58।। स्वामी अच्छूतानंद और साइमन रिपोर्ट।।
।।स्वामी अच्छूतानंद और साइमन रिपोर्ट।।
13 साईमन कमीशन की रिपोर्ट पर चर्चा करने केलिये ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने बारह नबंबर सन 1930 को लन्दन में गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई जिसमें मुस्लिम कायदे आज़म सर आगा खान, मुहंम्मद अली जिन्नाह, मौलवी फजल हक, सर मुहंम्मद शफी, हिंदू महासभा की ओर से बी एस मुन्जे, एम आर जयकर, लिबरल फ्रंट की ओर से तेज वहादुर सप्रू, सी वाई चिंतामणी, श्री निवास शास्त्री, सिखों की ओर से सरदार उज्ज्वल सिंह, अवसादग्रस्त वर्ग की ओर से डाक्टर भीमराव अंवेदकर, रियासतों और राज्यों की ओर से अक़ीद हैदरी, मिर्जा इस्माइल,महाराजा भूपेंद्र सिंह, सयाजी राव गायकबाड़, हरिसिंह, गंगा सिंह, हम्मी दुल्ला खान, के एस रणजीत सिंह, जयसिंह प्रभाकर ने भाग लिया। ये सम्मेलन तेरह जनबरी1931 तक चला।
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय लोकतंत्र की स्थापना केलिये मुख्यतः सँविधान मसौदे पर ही अधिक चर्चा की। सरकार को भारत के अलग अलग फिरकों की जानकारी और उनकी समस्याओं के बारे में साईमन ने सरकार को रिपोर्ट में लिख कर दिया था जिसपर भी चर्चा शुरू हुई जिससे हिन्दू मुस्लिम नेता आहत हो गए क्योंकि ये लोग अछूतों के बारे में कोई वार्ता करने के पक्ष में नहीं थे मगर डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने अछूतों की दर्दनाक दुर्दशा का व्याख्यान दे ही दिया, जिससे सभी भड़क गए और सम्मेलन बिना किसी नतीजे पर पहुँचे ही समाप्त हो गया।सभी प्रतिनिधि निराश होकर भारत वापस आ गए।
ब्रिटिश सरकार ने विशाल भारतीय साम्राज्य को सांप्रदायिकता के आधार पर, खण्ड खण्ड करके ही नहीं, हिंदुस्तान, मुस्लिमस्तान, अछूतिस्तान, खलसास्तान आदि देश बनाने की भूमिका तैयार कर ली, ताकि भारत कमजोर हो जाए। कांफ्रेंस के निर्णयों की घोषणा से स्पष्ट हो गया कि भारत को धर्मो के आधार पर बांटा जाएगा जिससे गांधी ही नहीं समूची कांग्रेस सकते में पड़ गई, क्योंकि किसी को भी हिंदुओं, मुस्लिमों, सिखों के कारण कोई दुख नही नहीं था, इन सबको केवल परेशानी अछूतों को मिलने वाले,गणराज्य और अधिकारों, के कारण हुई, ये तीनों वर्ण अछूतों को बांट कर अपने गुलाम बनाकर रखना चाहते थे।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में जो बात उभर कर सामने आई वह यही थी कि भारत के टुकड़े धर्मों के आधार पर होंगे। ब्रिटिश सरकार भारतीय ने धर्मों के बारे में पता लगाने केलिये लॉर्ड लोथियन आयोग की घोषणा कर दी जिससे सारा मनुवाद हिल गया और हिन्दू मुसलमान और सिख अपनी अपनी गोटियां फिट करने लगे।वे समझ गए कि, लोथियन हिन्दू, सिख,मुस्लिम धर्मों की प्रमाणिकता के सबूत मांगेगा जो हमारे पास हैं,मगर अछूतों के पास कोई सबूत नहीं हैं जिसके कारण उन्हें हिन्दू मुसलमान सिख ही माना जाएगा और डाक्टर भीमराव के तर्क निर्मूल ही सिद्ध होंगे। हिन्दू, सिख, मुस्लिम धर्मों के नेता लार्ड लोथियन को फेस करने केलिये चिंतन करने लगे और प्रमाण इकठ्ठे करने लगे, उधर डाक्टर भीमराव अंवेदकर भी ऊहापोह में पड़ गए कि, लोथियन कमेटी तो केवल धर्मों की वास्तविकता पर ही सवाल करेगी, जिसके हमारे पास कोई तर्क वितर्क करने केलिये प्रमाण है ही नहीं।वे बड़े ही असंमजस में पड़ गए और सोचने लगे कि जो हमने, कांफ्रेंस में बीज बोया उसका फल वे लोग ही लेंगें, जिन्होंने कुछ कर्म किया ही नहीं।हिन्दू, हिंदुस्तान ले जाएंगे, मुस्लिम पाकिस्तान ले जाएंगे, सिख खालसास्तान ले जाएंगे और हम हाथ मलते ही रह जाएंगे। डाक्टर भीमराव अंवेदकर थे तो तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ उच्च शिक्षित वकील, इसीलिये उनकी चिंतन शक्ति सभी हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों से कई गुना अधिक थी। उन्होंने चारों ओर नजर दौड़ाई और सोचा, मेरी समस्याओं का समाधान, पंजाब के मंगू राम मुगोबाल ही कर सकते।वे मंगूराम जी के पास आए और उन्हें बताया कि लार्ड लोथियन धर्मों की प्रमाणिकता के बारे में प्रश्न पूछ सकता है जिसके उतर मेरे पास नहीं हैं।मंगू राम जी भी कुशाग्र बुद्धिमान थे, उन्होंने तत्काल उतर देते हुए कहा, धर्म तो हमारा है, ''आदि धर्म,'' फिर आदिधर्म के अवतार भी गुरु रविदास जी, कबीर जी, नामदेब जी, सेन जी,महाऋषि वाल्मीकि जी हैं। डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने कहा, कि मुख्य समस्या तो धर्म ग्रँथ की है,जो हमारे पास दिखाने के लिये नहीं होगा।मंगू राम जी ने मन ही मन में सोचा, ऊना के गांव कुठार खुर्द में कवि एवं लेखक स्वामी ईशरदास जी काव्य रचना करके गुरूओं के नाम से वाणी लिखते हैँ, वहीं चल कर उनसे समस्या का समाधान पूछते हैं।डाक्टर भीमराव अंवेदकर और मंगू राम स्वामी ईशरदास जी के आश्रम में आए और उन्हें ग्रँथ की कमी को लेकर बातचीत की।स्वामी जी भी कुशाग्र बुद्धि ही थे,उन्होंने कहा, आप कमीशन को बता देना कि, हमारा धर्म ग्रँथ गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ है,जो धन की कमी होने के कारण नहीं छप सका।डाक्टर भीमराव को वकीली नुक्ते मिल गए और मन मे गदगद होकर वापस आ गए।जाते समय स्वामी ईशरदास जी ने मंगू राम को बताया ,जल्दी ही अछूत सन्तों का एक सम्मेलन बुलाया ,जिसमे इस ग्रँथ पर चर्चा करके जनमत बनाया जाए ताकि कोई कल को इस निर्णय पर उंगली ना उठा सके।इस निर्णय से स्वामी अछूतानंद जी को भी अबगत करबाया गया तो वे भी बड़े प्रसन्न हुए।
13 साईमन कमीशन की रिपोर्ट पर चर्चा करने केलिये ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने बारह नबंबर सन 1930 को लन्दन में गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई जिसमें मुस्लिम कायदे आज़म सर आगा खान, मुहंम्मद अली जिन्नाह, मौलवी फजल हक, सर मुहंम्मद शफी, हिंदू महासभा की ओर से बी एस मुन्जे, एम आर जयकर, लिबरल फ्रंट की ओर से तेज वहादुर सप्रू, सी वाई चिंतामणी, श्री निवास शास्त्री, सिखों की ओर से सरदार उज्ज्वल सिंह, अवसादग्रस्त वर्ग की ओर से डाक्टर भीमराव अंवेदकर, रियासतों और राज्यों की ओर से अक़ीद हैदरी, मिर्जा इस्माइल,महाराजा भूपेंद्र सिंह, सयाजी राव गायकबाड़, हरिसिंह, गंगा सिंह, हम्मी दुल्ला खान, के एस रणजीत सिंह, जयसिंह प्रभाकर ने भाग लिया। ये सम्मेलन तेरह जनबरी1931 तक चला।
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय लोकतंत्र की स्थापना केलिये मुख्यतः सँविधान मसौदे पर ही अधिक चर्चा की। सरकार को भारत के अलग अलग फिरकों की जानकारी और उनकी समस्याओं के बारे में साईमन ने सरकार को रिपोर्ट में लिख कर दिया था जिसपर भी चर्चा शुरू हुई जिससे हिन्दू मुस्लिम नेता आहत हो गए क्योंकि ये लोग अछूतों के बारे में कोई वार्ता करने के पक्ष में नहीं थे मगर डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने अछूतों की दर्दनाक दुर्दशा का व्याख्यान दे ही दिया, जिससे सभी भड़क गए और सम्मेलन बिना किसी नतीजे पर पहुँचे ही समाप्त हो गया।सभी प्रतिनिधि निराश होकर भारत वापस आ गए।
ब्रिटिश सरकार ने विशाल भारतीय साम्राज्य को सांप्रदायिकता के आधार पर, खण्ड खण्ड करके ही नहीं, हिंदुस्तान, मुस्लिमस्तान, अछूतिस्तान, खलसास्तान आदि देश बनाने की भूमिका तैयार कर ली, ताकि भारत कमजोर हो जाए। कांफ्रेंस के निर्णयों की घोषणा से स्पष्ट हो गया कि भारत को धर्मो के आधार पर बांटा जाएगा जिससे गांधी ही नहीं समूची कांग्रेस सकते में पड़ गई, क्योंकि किसी को भी हिंदुओं, मुस्लिमों, सिखों के कारण कोई दुख नही नहीं था, इन सबको केवल परेशानी अछूतों को मिलने वाले,गणराज्य और अधिकारों, के कारण हुई, ये तीनों वर्ण अछूतों को बांट कर अपने गुलाम बनाकर रखना चाहते थे।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में जो बात उभर कर सामने आई वह यही थी कि भारत के टुकड़े धर्मों के आधार पर होंगे। ब्रिटिश सरकार भारतीय ने धर्मों के बारे में पता लगाने केलिये लॉर्ड लोथियन आयोग की घोषणा कर दी जिससे सारा मनुवाद हिल गया और हिन्दू मुसलमान और सिख अपनी अपनी गोटियां फिट करने लगे।वे समझ गए कि, लोथियन हिन्दू, सिख,मुस्लिम धर्मों की प्रमाणिकता के सबूत मांगेगा जो हमारे पास हैं,मगर अछूतों के पास कोई सबूत नहीं हैं जिसके कारण उन्हें हिन्दू मुसलमान सिख ही माना जाएगा और डाक्टर भीमराव के तर्क निर्मूल ही सिद्ध होंगे। हिन्दू, सिख, मुस्लिम धर्मों के नेता लार्ड लोथियन को फेस करने केलिये चिंतन करने लगे और प्रमाण इकठ्ठे करने लगे, उधर डाक्टर भीमराव अंवेदकर भी ऊहापोह में पड़ गए कि, लोथियन कमेटी तो केवल धर्मों की वास्तविकता पर ही सवाल करेगी, जिसके हमारे पास कोई तर्क वितर्क करने केलिये प्रमाण है ही नहीं।वे बड़े ही असंमजस में पड़ गए और सोचने लगे कि जो हमने, कांफ्रेंस में बीज बोया उसका फल वे लोग ही लेंगें, जिन्होंने कुछ कर्म किया ही नहीं।हिन्दू, हिंदुस्तान ले जाएंगे, मुस्लिम पाकिस्तान ले जाएंगे, सिख खालसास्तान ले जाएंगे और हम हाथ मलते ही रह जाएंगे। डाक्टर भीमराव अंवेदकर थे तो तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ उच्च शिक्षित वकील, इसीलिये उनकी चिंतन शक्ति सभी हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों से कई गुना अधिक थी। उन्होंने चारों ओर नजर दौड़ाई और सोचा, मेरी समस्याओं का समाधान, पंजाब के मंगू राम मुगोबाल ही कर सकते।वे मंगूराम जी के पास आए और उन्हें बताया कि लार्ड लोथियन धर्मों की प्रमाणिकता के बारे में प्रश्न पूछ सकता है जिसके उतर मेरे पास नहीं हैं।मंगू राम जी भी कुशाग्र बुद्धिमान थे, उन्होंने तत्काल उतर देते हुए कहा, धर्म तो हमारा है, ''आदि धर्म,'' फिर आदिधर्म के अवतार भी गुरु रविदास जी, कबीर जी, नामदेब जी, सेन जी,महाऋषि वाल्मीकि जी हैं। डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने कहा, कि मुख्य समस्या तो धर्म ग्रँथ की है,जो हमारे पास दिखाने के लिये नहीं होगा।मंगू राम जी ने मन ही मन में सोचा, ऊना के गांव कुठार खुर्द में कवि एवं लेखक स्वामी ईशरदास जी काव्य रचना करके गुरूओं के नाम से वाणी लिखते हैँ, वहीं चल कर उनसे समस्या का समाधान पूछते हैं।डाक्टर भीमराव अंवेदकर और मंगू राम स्वामी ईशरदास जी के आश्रम में आए और उन्हें ग्रँथ की कमी को लेकर बातचीत की।स्वामी जी भी कुशाग्र बुद्धि ही थे,उन्होंने कहा, आप कमीशन को बता देना कि, हमारा धर्म ग्रँथ गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ है,जो धन की कमी होने के कारण नहीं छप सका।डाक्टर भीमराव को वकीली नुक्ते मिल गए और मन मे गदगद होकर वापस आ गए।जाते समय स्वामी ईशरदास जी ने मंगू राम को बताया ,जल्दी ही अछूत सन्तों का एक सम्मेलन बुलाया ,जिसमे इस ग्रँथ पर चर्चा करके जनमत बनाया जाए ताकि कोई कल को इस निर्णय पर उंगली ना उठा सके।इस निर्णय से स्वामी अछूतानंद जी को भी अबगत करबाया गया तो वे भी बड़े प्रसन्न हुए।
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