रहण करने लगे।कुछ पढ़ लिखकर हिंदुओं की मानसिकता को समझने परखने लगे और मनुवादी षडयन्त्रों के खिलाफ विद्रोह करने पर उतारू हो गए। कांग्रेस स्वराज केलिये लड़ रही थी मगर अछूतों को गुलाम ही बनाए रखने केलिये अंदर ही अंदर षडयंत्र चला रही थी।
अगर हम स्वतन्त्रता आंदोलन के इतिहास के पन्नों को खंगालें तो पता चलेगा कि,कहीं भी किसी भी अछूत नेता को इतिहास में किसी भी इतिहासकार ने कोई सम्मानजनक स्थान नही दिया है।बिरसामुण्डा ने अपने पराक्रम से अंग्रेजों का कत्लेआम करके खून की नदी बहाई थी औऱ उन्हें मध्यप्रदेश की सीमा पर ही रोक दिया था परंतु इतिहास में गुमनाम कर दिए गए, तिलकामांझी ने सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था,उस का नाम भी गुमनाम करके मंगल पांडे ब्राह्मण को ही ये सम्मान दिया गया।कोरेगांव के जावांज चमारों ने अंग्रेजों को रोकने केलिये, अछूतों की मुक्ति का, पेशवा के पास प्रस्ताव रखा, तब भी उनके प्रस्ताब को ठुकरा दिया गया, अंग्रेजों की हार स्वीकार कर ली परन्तु अछूतों की आजादी रास नही आई, मनुवादी मीडिया ने आज तक भारत के बहुजनों को भनक नही लगने दी, आज भी अगर सोशल मीडिया ना होता तो ये कोरेगांव का गोल्डन इतिहास आज भी मौन ही रहता।लाखों अछूत स्वतन्त्रता आंदोलन में शहीद हुए मगर किसी की जीवनी किसी भी कक्षा के पाठयक्रम में शामिल नही की गई।किसी भी अछूत महापुरुष का स्टेच्यू किसी भी स्थान पर नही लगाया गया।पंजाब के वीर सपूतों ने बाबा साहिब भीमराव अंवेदकर का स्टेच्यू संसद भवन के पास लगाने केलिये खून की होली खेली तब कांग्रेस की नींद खुली और संसद भवन की ओर उंगली किया हुआ स्टेच्यू लगाया, उनको पाठयक्रम में शामिल किया गया, उसमें भी सविधान लिखने के कारण आधुनिक मनु ही लिखा गया जबकि उन्होंने मनुस्मृति का दहन किया था। स्वतन्त्रता आंदोलन में पंजाबी वीर सपूत साहिब मंगूराम मुगोबाल ने गद्दर पार्टी में शामिल होकर तोफ के सामने खड़े होकर जो मौत को हराया उसका कहीं मनुवादी लेखकों, कवियों, इतिहासकारों ने जिक्र तक नहीं किया।जनता ने जब आवाज उठाई तब,इंदिरा गांधी को होश आई और उन्हें ताम्र पत्र से सम्मानित करके, राष्ट्रीय स्तर पर स्वतन्त्रता सेनानी के रूप मान्यता दी और बीस एकड़ जमीन देकर उन्हें सम्मानित किया गया।डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने तो विशाल भारतका सँविधान लिखा मगर उन्हें भी सविधान सभा के चुनाब में हरा दिया गया।अगर पूर्वी बंगाल के जोगिंदर मंडल सीट से त्यागपत्र नहीं देते तब तो, उन्हें सँविधान सभा मे घुसने ही नहीं दिया जाता, वहुजन समाज के ही प्रखर, ब्राह्मणवादी नेता बल्लभभाई पटेल ने ही ये कहा था कि हमने अंवेदकर केलिये संसद के दरवाजे तो बन्द किये ही हैं, खिड़कियां भी बन्द कर दीं हैं,इस कथन से कांग्रेस की अछूत विरोद्धि नीतियों का पर्दाफास होता है।
स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज, तब तक प्रिय लगते रहे जब तक वे ब्राह्मणवाद की अर्थी को उठाते रहे परन्तु जब उन्हें पता लगा कि ये लोग अछूतों के साथ हर क्षेत्र में भेदभाव ही नही अन्याय भी करते है, जालमो की तरह व्यवहार करते हैं,तब उन्हें, आंखों का कांटा समझा जाने लगा, उन्हें पर्दे से हटाने केलिये कई प्रयास किये गए मगर वे अपने रास्ते से तनिक भी नही डगमगाए और अपनी मंजिल की ओर बढ़ते ही गये। स्वामी जी ने अपने आदि हिन्दू सम्मेलनों में अछूतों को समझाया,हम गुलामों के गुलाम हैं, हमें ये ग़ुलाम, अंग्रेजों औऱ मुसलमानों से लड़ा कर मारते जा रहे हैं, हिंदुओं के हम तीनों ही दुश्मन हैं, ये अंग्रेजों और मुसलमानों को भारत से भगाने केलिये स्वराज आंदोलन चलाते हैं
मगर अछूतों की मुक्ति की बात नहीं करते,अपने आंदोलन में हमें ही आगे रख कर मरबाते हैं जिसे हम नहीं समझते, हमें अपनी आजादी की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी, हमारे सबसे बड़े दुश्मन आर्य हिन्दू हैं।हमें अपनी राजनीतिक सोच को जन जन तक पहुँचाना होगा, जब तक हम राजनीतिक सोच नही पैदा करेंगे तब तक हमारा कल्याण संभव नही है।मैंने अनुभव किया है कि सामाजिक आंदोलन से मनुवाद से मुक्ति मिलने वाली नही,हमें राजसत्ता छिनने केलिये लामबंद होना पड़ेगा।स्वामी जी के आदि हिन्दू आंदोलन को राजनीति में परिवर्तित होते देखकर आर्य हिन्दू बौखला उठे और स्वामी जी को और अधिक आतंकित करने लगे परन्तु स्वामी जी का कारवां और उग्र होता गया।
इतिहास को खोलकर देख लो कहीं भी कांग्रेस ने अछूत वर्ग की मुक्ति केलिये कोई आंदोलन नहीं चलाया केवल झूठे नारे लगाए और वहुजन समाज के वोट ही लिए।गरीबी हटाओ देश बचाओ जैसे नारों से अछूतों के दिलों को जीता मगर कांग्रेस ने भीतरघात करके अछूतों को धन धरती नहीं बांटी, केबल साहिब कांशीराम जी के वहुजन आंदोलन में जब ये नारा गूंजने लगा कि
जो जमीन सरकारी हैबो हमारी है, उस गूंज से घबराकर और बौखला कर एक एक एकड़ भूमि कुछ ही भूमिहीनों को दी गई।

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