गुरु रविदास महाराज द्वारा, वैदिक साहित्य अमान्य।
।।गुरु रविदास महाराज द्वारा वैदिक साहित्य अमान्य।।
गुरु रविदास जी महाराज ने वैदिक साहित्य में वर्णित सुखसागर, देववृक्ष, कामधेनु,चिन्तामणि, चार पदार्थ, नव निद्धियाँ और अठारह सिद्धियों की निर्मूलता को प्रमाण देकर अमान्य कर दिया है। उनके अनुसार भगवान घर पर रह कर ही पाए जा सकते हैं, कहीं गुफाओं में मक्खियों मच्छरों, कीड़े मकोड़ों से परेशान होने की जरूरत नहीं हैं, सबसे बड़ा तीर्थ तो वही जगह है, जहाँ पर आदमी जन्म लेता है, जहां पर आदमी पहली बार संसार देख कर, माँ का पवित्र दूध पी कर, युवा होता है। गुरु रविदास जी आगे फरमाते हैं कि:----
नाना खिआन, पुराण वेद विधि।
चौतीस अछर माहीं।
विआस विचारहि करिउ,परमारथु।।
राम नाम सरि नाही।
गुरु रविदास जी ने उपरोक्त पंक्तियों में तर्क देकर क्रांतिकारी शव्दों में, मूलनिवासियों को रक्तविहीन क्रान्ति करने का उपदेश देते हुए कहा है कि, हे मूलनिवासियो! वैदिक साहित्य ब्राह्मणवाद की, आपके खिलाफ एक वहुत बड़ी साजिश है। आप सब को जन्म मरण, स्वर्ग, नरक, पारसमणि, देव वृक्ष, चिन्तामणि, कामधेनू, चार पदार्थ, ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ आदि काल्पनिक संसार में धकेला हुआ है, जो बिलकुल तर्कसंगत नहीं है, जो तथ्यहीन है, जो निर्मूल है, अगर ये सब कुछ होते, तो आज तक तुम भूखे प्यासे, बेघर, बेजमीन, नंगे वदन रह कर बेहया होकर जीवन नहीं जीते। गुरु जी ने इन्हें सिरे से खारिज करके महाक्रान्ति का आह्वान किया है, निर्भय होकर अपने मौलिक अधिकारों के लिए, जो भी संभव हो वह करो, मूकदर्शक बनना कायरों का कर्म है।
उपरोक्त पंक्तियों का विश्लेषण करते हुए, प्रोफेसर लालसिंह जी कहते हैं कि, गुरु रविदास जी ने हिन्दू धर्म द्वारा स्थापित की हुई विचाधारा को, महाऋषि वेदव्यास द्वारा ही बुनियादी तौर से इसको नष्ट करवा देते हैं। ये एक प्रमाणिक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी घटना है। महाऋषि वेदव्यास का क्रांतिकारी कथन है,""पुराणों में वर्णित शासकों, राजाओं और महाराजाओं के मिथ्या इतिहास को खोज कर, उसकी कोहख (आलोचनात्मक विश्लेषण और अध्ययन) कर ब्रह्मा के रचे हुए वेदों का और देवनागरी लिपि के चौतीस अक्षरों, भाव समूची संस्कृत भाषा में जो भी हिंदू धर्म ग्रँथ रचे गए हैं, का पूरी तरह गहराई से अध्ययन करने के बाद, सोच विचार कर, ये महान क्रांतिकारी धर्म तत्व की अटल पूरी सच्चाई बताई है, कि वेद पुराण आदि हिन्दू धर्मग्रँथ प्रभु नाम सिमरन के बराबर नहीं हैं""। इस तरह गुरु जी ने निर्भय होकर बड़ी दृढ़ता सहित हिन्दू धर्म की विचारधारा को नष्ट किया है और अपने नए क्रांतिकारी धर्म की विचारधारा को दृढ़ता के साथ परिपक्व किया है।
प्रोफेसर लालसिंह जी ने, बड़े ही तर्कपूर्ण तथ्यों के हवाले से गुरु रविवास महाराज जी की धारदार वाणी की व्याख्या की है जिसे अगर वहुत पहले ही सन्त महापुरुष, खोल कर सँगत को समझाते तो आज के शासक भी निडर, निर्भय, और सत्य के मार्ग पर चलते हुए समाजवाद की स्थापना करते हुए, गरीबी उन्मूलन कर देते। आज कोई भी, किसी से भयभीत ना होता, कोई भी हिन्दू-मुस्लिम, सिख, ईसाई और शूद्रों के दंगे फसाद, खून खराबे, आगजनी नहीं कराते और ना ही करते। कोई भी आरक्षण का विरोध नहीं करते, कोई भी माब्लिंचिंग नही करते, कोई खूनी कातिल, हिस्ट्रीशीटर चुनाव नहीं लड़ता, मगर दुर्भाग्य यही रहा कि, जिन सन्तों ने ये काम करना था, उन्हें या तो गुरु जी की क्रांतिकारी वाणी का अर्थ, भाव और लक्ष्यार्थ समझ नहीं आया या फिर मनुवाद के आतंक से भयभीत रहे या अपनी ही जरूरतें मन्दिरों में बैठ कर पूरी करते रहे।
आज मूलनिवासी समाज के डाक्टर सन्त सत्यानन्द जी महाराज आदि कुछ ही श्रेष्ठ, सुशिक्षित, युवाओं ने गुरुओं की वाणी का सर्वमुखी विश्लेषण करके, उनकी वाणी के लक्ष्यार्थों, भावों को समझा है, और उनकी क्रांतिकारी विचारधारा को, क्रांतिकारी प्रवचनों के माध्यम से सँगत तक पंहुचाने का अभियान शुरू किया है, जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं, आशा है कि, ये वीर सपूत सच्चाई को उजागर करने के लिये सँगत को, गुरु रविदास जी महाराज की क्रांतिकारी वाणी को, उनके जहन में बैठाने का प्रयास करते रहेंगे। सोहम।। जय गुरुदेव।।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
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