।।गुरु रविदास महाराज के गुरु परम ब्रह्म।।

।।गुरु रविदास महाराज के गुरु परम ब्रह्म।।
गुरु रविदास जी के समूचे जीवन को ही भ्रामक बनाने में ब्राह्मणों ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी, मगर उन्हीं के भाई, बाँधब सिखों ने भी सारी सीमाएं तोड़ रखी हैं। गुरु जी को ब्राह्मणों ने पिछले जन्म का ब्राह्मण सिद्ध किया, गुरु जी को अगले जन्म चमार बनाया, रामानंद ब्राह्मण का शिष्य बनाया, जबकि गुरु रविदास जी स्वयं अपनी वाणी में अपने गुरु के बारे में लिखा जो गुरु ग्रँथ साहिब के पृष्ठ 346 पर भी सुनहरे शव्दों में अंकित हैं कि:---
पार कैसे पाईवो रे।
मो सऊ कोऊ ना कहि समझाऊ।
जा ते आवागण बिलाई।।रहाउ।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे परमेश्वर! मैं भवसागर से किस प्रकार, पार जा सकता हूँ अर्थात इस संसार रूपी समन्दर के किनारे पर किस प्रकार पहुँच सकता हूँ अर्थात हे आदपुरुष! आपके रहस्य को किस तरह समझूं। मुझे कोई भी, इस गुप्त रहस्य को नहीं समझा सका है, जिससे आवागमन समाप्त हो जाए अर्थात जन्म मरण का बंधन खत्म हो जाए। इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि उन के समय में, उनके लायक कोई भी गुरु नहीं था, जिसमे रामानंद, परमानंद सभी शून्य हो गए हैं। गुरु रविदास जी अपने गुरु के बारे में बयाँ करते हैं कि :----
नाथ! कछु ना जानिउ।
मन माया के हाथि बिकानउ।।रहाउ।।
तुम कहिअत हों, जगत गुर सुआमी।।
हम कहिअत कलिजुग के कामी।।
कहि रविदास कहा कैसे कीजै।।
बिन रघुनाथ सरनिका की लीजै।।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे! आदिपुरुष हम तो कुछ भी नहीं जानते हैं। हमारा मन, माया के हाथों बिका हुआ है। आप फरमाते हैं कि, हम संसार के गुरु और स्वामी हैं मगर हम तो समझते हैं कि, हम कलियुग के निवासी काम के बंधन में बंधे हुए हैं। रविदास जी फरमाते हैं कि, हे! ईश्चर, हम क्या करें, आपकी शरण के बिना हम क्या ले सकते हैं अर्थात गुरु रविदास जी स्पष्ट करते हैं कि, हे ईश्वर! आपके बिना हमें कोई कुछ देने की औकात नहीं रखता है! हम आप की शरण में आए हुए हैं, हमें अपनी ज्ञान ज्योति देकर निवाजें। इस कथन से साफ साफ ज्ञात होता है, कि गुरु रविदास जी के गुरु परब्रह्म ही हुए हैं, इसीलिए तो उन्हें सन्त महापुरुष ब्रह्मज्ञानी कहते हैं, जो ब्राह्मणों और मनुवादी सिखों को हजम नहीं होता है। स्वतंत्रता से पूर्व तो शिक्षा की कमी थी मगर आज तो लोग पी एच डी कर रहे हैं, वे भी गुरु रविदास जी के खिलाफ कुतर्कपूर्ण टिप्पणियां करने से बाज नहीं आ रहे हैं, कोई लिख रहा है कि, गुरु रविदास जी ने आत्महत्या कर ली थी, कोई लिख रहा है कि गुरु जी का कत्ल कर दिया था, कोई लिख रहा है कि गुरु जी का गुरु रामानंद था, अब एक और महाज्ञानी पंजाबी सरदार निकला है, जिसने (जिस का नाम लिख कर मैं अपनी कलम गन्दी नहीं करना चाहता हूँ) गुरु रविदास जी के बारे में तेईस जुलाई सन 2009 को एक वहुत शर्मनाक और अति भद्दी टिप्पणी सपोकसमैंन के पृष्ठ सात पर की है, कि "अंगरेजां ने तां गुरु नानक साहिब नूँ कबीर दा चेला साबित करन दी नाकाम कोशिश कीती, हालांकि भगत कबीर, भगत रविदास ने 1508 विच गुरु नानक साहिब दी बनारस फेरी वेले उन्हानूँ अपना गुरु धारिया सी। बड़ी बेशर्मी की ये बात ये है कि, क्या कोई गुरु किसी साधारण आदमी को भी अपना शिष्य बनाने के लिये उसके घर जा कर नामदान देता है? क्या समन्दर भी कभी प्यासे के पास आता है? 
गुरु रविदास जी का उदय बिकर्मी सम्मत 1433 में हुआ था मगर सरदार जी लिख रहे हैं कि, गुरु रविदास जी को 1508 में दीक्षा दी गई, जब वे पचहत्तर वर्ष की आयु के हो चुके थे और गुरु नानकदेवजी जी का जन्म बिकर्मी सम्मत 1526 में हुआ था, सरदार जी की टिप्पणी कितनी हास्यास्पद है। जब गुरु अर्जुनदेव जी फरमाते हैं कि, गुरु रविदास गुरुओं के गुरु हुए हैं, कबीर साहिब खुद कहते हैं कि, "" साधनमा गुरु रविदास सन्त हैं""  डाक्टर हजारी प्रसाद दिवेदी लिखते हैं कि, गुरु रविदास जी, सन्त कबीर से अवस्था में कदाचित बड़े थे और वहुत निरीह  भक्त थे। वे जीवन की वहुविध कठिनाइयों को झेल चुके थे। एक बार ब्रह्मज्ञान के विषय में, सन्त कबीर से जब पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि मैं तो बच्चा था, माँ की गोद में चढ़कर रास्ता पार कर आया हूँ। जा कर गुरु रविदास से पूछो, वे बड़े हैं और माँ ने उनके सिर पर कुछ गठठर भी रख दिया था, वे ही रास्ते का मर्म बता सकते हैं। कबीर साहिब फरमाते हैं कि, रामानंद सन्तों के गुरु नहीं हैं, उन्होंने तो साफ साफ कहा है कि, " ब्राह्मण गुरु जगत का, सन्तन का गुरु नाहिं"। इन सभी तर्कसंगत कथनों से प्रमाणित होता है कि, गुरु रविदास जी के समय ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था, जो कबीर जैसे प्रकाण्ड सन्त को भी रास्ता बता सकता था, बाकियों की तो कोई भी हैसियत ही नजर नहीं आती है। डाक्टर मनमोहन सहगल जी के अनुसार, "ब्राह्मणों द्वारा गढ़ी कथाओं में ब्राह्मणत्व की महत्ता स्पष्ट लक्षित होती है। साथ ही साथ बार बार यही प्रयास दिख रहा है, कि वे क्या कथा घड़ें कि, भगवान रविदास को किसी ना किसी रूप में ब्राह्मणों के वंशज सिद्ध किया जाए, जबकि किसी भी सन्त और महापुरुष ने कभी भी गुरु रविदास जी महाराज के विषय में, ऐसा कुतर्क, कहीं नहीं लिखा हुआ है। सोहम।।

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