गुरु रविदास और वैदिक पुस्तकों का भांडाफोड़।।

।।गुरु रविदास और वैदिक पुस्तकों का भांडाफोड़।।
गुरु रविदास जी महाराज ने वैदिक साहित्य का भांडाफोड़ करके, मूल भारतीयों को तर्कपूर्ण ढंग से चिन्तन और मनन करने के लिये विवश कर दिया था। इस विश्व में ऐसा कोई महापुरुष नजर नहीं आता है, जिसने खूंखार भेड़ियों से टक्कर ली हो, फिर उन्हें बुरी तरह से घायल भी किया हो, उन्हीं से अपना सिक्का चलवाया हो, गुरु तेगबहादुर भी जालिम की तलवार के शिकार हो गये और गुरुद्वारे में देवता बन कर बंद हो गए, पापी को दंड नहीं दे सके, ईशा मसीह भी सूली पर झूल गए मगर अपने आपको जालिमों से बचाकर अत्याचारियों को दण्ड नहीं दे पाए, मंसूर आदि भी अपने बहुमूल्य प्राण नहीं बचा सके और हत्यारों को हत्या की सजा नहीं दे सके, अगर जीवित रहते तो कुछ परिवर्तन तो करते और हत्यारों को सबक सिखाते मगर उनके पास गुरुओं के गुरु रविदास जी के, वाणी रूपी मिजायल नहीं थे, गुरु रविदास जी के खिलाफ भी तिलकधारियों ने पूरी की पूरी शासकीय शक्ति झोंकी, परन्तु, गुरु जी का बाल भी बांका नहीं कर सके थे। गुरु रविदास जी ने कई बहिशियों को बहिशियों के हाथों नरक लोक अवश्य पहुँच दिया था।  इसलिए गुरु महाराज ने लंबे समय तक जीवित रहना ही बेहतर समझा। गुरु महाराज 151 वर्षों तक, ब्राह्मणों के फैलाए झूठे आडंबरों को अपनी वाणी की तेज धार से, बुरी तरह से काटते रहे और लोगों को तर्कपूर्ण ढंग से सोचने के लिए विवश करते रहे।
गुरु रविदास जी महाराज ने, ब्राह्मणों के कल्प पेड़ को उखाड़ फेंका, पारस धातू को सोना बनाने से रोक दिया, कामधेनू गाय को दूध देने से मनाकर दिया, आदिपुरुष को चार चार सिरों वाले इंसान पैदा करने के लिए मना कर दिया, आठ आठ भुजाओं वाली नारियों को जन्म देना प्रतिबन्धित करवा दिया, हाथी के भयावह मुंह वाले इंसान जन्म लेने से रोक दिए, घोड़े, गधे, पशु, पक्षियों की सवारी कराने वालों को, भार ढ़ोने वालों को भी अत्याचार सहन करने के लिये मनाकर दिया, बड़े बड़े शेषनागों, फनियरों को समुन्द्रों में जाने से रोक दिया, सभी को अपने फन से छाया करने और उन सब के सुरक्षा कबच बनने से रोक दिया, सुदर्शन चक्रों की शक्ति खत्म कर दी, गुरुदक्षिणा में अगूंठे कटबाने वाले द्रोणाचार्य जन्म लेने से रोक दिए, तभी तो गुरु जी ने अपनी वाणी में लिखा कि:----
सुखसागर, सुरतरु, चिन्तामणि।
कामधेनू बसि जा के।
चारि पदारथ, अष्ट दशा सिद्धि।
नव निद्धि करतल ता के।।
अवर सब तिआगि वचन रचना।।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हिंदुओं के ग्रँथ बताते हैं कि, चमत्कारी, विष्मयकारी सुखसागर (ब्रह्मा) के साये में सारे संसार के देश प्रदेश गतिशील हैं, देववृक्ष के नीचे बैठ जाओ सब कुछ मनवांछित मटीरियल मिल जाता है, चिन्तामणि को जेब मे डाल लो जिससे सभी चिन्ताएं समूल भष्म हो जाती हैं अगर कमी रह जाए तो माता चिंतपूर्णी मंदिर में जाओ, वह भी सभी चिंताओं को दूर कर देती। घर बैठे बिठाए निठठलों को चार पदार्थ काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष सब मिल जाते हैं, बिना उद्यम किये, बिना घास खाए, बिना पानी पिये बेचारी कामधेनु गाय, सभी को दूध सप्लाई कर देती है। अठारह सिद्धियां अणिमा,प्राप्ति, लघिमा, प्राकाम्य, महिमा, सिद्धि, ईशिता, श्रमण, वशीकरण, अनरूपी, मनोवेग, कामरूपी, परकांपय, स्वछंदमृत्यु, सुरदर्शन, सुरक्रीड़ा, संकल्प, मनवांछित। नो निद्धियाँ पद्म, महापद्म, मकर, कश्यप, मुकुंद, नंद, नील, शंख, खरब (मिश्र) जिस की हथेली में रखे हुए हैं, उसके वरदहस्त से सर्वसुखी हैं।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे मूलनिवासियो! समझो, ये जो आपको, ब्राह्मण वैदिक ग्रँथों के उदाहरण दे देकर समझाते हैं, कि सुखसागर है, देव वृक्ष है, चिन्तामणि है, कामधेनु है, पारस धातु है, चार पदार्थ हैं, नो निद्धियाँ हैं, अठारह सिद्धियां हैं, जो आपको सब कुछ देती हैं, जो आपके सब भंडार स्वतः ही भर देती हैं, आपको बस ध्यान लगाने की जरूरत है, कोई काम करने की जरूरत नही है, कोई हाथ पैर हिलाने की जरूरत नहीं है, सब कुछ आप को सुखसागर में डुबकी लगाते ही मिल जाएगा, देव पेड़ (सुरतरु) के नीचे बैठकर सब कुछ, मनवांछित फल मिल जाएंगे। चिन्तामणि अपने पास रखो सब चिंताएं तुरंत रफू चक्कर हो जाएंगी, चार पदार्थ स्वतः घर आ जाएंगे, सब प्रकार की निद्धियाँ, सिद्धियाँ घर बुला लो, वस धरती पर स्वर्ग बन जाएगा। गुरु रविदास महाराज ने अपनी वाणी से ये सारे बेतुके ढकोसले, आडंबर घोषित कर दिए हैं, ये तुम्हें मूर्ख बनाने के  लिए कुतर्क ही घड़े गए हैं। गुरु जी ने इन पंक्तियों द्वारा, धर्मावलंबियों की निरर्थक, बेतुकी, भ्रामक, तर्कहीन, मिथ्या कल्पनाओं का खंडन करके, कड़ी मेहनत करने और हक हलाल की कमाई करके जीवन बसर करने का उपदेश दिया है। स्वर्गों के मन लुभावने सपने लेना बंद करो, धर्म ग्रँथों को त्याग के सत्य के मार्ग पर चलते हुए, घर बैठे हुए, शव्द सुरति को समरस करते हुए, उठते बैठते हुए सोहम जाप करते रहो, तुम्हें कहीं भी कन्दराओं, जंगलों, गुफाओं, में जा कर छुप छुप कर आराधना करने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है। गुरु महाराज ने तेती करोड़ देवी, देवताओं के अस्तित्वों और आडंबरों को सिरे से खारिज कर दिया हैं, क्योंकि गरीब लोगों को, इन्हीं देवताओं ने गरीबी के जाल में जकड़ा हुआ है, उन्होंने ही सताया हुआ है, कोई देवता होता तो बेगमपुरा वसा कर अपने स्वर्ग को चला जाता मगर ऐसा कभी कुछ भी नहीं हुआ है, ब्राह्मणों, पण्डों का बनाया हुआ काल्पनिक जाल है, जिससे निकल कर कड़ा परिश्रम करो, मधुमखियों की तरह अनुशासन में रहो, और उनके नियमानुसार अपने आप की, समाज की रक्षा करो, अगर आपके घरों को कोई उजाड़ता है, तो मधुमखियों की तरह उसे खा पी जाओ मगर अत्याचार बर्दास्त मत करो क्योंकि, जालिम जुल्म तब तक करता रहता जब तक उसे दण्ड नहीं दिया जाता है, गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि मधमखियाँ बनो, शेर बनो, अजगर बनो, सांप और शेषनाग बनो, कायर मत बनो अन्यथा तुम मनुवादियों की चक्की तले हमेशा ही पिसते ही रहोगे। सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष। 
विश्व आदिधर्म मंडल।
अगस्त 14,2020।

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