32।।भजन।।

                   ।।भजन।।
।।तर्ज ।।सानूं दर्शन दी लोड़ सतगुर मेरा।।
वीरो जी सानूं लुट लिया होरनां जाति, अनक देवी देहरे बुत बना कर अनक धाम पुजाती।नए पुराणे मत चला कर पुस्तकां बिच फ़साती।भोली भाली कौमे नस नस फासे बेड़ियां जाल लगाती।आपणा गुआवणं, अवरा बणावण भुल गई साडी जाति तुसीं उन्हां नूं रव कर पूजो जेहड़े कौम दे घाती।पिरथमे सानूं मगर लगा कर पाछे दूर दूर कराती।धाम बनाए कई तादाद खा लई साडी जाती।भगवानदास कुछ होश करो तां निज क्यों ना धाम बनाती।
।।भजन।।
ना खावो ना खावो धक्के चल चल।तुसीं उहनां वल डिगे जांदे ओह कहिन्दे पिछा नूं टल टल।सदियां लाँघियां कोई ना बणिया बैठे सब कुछ मल मल ।पाछे होश नहीं सी हुण आई खा गए बदन दी खल खल।कौम दा हाल देख देख दास नूं आए रोंण पल पल।
।।भजन।।
।।तर्ज--वीरो जी सानूं लुटिया होरनां जातियाँ।।
भैणो जे तुसीं हरि का नामविचारो,गन्दे मन्दे गीतां ते विरति विगड़दी बोलियाँ ना उच्चारो।आपणे परदे आपे चकदियाँ तदे ना रखिया कुलतारो।तभी सानूं बुरियाँ बणावण जे ना खोटे राग विसारो।मानस जनम एहो हथ नहीं आऊँणा लद चलणा संसारो।कहे गुरदेई साडे भाग जाग पये जे सत्संग मिले आधारो।
।।भजन छका।।
ऐसा नाम बड़ा अनमोल भैणो सुणो जी।
ईश नाम अपरंपार ना नाम तुले तोल ना अतोल।इक मन हो जपा मीरां जी असर जहर ना आए कोल ।करमा सहजो ध्याया दुन बसल पान जहर घोल।ईश नाम मैं लोई जंजाम चक,तारा पति को किया गियान अडोल ।शबरी रूप जात हिणी रटिया नाम शीतल फल तरी भव वज ढोल।अनक पतत तरिया पिंगला जैसु जपो नाम बड़ा इह अमोल।ईशरदास गुर समीप जाया,ताला जिगर दा खोल।

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