50।। स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज का उदय।।
।।स्वामी अछूतानंद जी महाराज का उदय।।
मनुस्मृति के शिकंजे में तड़फ रही मॉनवता को देखकर, आदिपुरुष से रहा नही गया और मॉनवता के दुश्मन आतताइयों ,अत्याचारियों को नकेल डालने केलिये सर्वप्रथम गुरु रविदास जी महाराज के रूप में अवतार लिया, उनके बाद कबीर जी ने प्रकट होकर मनुस्मृति के काले नियमों का अपनी अक्खड़, निर्मम वाणी से ब्राह्मणवाद को आहत करके मनुस्मृतियों को जख्मी किया जिससे दुखी होकर ब्राह्मणवाद ने उन्हें असंख्य कष्टों से पीड़ित किया मगर मनुवादी हर कदम पर उनसे बुरी तरह पराजित हुए और उनके समक्ष आत्मसमर्पण किया।इन्ही अवतारों के विद्रोह से प्रभावित होकर भावी पीढ़ियों ने भी उनके रास्ते पर चलकर उनका अनुशरण किया जिनमे,एक हुए स्वामी हरिहर अछूतानंद जी महाराज।
उतर प्रदेश के गाँव सौरिख (फर्रुखाबाद ) में मोतीराम औऱ मथुरा प्रसाद दो भाई रहते थे। दोनों ही सेना में कार्यरत थे।मनुवादी आतंक के कारण वे गाँव उमरी तैसील सिरसागंज जिला मैनपुरी में अपने सुसराल आकर बस गए थे।यहीं पर मोतीराम के एक अत्यंत विलक्षण शक्ति ने बुद्ध पूर्णिमा के दिन सन 1879 को अवतार लिया जिनका नाम हीरालाल रखा गया।वच्चे का लालन पालन अत्यंत राजशाही अंदाज में हुआ क्योंकि उनके पिता और चाचा सेना में सम्मानजनक पदों पर तैनात थे,आय अच्छी थी।चाचा मथुरा प्रसाद ने शादी नही की थी।वे हीरालाल को वहुत प्यार किया करते थे,उन्हें सन्तों महापुरुषों के बारे में ज्ञान से ओतप्रोत करते जा रहे थे।गुरु रविदास महाराजजी,कबीर जी की साखियों ने वच्चे हीरालाल जी के मन मष्तिस्क पर धार्मिक रंग चढ़ाना शुरू कर दिया था।छः वर्ष की आयु में हीरालाल को सैनिक स्कूल में पढ़ने डाला गया जहाँ पर उन्हें शिक्षा अर्जित करने में कोई कठिनाई नही हुई।चौदह वर्ष की आयु में उन्होंने आठबीं कक्षा उतीर्ण कर ली।हिंदी,उर्दू औऱ अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान हासिल कर लिया।
साधु, सन्तों, महापुरुषों से उनका संपर्क बढ़ता गया,सन्तों के प्रवचन सुनने की रुचि बढ़ती ही जा रही थी जिससे उनकी पढ़ाई बाधित होने लगी।कबीर जी की क्रांतिकारी वाणी उन्हें झकझोर रही थी और साधुत्व की ओर उन्हें उन्मुख करती जा रही थी, इसी कारण उन्होंने पढ़ाई को तिलांजलि देकर सन्त बनकर समाज सुधार को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।इस निर्णय से व्यथित हो कर, इनके पिता और चाचा ने तत्काल उनकी शादी गाँव इटाबा के रामसिंह कुरील की सुकन्या दुर्गाबाई से कर दी।
सामाजिक रुचियों को देखकर आर्य समाज के प्रखर प्रचारक सच्चिदानंद ब्राह्मण को हीरालाल जी के बारे में भनक लगी और वे उनके पास आए और बोले, आप अगर आर्य समाज के साथ जुड़ जाएं तो आप अछूतों में जातीय व्यवस्था को समाप्त कर सकते हैं क्योंकि, आर्य समाज मे कोई ऊँच नीच,जातिवाद की घृणित संकीर्णता आदि नही है।उन्होंने हीरालाल को दयानंद सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश भी पढ़ने को उपलब्ध करवाया जिसके अध्ययन से वे काफी प्रभावित हुए और सन 1905 में, वे आर्य समाजी बन गए।हीरालाल ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से आर्य समाज को बुलंदियों पर पहुँचाने में कोई कसर नही छोड़ी जिससे प्रभावित होकर आर्य समाज ने उन्हें अपने ब्राह्मण प्रचारकों से सर्वश्रेष्ठ जान कर ब्राह्मणवाद केलिये खतरा समझा।उनके बारे में कल को ये पता ना चले कि ये हीरालाल अछूत है,जिसके लिए उनका नामकरण स्वामी हरिहरानंद करने की योजना बनाई गई जिसे सर्वश्रेष्ठ समझ कर हीरालाल को विशेष समारोह में स्वामी हरिहरानंद की उपाधि से विभूषित कर दिया गया।
स्वामी दयानंद जी ने सभी जातियों के वच्चों को शिक्षित करने केलिये उस समय भी अस्सी हाई स्कूल खोल रखे थे।दयानंद जी के मन में तो जातीयता नही जान पड़ती मग़र जो ब्राह्मण अध्यापक थे वे उनकी इस नीति से अप्रसन्न थे जिसके कारण वे उनके निर्देशों की अवहेलना करके सछूत और अछूत के आधार पर, वच्चों को भेदभावपूर्ण ढंग से पढ़ाते गए।अछूत वच्चों को स्वर्ण वच्चों से दूर बैठाते थे, सवर्ण वच्चों को डेस्कों पर औऱ अछूत वच्चों को नीचे धरती पर।एक दिन अचानक स्वामी हरिहरानंद जी ने एक स्कूल का निरीक्षण किया तो इस दृश्य को देखकर डगमगा गए, उन्होंने ये व्यवहार पहली बार देखा क्योंकि वे अंग्रेजों के सैनिक स्कूल में पढ़े थे जहाँ कोई ऐसा घटिया व्यवहार नही था।वे ब्राह्मणवादी व्यवस्था से आहत हो गए और दुखी होकर अपनी हरिहरानंद की उपाधि आर्य समाज के ठेकेदारों को लौटा दी ।
हीरालाल नाम तो अपने आप ही श्रेष्ठता का प्रतीक था मगर ब्राह्मणवाद को चिढ़ाने केलिये उन्होंने एक सम्मेलन आयोजित करके अपना पुनः नामकरण किया, जिसमें उन्होंने अपने आपको हरिहर अछूतानंद घोषित कर दिया।अब उन्हें हरिहर अछूतानंद नाम से जाना जाने लगा।
मनुस्मृति के शिकंजे में तड़फ रही मॉनवता को देखकर, आदिपुरुष से रहा नही गया और मॉनवता के दुश्मन आतताइयों ,अत्याचारियों को नकेल डालने केलिये सर्वप्रथम गुरु रविदास जी महाराज के रूप में अवतार लिया, उनके बाद कबीर जी ने प्रकट होकर मनुस्मृति के काले नियमों का अपनी अक्खड़, निर्मम वाणी से ब्राह्मणवाद को आहत करके मनुस्मृतियों को जख्मी किया जिससे दुखी होकर ब्राह्मणवाद ने उन्हें असंख्य कष्टों से पीड़ित किया मगर मनुवादी हर कदम पर उनसे बुरी तरह पराजित हुए और उनके समक्ष आत्मसमर्पण किया।इन्ही अवतारों के विद्रोह से प्रभावित होकर भावी पीढ़ियों ने भी उनके रास्ते पर चलकर उनका अनुशरण किया जिनमे,एक हुए स्वामी हरिहर अछूतानंद जी महाराज।
उतर प्रदेश के गाँव सौरिख (फर्रुखाबाद ) में मोतीराम औऱ मथुरा प्रसाद दो भाई रहते थे। दोनों ही सेना में कार्यरत थे।मनुवादी आतंक के कारण वे गाँव उमरी तैसील सिरसागंज जिला मैनपुरी में अपने सुसराल आकर बस गए थे।यहीं पर मोतीराम के एक अत्यंत विलक्षण शक्ति ने बुद्ध पूर्णिमा के दिन सन 1879 को अवतार लिया जिनका नाम हीरालाल रखा गया।वच्चे का लालन पालन अत्यंत राजशाही अंदाज में हुआ क्योंकि उनके पिता और चाचा सेना में सम्मानजनक पदों पर तैनात थे,आय अच्छी थी।चाचा मथुरा प्रसाद ने शादी नही की थी।वे हीरालाल को वहुत प्यार किया करते थे,उन्हें सन्तों महापुरुषों के बारे में ज्ञान से ओतप्रोत करते जा रहे थे।गुरु रविदास महाराजजी,कबीर जी की साखियों ने वच्चे हीरालाल जी के मन मष्तिस्क पर धार्मिक रंग चढ़ाना शुरू कर दिया था।छः वर्ष की आयु में हीरालाल को सैनिक स्कूल में पढ़ने डाला गया जहाँ पर उन्हें शिक्षा अर्जित करने में कोई कठिनाई नही हुई।चौदह वर्ष की आयु में उन्होंने आठबीं कक्षा उतीर्ण कर ली।हिंदी,उर्दू औऱ अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान हासिल कर लिया।
साधु, सन्तों, महापुरुषों से उनका संपर्क बढ़ता गया,सन्तों के प्रवचन सुनने की रुचि बढ़ती ही जा रही थी जिससे उनकी पढ़ाई बाधित होने लगी।कबीर जी की क्रांतिकारी वाणी उन्हें झकझोर रही थी और साधुत्व की ओर उन्हें उन्मुख करती जा रही थी, इसी कारण उन्होंने पढ़ाई को तिलांजलि देकर सन्त बनकर समाज सुधार को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।इस निर्णय से व्यथित हो कर, इनके पिता और चाचा ने तत्काल उनकी शादी गाँव इटाबा के रामसिंह कुरील की सुकन्या दुर्गाबाई से कर दी।
सामाजिक रुचियों को देखकर आर्य समाज के प्रखर प्रचारक सच्चिदानंद ब्राह्मण को हीरालाल जी के बारे में भनक लगी और वे उनके पास आए और बोले, आप अगर आर्य समाज के साथ जुड़ जाएं तो आप अछूतों में जातीय व्यवस्था को समाप्त कर सकते हैं क्योंकि, आर्य समाज मे कोई ऊँच नीच,जातिवाद की घृणित संकीर्णता आदि नही है।उन्होंने हीरालाल को दयानंद सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश भी पढ़ने को उपलब्ध करवाया जिसके अध्ययन से वे काफी प्रभावित हुए और सन 1905 में, वे आर्य समाजी बन गए।हीरालाल ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से आर्य समाज को बुलंदियों पर पहुँचाने में कोई कसर नही छोड़ी जिससे प्रभावित होकर आर्य समाज ने उन्हें अपने ब्राह्मण प्रचारकों से सर्वश्रेष्ठ जान कर ब्राह्मणवाद केलिये खतरा समझा।उनके बारे में कल को ये पता ना चले कि ये हीरालाल अछूत है,जिसके लिए उनका नामकरण स्वामी हरिहरानंद करने की योजना बनाई गई जिसे सर्वश्रेष्ठ समझ कर हीरालाल को विशेष समारोह में स्वामी हरिहरानंद की उपाधि से विभूषित कर दिया गया।
स्वामी दयानंद जी ने सभी जातियों के वच्चों को शिक्षित करने केलिये उस समय भी अस्सी हाई स्कूल खोल रखे थे।दयानंद जी के मन में तो जातीयता नही जान पड़ती मग़र जो ब्राह्मण अध्यापक थे वे उनकी इस नीति से अप्रसन्न थे जिसके कारण वे उनके निर्देशों की अवहेलना करके सछूत और अछूत के आधार पर, वच्चों को भेदभावपूर्ण ढंग से पढ़ाते गए।अछूत वच्चों को स्वर्ण वच्चों से दूर बैठाते थे, सवर्ण वच्चों को डेस्कों पर औऱ अछूत वच्चों को नीचे धरती पर।एक दिन अचानक स्वामी हरिहरानंद जी ने एक स्कूल का निरीक्षण किया तो इस दृश्य को देखकर डगमगा गए, उन्होंने ये व्यवहार पहली बार देखा क्योंकि वे अंग्रेजों के सैनिक स्कूल में पढ़े थे जहाँ कोई ऐसा घटिया व्यवहार नही था।वे ब्राह्मणवादी व्यवस्था से आहत हो गए और दुखी होकर अपनी हरिहरानंद की उपाधि आर्य समाज के ठेकेदारों को लौटा दी ।
हीरालाल नाम तो अपने आप ही श्रेष्ठता का प्रतीक था मगर ब्राह्मणवाद को चिढ़ाने केलिये उन्होंने एक सम्मेलन आयोजित करके अपना पुनः नामकरण किया, जिसमें उन्होंने अपने आपको हरिहर अछूतानंद घोषित कर दिया।अब उन्हें हरिहर अछूतानंद नाम से जाना जाने लगा।
Comments
Post a Comment