53।।स्वामी अच्छूतानंद महाराज पर हमले।।
।।स्वामी अच्छुतानन्द महाराज पर हमले ।।
ब्राह्मनबाद की नीति ही गुंडागर्दी पर टिकी हुई है,जिसके सहारे भारत की सभ्यता,संस्कृति, शासन प्रशासन को मूलनिवासियों से छीना था।मूलनिवासी शासकों ने अहिंसा का मार्ग कभी नहीं छोड़ा और ना ही प्रकृति के नियमों को समझा,क्योंकि प्रकृति ने ताकतवर को ही जीने का हक दिया है।निर्बल को बलशाली अपनी ताकत से डरा कर अपनी सत्ता स्थापित करता आया है, जब वही सत्ताधीश निर्बल हो जाता है,तो उसे भी सत्ता छोड़ कर निर्बलों की पंक्ति में आना पड़ता है, शक्तिशाली की गुलामी स्वीकार करके जीवन बसर करना पड़ता है, मगर मूलनिवासी शासकों ने, इन नियमों की अनदेखी करके अपने मूलनिवासियों को आर्य हिंदुओं का गुलाम बनने दिया,जबकि इनकी बिसात ही छीनकर खाने और जीवन बसर करने की रही है।जो भी इनके रास्ते पर अड़चन बनने का प्रयास करता है उसे ये लोग अपने ही दुश्मन को उकसा कर,भड़का कर मरवाकर, उनमें आतंक फैला कर अपना उल्लू सीधा करता आया है, जबकि खुद शहीद होने से डरते हैं, ये लोग कभी भी नहीं मरते केवल कांटे से कांटे को ही निकाल कर जिंदा रहते आए हैं।
स्वामी जी ने उत्तर प्रदेश में आदि हिन्दू आंदोलन शुरू करके, मनुवाद की जड़ों को हिला कर जहां, मूलनिवासियों के जहन में सामाजिक चेतना जागृत कर दी, वहीं उसी चेतना से राजनीतिक जनजागरण भी होता गया।मनुवाद को सामाजिक चेतना से कोई आपत्ति नही थी मगर राजनीतिक चेतना से इनकी नींद हराम हो चुकी थी।पंजाब के साहिब मंगू राम मुगोबाल ने तो सारे भारतवर्ष में ही उथल पुथल मचा रखी थी, जिससे सारी कांग्रेस परेशानी के कारण उन्हें पर्दे से हटाने केलिये गुदागर्दी पर उतरने केलिये पंजाब के सिखों को उकसाने का काम कर रही थी परंतु मंगूराम मुगोबाल जी को तो तोफ के मुंह से भी आदि पुरुष ने बचा लिया था, जिन्हें मौत का कोई ख़ौफ़ नहीं था, वे निरन्तर पंजाब आदिधर्म मंडल के झंडे औऱ डंडे को लेकर घूम रहे थे,जिन्हें रास्ते मे सर्वश्रेष्ठ वकील डॉक्टर भीम रॉव अंवेदकर महाराष्ट्र में मिल गए, उतर प्रदेश में स्वामी अच्छूतानंद हरिहर, तामिलनाडु में मैनुअल शेखरन।इस चौकड़ी से केवल कांग्रेस ही नहीं समूचा मनुवाद कांप उठा, इन लोगों के पास ,अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने की एक ही रणनीति है,वह है घात लगाकर मारना ।इसी नीति के तहत ,मैन्युल शेखरन को मारा गया, स्वामी अच्छूतानंद जी के ऊपर भी आगरा में जोरदार आक्रमण किया गया जिसमें स्वामी जी के ,अंग रक्षकों ने अपनी जान हथेली पर रख कर, स्वामी जी के प्राण बचा लिए उसके बाद वे काफी सतर्क हो गए। तेरह चौदह जुलाई 1927 को पुनः ,स्वामी जी को मारने की धमकी दी गई, जो अर्जुन समाचार पत्र में छपवाई गई ताकि स्वामी जी के कार्यकर्ताओं को आतंकित किया जा सके और वे अपना मुंह बंद करके, आदि हिन्दू आंदोलन को रोक दें।
स्वामी जी के शुभ चिंतकों ने हमलों के कारणों का विश्लेषण करते हुए ,अनुभव किया कि, हिन्दू इस बात से नाराज हैं कि,स्वामी जी उनके बताए,सिखाए रास्ते से हट गए,जिस काम केलिये उन्होंने स्वामी को देश दुनियां में प्रचारित किया था,उससे वे हटकर हिंदुओं के ही विरोद्ध में खड़े हो गए।हिन्दू धर्म पर दिन प्रति दिन पाषाण प्रहार ही करते जा रहे हैं।हिन्दू रीति रिवाजों, को काटते जा रहे हैं।आदि हिन्दू आंदोलन को राजनैतिक आंदोलन के रूप में परिवर्तित करना हिंदुओं केलिये खतरे की घण्टी बनती जा रही है।हिंदुओं को चिंता यही सता रही थी कि अगर मूलनिवासी आंदोलन इसी प्रकार लोगों में राजनीतिक चेतना पैदा करता गया तो हमें भारत मे गुलाम बनकर ही जीना पड़ेगा।इसी भय को देख कर इन्होंने मूलनिवासी नेताओं के ऊपर हमले करके, उनके जागरूक कार्यकर्ताओं में दहशत का माहौल बनाने का प्रयास किया था।
स्वामी जी अपनी धुन के पक्के थे, वे हिंदुओं की सभी चालों को समझते थे, जिनकी उन्हें कोई चिंता नहीं थी।वे अपने लक्ष्य की ओर दिनोदिन बढ़ते ही गये।प्राणघाती हमलों से तनिक भी नहीं घबराए।
ब्राह्मनबाद की नीति ही गुंडागर्दी पर टिकी हुई है,जिसके सहारे भारत की सभ्यता,संस्कृति, शासन प्रशासन को मूलनिवासियों से छीना था।मूलनिवासी शासकों ने अहिंसा का मार्ग कभी नहीं छोड़ा और ना ही प्रकृति के नियमों को समझा,क्योंकि प्रकृति ने ताकतवर को ही जीने का हक दिया है।निर्बल को बलशाली अपनी ताकत से डरा कर अपनी सत्ता स्थापित करता आया है, जब वही सत्ताधीश निर्बल हो जाता है,तो उसे भी सत्ता छोड़ कर निर्बलों की पंक्ति में आना पड़ता है, शक्तिशाली की गुलामी स्वीकार करके जीवन बसर करना पड़ता है, मगर मूलनिवासी शासकों ने, इन नियमों की अनदेखी करके अपने मूलनिवासियों को आर्य हिंदुओं का गुलाम बनने दिया,जबकि इनकी बिसात ही छीनकर खाने और जीवन बसर करने की रही है।जो भी इनके रास्ते पर अड़चन बनने का प्रयास करता है उसे ये लोग अपने ही दुश्मन को उकसा कर,भड़का कर मरवाकर, उनमें आतंक फैला कर अपना उल्लू सीधा करता आया है, जबकि खुद शहीद होने से डरते हैं, ये लोग कभी भी नहीं मरते केवल कांटे से कांटे को ही निकाल कर जिंदा रहते आए हैं।
स्वामी जी ने उत्तर प्रदेश में आदि हिन्दू आंदोलन शुरू करके, मनुवाद की जड़ों को हिला कर जहां, मूलनिवासियों के जहन में सामाजिक चेतना जागृत कर दी, वहीं उसी चेतना से राजनीतिक जनजागरण भी होता गया।मनुवाद को सामाजिक चेतना से कोई आपत्ति नही थी मगर राजनीतिक चेतना से इनकी नींद हराम हो चुकी थी।पंजाब के साहिब मंगू राम मुगोबाल ने तो सारे भारतवर्ष में ही उथल पुथल मचा रखी थी, जिससे सारी कांग्रेस परेशानी के कारण उन्हें पर्दे से हटाने केलिये गुदागर्दी पर उतरने केलिये पंजाब के सिखों को उकसाने का काम कर रही थी परंतु मंगूराम मुगोबाल जी को तो तोफ के मुंह से भी आदि पुरुष ने बचा लिया था, जिन्हें मौत का कोई ख़ौफ़ नहीं था, वे निरन्तर पंजाब आदिधर्म मंडल के झंडे औऱ डंडे को लेकर घूम रहे थे,जिन्हें रास्ते मे सर्वश्रेष्ठ वकील डॉक्टर भीम रॉव अंवेदकर महाराष्ट्र में मिल गए, उतर प्रदेश में स्वामी अच्छूतानंद हरिहर, तामिलनाडु में मैनुअल शेखरन।इस चौकड़ी से केवल कांग्रेस ही नहीं समूचा मनुवाद कांप उठा, इन लोगों के पास ,अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने की एक ही रणनीति है,वह है घात लगाकर मारना ।इसी नीति के तहत ,मैन्युल शेखरन को मारा गया, स्वामी अच्छूतानंद जी के ऊपर भी आगरा में जोरदार आक्रमण किया गया जिसमें स्वामी जी के ,अंग रक्षकों ने अपनी जान हथेली पर रख कर, स्वामी जी के प्राण बचा लिए उसके बाद वे काफी सतर्क हो गए। तेरह चौदह जुलाई 1927 को पुनः ,स्वामी जी को मारने की धमकी दी गई, जो अर्जुन समाचार पत्र में छपवाई गई ताकि स्वामी जी के कार्यकर्ताओं को आतंकित किया जा सके और वे अपना मुंह बंद करके, आदि हिन्दू आंदोलन को रोक दें।
स्वामी जी के शुभ चिंतकों ने हमलों के कारणों का विश्लेषण करते हुए ,अनुभव किया कि, हिन्दू इस बात से नाराज हैं कि,स्वामी जी उनके बताए,सिखाए रास्ते से हट गए,जिस काम केलिये उन्होंने स्वामी को देश दुनियां में प्रचारित किया था,उससे वे हटकर हिंदुओं के ही विरोद्ध में खड़े हो गए।हिन्दू धर्म पर दिन प्रति दिन पाषाण प्रहार ही करते जा रहे हैं।हिन्दू रीति रिवाजों, को काटते जा रहे हैं।आदि हिन्दू आंदोलन को राजनैतिक आंदोलन के रूप में परिवर्तित करना हिंदुओं केलिये खतरे की घण्टी बनती जा रही है।हिंदुओं को चिंता यही सता रही थी कि अगर मूलनिवासी आंदोलन इसी प्रकार लोगों में राजनीतिक चेतना पैदा करता गया तो हमें भारत मे गुलाम बनकर ही जीना पड़ेगा।इसी भय को देख कर इन्होंने मूलनिवासी नेताओं के ऊपर हमले करके, उनके जागरूक कार्यकर्ताओं में दहशत का माहौल बनाने का प्रयास किया था।
स्वामी जी अपनी धुन के पक्के थे, वे हिंदुओं की सभी चालों को समझते थे, जिनकी उन्हें कोई चिंता नहीं थी।वे अपने लक्ष्य की ओर दिनोदिन बढ़ते ही गये।प्राणघाती हमलों से तनिक भी नहीं घबराए।
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