55।।स्वामी अच्छूतानंद जी का चार बाग सम्मेलन।।
।।स्वामी अच्छूतानंद जी का चार बाग सम्मेलन।।
ब्राह्मणवाद वहुजन मुक्ति की बात कभी नहीं करता था, ना ही अब करता है औऱ ना ही कभी भविष्य में करेगा,जिसके लिये वहुजन को ही, वहुजन समाज की मुक्ति केलिये सँघर्ष करना था,इसीलिये पंजाब में साहिब मंगूराम मुगोवाल, अध्यक्ष पंजाब आदिधर्म मंडल, कानपुर में स्वामी अच्छूतानंद जी,आदि हिन्दू आंदोलन, आंध्रा में, आदि आंध्रा आंदोलन, आदि कर्नाटक आंदोलन ,वहुजन समाज के राजनैतिक आंदोलन चल रहे थे।
29 सितंबर 1928 को लार्ड साईमन भारत में भारतीयों की सामाजिक व्यवस्था का आकलन करने केलिये ब्रिटिश सरकार ने भेजा गया।लाहौर से उसने जनता से संपर्क शुरू किया, इसी यात्रा में साहिब मंगूराम मुवोबाल ने सबसे पहले पंजाब में अछूतों की दुर्दशा के बारे में साईमन को लाहौर में अपने आदिधर्म मंडल के नेताओं के साथ ज्ञापन देकर जानकारी दी थी।उसके बाद साईमन उतर प्रदेश केलिये रवाना हुए जहां स्वामी अच्छूतानंद जी ने लखनऊ के ऐतिहासिक चार बाग में लार्ड साईमन से मिलने की तैयारी की हुई थी।
।। चार बाग की महत्ता।।
लखनऊ के चार बाग का आकर्षण अपने आप में अनूठा ही है।लखनऊ जंक्शन की ये भव्य इमारत दर्शकों के मानस पटल पर अमिट प्रभाव छोड़ती है।स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना ही नहीं है अपितु गई सुंदर भवन भी है,नबाब अस्फुद्दोला का ये प्यारा बाग था।ये लखनऊ के सुंदर बागों में से एक था।चौपड़ की तरह चार नहरें बना कर चारों कोनों पर चार बाग बनाए गए हैं,इसी प्रकार के बागों को फारसी में चाहर बाग कहते हैं,बाद में चार बाग ही कहा जाने लगा।
स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज ने, अछूतों की समस्याओं के निदान केलिये इस मनमोहक जगह को चुना ताकि साईमन के मानसपटल पर उनकी बातें हमेशा याद रहें।स्वामी जी के आग्रह पर हजारों अछूतों ने साईमन के स्वागत केलिये चार बाग की शोभा को चार चांद लगाए। स्वामी जी ने चार बाग को वहुत ही सुंदर ढंग से सुसज्जित करवाया था।बाजे गाजों का भी प्रबन्ध किया हुआ था जिसकी सुरीली धुंनो से आकाश भी गुंजायमान हो रहा था। साईमन के स्वागत केलिये अछूतों ने सभी प्रबन्ध कर रखे थे।
तीस नबंबर 1928 को सर जान साईमन चार बाग पहुंचे, जिनको सुनने केलिये डाक्टर भीमराव अंवेदकर, तिलकराज कुरील, गिरधारी भगत, लक्ष्मण प्रसाद, करोड़ीमल खटीक आदि हिन्दू सम्मेलन में उपस्थित थे।स्वामी अच्छूतानंद जी के साथ असंख्य आदि हिन्दू हाथों में लार्ड साईमन के स्वागतार्थ फूलमालाएं लेकर खड़े थे।
[ ] ज्यों ही लार्ड साईमन चार बाग पहुँचा, त्यों ही उपस्थित आदि हिंदुओं ने लार्ड साईमन का अभिनंदन करने केलिये उनके सम्मान में नारे लगाने शुरू कर दिए।बाजों की धुन में साईमन को मंच तक लाया गया।आदि हिन्दू आंदोलन के नेताओं ने बारी बारी साईमन को हार पहनाए जिन्हें देखकर साईमन भी हैरान था,क्योंकि आज तक किसी ने भी उनका ऐसा भव्य स्वागत नहीं किया था।स्वामी जी ने अपने मनोविज्ञान से साईमन को ऐसा वशीकरण किया कि,साईमन उनका ही होकर रह गया।साईमन ने स्वामी जी से,भारत की वर्तमान परिस्थितियों के बारे में जानकारी हासिल की।स्वामी जी ने कांग्रेस की अछूत विरोद्धि मानसिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला जिसकी पुष्टि साहिब मंगूराम के ज्ञापन से भी हो गई क्योंकि मंगू राम जी ने भी अपने ज्ञापन में वही मांगे लिखी थीं जो जो स्वामी जी ने साईमन को मौखिक रूप में बताई।स्वामी जी ने मंच पर आकर लार्ड साईमन की भूरी भूरी प्रशंसा की जिससे साईमन भी फुला नही समाया।स्वामी जी ने अपना मांग पत्र पढ़ते हुए साईमन को अछूतों की भयावह जिंदगी का चित्र प्रस्तुत किया और बताया कि भारत में अछूतों की अपेक्षा जानवरों की जिंदगी बेहतर है,हम आपके तो गुलाम हैं ही,मगर हम आर्य हिंदुओं के भी गुलाम हैं।हमें पूर्ण आजादी चाहिये जो आप अंग्रेज ही दे सकते हैं,हमें हिंदुओं से मुक्ति दिलाई जाए।धन धरती के अधिकार दिए जाएं।
[ ] स्वामी जी के विचारोँ को सुन कर साईमन भी हिंदुओं की पाशविकता पर हैरान था।उसने अपने भाषण में स्वामी जी का स्वागत के लिए आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद भी किया।उन्होंने आदि हिंदुओं की मांगें समझ ली और पूर्ण आश्वासन दिया कि आप को पूर्ण न्याय दिलाया जाएगा।हम आपकी सभी मांगों को ब्रिटिश सरकार के पास समुचित ढंग से रखेंगे।आपके प्रतिनिधियों को भी रांउड टेबल वार्ताओं में बुलाएंगे। जब गोलमेज कांफ्रेंस हुई तो, भारत से डाक्टर भीमराव अंवेदकर को अछूतों के प्रतिनिधि के रूप में लंदन भेजा गया था।
ब्राह्मणवाद वहुजन मुक्ति की बात कभी नहीं करता था, ना ही अब करता है औऱ ना ही कभी भविष्य में करेगा,जिसके लिये वहुजन को ही, वहुजन समाज की मुक्ति केलिये सँघर्ष करना था,इसीलिये पंजाब में साहिब मंगूराम मुगोवाल, अध्यक्ष पंजाब आदिधर्म मंडल, कानपुर में स्वामी अच्छूतानंद जी,आदि हिन्दू आंदोलन, आंध्रा में, आदि आंध्रा आंदोलन, आदि कर्नाटक आंदोलन ,वहुजन समाज के राजनैतिक आंदोलन चल रहे थे।
29 सितंबर 1928 को लार्ड साईमन भारत में भारतीयों की सामाजिक व्यवस्था का आकलन करने केलिये ब्रिटिश सरकार ने भेजा गया।लाहौर से उसने जनता से संपर्क शुरू किया, इसी यात्रा में साहिब मंगूराम मुवोबाल ने सबसे पहले पंजाब में अछूतों की दुर्दशा के बारे में साईमन को लाहौर में अपने आदिधर्म मंडल के नेताओं के साथ ज्ञापन देकर जानकारी दी थी।उसके बाद साईमन उतर प्रदेश केलिये रवाना हुए जहां स्वामी अच्छूतानंद जी ने लखनऊ के ऐतिहासिक चार बाग में लार्ड साईमन से मिलने की तैयारी की हुई थी।
।। चार बाग की महत्ता।।
लखनऊ के चार बाग का आकर्षण अपने आप में अनूठा ही है।लखनऊ जंक्शन की ये भव्य इमारत दर्शकों के मानस पटल पर अमिट प्रभाव छोड़ती है।स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना ही नहीं है अपितु गई सुंदर भवन भी है,नबाब अस्फुद्दोला का ये प्यारा बाग था।ये लखनऊ के सुंदर बागों में से एक था।चौपड़ की तरह चार नहरें बना कर चारों कोनों पर चार बाग बनाए गए हैं,इसी प्रकार के बागों को फारसी में चाहर बाग कहते हैं,बाद में चार बाग ही कहा जाने लगा।
स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज ने, अछूतों की समस्याओं के निदान केलिये इस मनमोहक जगह को चुना ताकि साईमन के मानसपटल पर उनकी बातें हमेशा याद रहें।स्वामी जी के आग्रह पर हजारों अछूतों ने साईमन के स्वागत केलिये चार बाग की शोभा को चार चांद लगाए। स्वामी जी ने चार बाग को वहुत ही सुंदर ढंग से सुसज्जित करवाया था।बाजे गाजों का भी प्रबन्ध किया हुआ था जिसकी सुरीली धुंनो से आकाश भी गुंजायमान हो रहा था। साईमन के स्वागत केलिये अछूतों ने सभी प्रबन्ध कर रखे थे।
तीस नबंबर 1928 को सर जान साईमन चार बाग पहुंचे, जिनको सुनने केलिये डाक्टर भीमराव अंवेदकर, तिलकराज कुरील, गिरधारी भगत, लक्ष्मण प्रसाद, करोड़ीमल खटीक आदि हिन्दू सम्मेलन में उपस्थित थे।स्वामी अच्छूतानंद जी के साथ असंख्य आदि हिन्दू हाथों में लार्ड साईमन के स्वागतार्थ फूलमालाएं लेकर खड़े थे।
[ ] ज्यों ही लार्ड साईमन चार बाग पहुँचा, त्यों ही उपस्थित आदि हिंदुओं ने लार्ड साईमन का अभिनंदन करने केलिये उनके सम्मान में नारे लगाने शुरू कर दिए।बाजों की धुन में साईमन को मंच तक लाया गया।आदि हिन्दू आंदोलन के नेताओं ने बारी बारी साईमन को हार पहनाए जिन्हें देखकर साईमन भी हैरान था,क्योंकि आज तक किसी ने भी उनका ऐसा भव्य स्वागत नहीं किया था।स्वामी जी ने अपने मनोविज्ञान से साईमन को ऐसा वशीकरण किया कि,साईमन उनका ही होकर रह गया।साईमन ने स्वामी जी से,भारत की वर्तमान परिस्थितियों के बारे में जानकारी हासिल की।स्वामी जी ने कांग्रेस की अछूत विरोद्धि मानसिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला जिसकी पुष्टि साहिब मंगूराम के ज्ञापन से भी हो गई क्योंकि मंगू राम जी ने भी अपने ज्ञापन में वही मांगे लिखी थीं जो जो स्वामी जी ने साईमन को मौखिक रूप में बताई।स्वामी जी ने मंच पर आकर लार्ड साईमन की भूरी भूरी प्रशंसा की जिससे साईमन भी फुला नही समाया।स्वामी जी ने अपना मांग पत्र पढ़ते हुए साईमन को अछूतों की भयावह जिंदगी का चित्र प्रस्तुत किया और बताया कि भारत में अछूतों की अपेक्षा जानवरों की जिंदगी बेहतर है,हम आपके तो गुलाम हैं ही,मगर हम आर्य हिंदुओं के भी गुलाम हैं।हमें पूर्ण आजादी चाहिये जो आप अंग्रेज ही दे सकते हैं,हमें हिंदुओं से मुक्ति दिलाई जाए।धन धरती के अधिकार दिए जाएं।
[ ] स्वामी जी के विचारोँ को सुन कर साईमन भी हिंदुओं की पाशविकता पर हैरान था।उसने अपने भाषण में स्वामी जी का स्वागत के लिए आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद भी किया।उन्होंने आदि हिंदुओं की मांगें समझ ली और पूर्ण आश्वासन दिया कि आप को पूर्ण न्याय दिलाया जाएगा।हम आपकी सभी मांगों को ब्रिटिश सरकार के पास समुचित ढंग से रखेंगे।आपके प्रतिनिधियों को भी रांउड टेबल वार्ताओं में बुलाएंगे। जब गोलमेज कांफ्रेंस हुई तो, भारत से डाक्टर भीमराव अंवेदकर को अछूतों के प्रतिनिधि के रूप में लंदन भेजा गया था।
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