48।।ज़वामी अच्छूतानंद हरिहर और आदि हिन्दू।।
स्वामी अछूतानंद हरिहर और आदि हिन्दू।
इतिहास साक्षी है, कि मानवता संपन्न साहित्य केवल भारत के मूलनिसियों ने ही लिखा है और सामाजिक परिवर्तन भी भारत के आदवंशी, वहुजन महासपुरुषों ने ही किया है। वैदिक युग में वेद, महाभारत वहुजन सपूत वेदव्यास ने ही लिखे, रामायण वाल्मीकि जी ने लिखा, उनके बाद, आज से छः साल पूर्व संपूर्ण ब्रह्मण्ड केलिये आदर्श सँविधान ही नहीं सर्वश्रेष्ठ धर्म ग्रँथ "पोथी साहिब" सन्त शिरोमणी गुरु रविदास जी महाराज ने लिखा, जिसके दहन के बाद मानवता के कल्याण केलिये धार्मिक ग्रँथ गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ स्वामी ईशरदास जी महाराज ने लिखा, स्वतन्त्रता के बाद भारत का सँविधान भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने लिखा। इसी संक्रमण काल में स्वामी अच्छूतानंद हरिहर जी ने भी पांच हजार साल के अंतराल के बीच विद्वता के धनी अछूतवंश, आदिवासी समाज में लेख, नाटक, कविता लिख कर अछूत समाज को पथ प्रदर्शित किया।
आज के संदर्भ में यदि यह, कहा जाए कि शुद्र समाज मे वर्तमान लेखकों, नाटककारों औऱ कवियों की परंपरा अगर शुरू हुई है, तो केवल स्वामी अच्छूतानंद हरिहर से ही मानी जाएगी। साहिब मंगूराम जी औऱ उनके साथियों ने भी, इनसे पूर्व वहुजन समाज को जागृत करने केलिये लिखा है, मगर उनका लिखा हुआ तो साहित्य नाममात्र ही मिल सका। मगर स्वामी अच्छूतानंद जी ने चाहे कम लिखा मगर हर विधा में लिखने का सूत्रपात उन्हीं से माना जा सकता है। आदवंशी समाज को निरक्षर रखने के कारण, यही ज्ञान ध्यान में लाया गया कि भारत के सभी मूलनिवासी केवल हिन्दू ही हैं। इसी कारण स्वामी अच्छूतानंद हरिहर जी ने शुद्र समाज को भी हिन्दू ही मॉन लिया था, जिसके कारण उन्होंने शूद्रों को आर्य धर्म हिन्दू से बाहर करने केलिये, विदेशी आर्यों से अलग दर्शाने के लिये, भारत के सभी मूलनिवासी, आदिवासियों को आदि हिन्दू ही कह कर पुकारा है, अगर हिन्दू शव्द के वास्तविक अर्थ का उन्हें ज्ञान हासिल हो जाता तो वे कदाचित भी, आदवंशी भारतीयों को आदि हिन्दू नहीं कहते। उन्होंने ऐसा केवल परंपरा से चले आ रहे, हिन्दू धर्म के नाम को सुन कर ही किया गया है।
पंजाव के तत्कालीन क्रांतिकारी नेता साहिब ऐ कलाम मंगूराम मुगोबाल जी कुछ पढ़े लिखे थे, फिर उन्होंने सात समंदर पार जाकर सामान्य ज्ञान हासिल कर लिया था। ब्राह्मणवाद की मक्कारी, फरेब, छलकपट को, लाला हरदयाल और रास विहारी बोस के सानिध्य में, उन्होंने बड़ी गहराई से समझा और परखा था, जिसके कारण उन्होंने अपने संगठन ही नहीं धर्म का नाम "पंजाव आदिधर्म मंडल" और धर्म का नाम "आदिधर्म" ही रखा था। उन्होंने हिन्दू शव्द को मुंह तक नहीं लगाया। इसी रास्ते पर अग्रसर होते हुए साहिब कांशीराम जी ने भी कभी हिन्दू शव्द को अपने श्री मुख से नहीं उच्चारा और अपने पचासी प्रतिशत समाज को एक ही शव्द "वहुजन" में ही समाहित किया।
कुछ दोस्त स्वामी अच्छूतानंद जी के आदिहिन्दू शव्द पर आपत्ति जताते हैं, जिन्हें मैं, बताना चाहता हूँ कि, तत्कालिक परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रख कर ही सन्देह को व्यक्त करना चाहिए। उस समय, मूलनिवासियों को, हिंदुओं से, यही शव्द अलग पहचान दे रहा था, इसीलिए आदि हिन्दू लहर, भारत मे चली थी।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
इतिहास साक्षी है, कि मानवता संपन्न साहित्य केवल भारत के मूलनिसियों ने ही लिखा है और सामाजिक परिवर्तन भी भारत के आदवंशी, वहुजन महासपुरुषों ने ही किया है। वैदिक युग में वेद, महाभारत वहुजन सपूत वेदव्यास ने ही लिखे, रामायण वाल्मीकि जी ने लिखा, उनके बाद, आज से छः साल पूर्व संपूर्ण ब्रह्मण्ड केलिये आदर्श सँविधान ही नहीं सर्वश्रेष्ठ धर्म ग्रँथ "पोथी साहिब" सन्त शिरोमणी गुरु रविदास जी महाराज ने लिखा, जिसके दहन के बाद मानवता के कल्याण केलिये धार्मिक ग्रँथ गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ स्वामी ईशरदास जी महाराज ने लिखा, स्वतन्त्रता के बाद भारत का सँविधान भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंवेदकर ने लिखा। इसी संक्रमण काल में स्वामी अच्छूतानंद हरिहर जी ने भी पांच हजार साल के अंतराल के बीच विद्वता के धनी अछूतवंश, आदिवासी समाज में लेख, नाटक, कविता लिख कर अछूत समाज को पथ प्रदर्शित किया।
आज के संदर्भ में यदि यह, कहा जाए कि शुद्र समाज मे वर्तमान लेखकों, नाटककारों औऱ कवियों की परंपरा अगर शुरू हुई है, तो केवल स्वामी अच्छूतानंद हरिहर से ही मानी जाएगी। साहिब मंगूराम जी औऱ उनके साथियों ने भी, इनसे पूर्व वहुजन समाज को जागृत करने केलिये लिखा है, मगर उनका लिखा हुआ तो साहित्य नाममात्र ही मिल सका। मगर स्वामी अच्छूतानंद जी ने चाहे कम लिखा मगर हर विधा में लिखने का सूत्रपात उन्हीं से माना जा सकता है। आदवंशी समाज को निरक्षर रखने के कारण, यही ज्ञान ध्यान में लाया गया कि भारत के सभी मूलनिवासी केवल हिन्दू ही हैं। इसी कारण स्वामी अच्छूतानंद हरिहर जी ने शुद्र समाज को भी हिन्दू ही मॉन लिया था, जिसके कारण उन्होंने शूद्रों को आर्य धर्म हिन्दू से बाहर करने केलिये, विदेशी आर्यों से अलग दर्शाने के लिये, भारत के सभी मूलनिवासी, आदिवासियों को आदि हिन्दू ही कह कर पुकारा है, अगर हिन्दू शव्द के वास्तविक अर्थ का उन्हें ज्ञान हासिल हो जाता तो वे कदाचित भी, आदवंशी भारतीयों को आदि हिन्दू नहीं कहते। उन्होंने ऐसा केवल परंपरा से चले आ रहे, हिन्दू धर्म के नाम को सुन कर ही किया गया है।
पंजाव के तत्कालीन क्रांतिकारी नेता साहिब ऐ कलाम मंगूराम मुगोबाल जी कुछ पढ़े लिखे थे, फिर उन्होंने सात समंदर पार जाकर सामान्य ज्ञान हासिल कर लिया था। ब्राह्मणवाद की मक्कारी, फरेब, छलकपट को, लाला हरदयाल और रास विहारी बोस के सानिध्य में, उन्होंने बड़ी गहराई से समझा और परखा था, जिसके कारण उन्होंने अपने संगठन ही नहीं धर्म का नाम "पंजाव आदिधर्म मंडल" और धर्म का नाम "आदिधर्म" ही रखा था। उन्होंने हिन्दू शव्द को मुंह तक नहीं लगाया। इसी रास्ते पर अग्रसर होते हुए साहिब कांशीराम जी ने भी कभी हिन्दू शव्द को अपने श्री मुख से नहीं उच्चारा और अपने पचासी प्रतिशत समाज को एक ही शव्द "वहुजन" में ही समाहित किया।
कुछ दोस्त स्वामी अच्छूतानंद जी के आदिहिन्दू शव्द पर आपत्ति जताते हैं, जिन्हें मैं, बताना चाहता हूँ कि, तत्कालिक परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रख कर ही सन्देह को व्यक्त करना चाहिए। उस समय, मूलनिवासियों को, हिंदुओं से, यही शव्द अलग पहचान दे रहा था, इसीलिए आदि हिन्दू लहर, भारत मे चली थी।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
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