गुरु रविदास और वैदिक साहित्य की निःसारता।।

।।गुरु रविदास और वैदिक साहित्य की निःसारता।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, वैदिक शास्त्रों का गंभीर आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए, उनकी वास्तविकता को, सारे विश्व में उजागर करने का जोखिम भरा ऐतिहासिक उद्यम किया है, जिसके लिए उन्होंने अनेकों परेशानियां सहन कीं थी। वैदिक साहित्य की अश्लीलता से समाज वहुत विकृत हुआ है, जो जो कारनामे, तेती करोड़ देवी और देवताओं ने किए हैं, उन्हें पढ़ कर, सुन कर सिर शर्म से झुक जाता है। इस साहित्य पर कोई भी स्त्रियों,वहू-बेटियों, माताओं-बहनों के साथ बैठकर चिंतन नहीं कर सकता। हिन्दू फिर भी बड़े गर्व से, वैदिक साहित्य को ही प्रभु प्रदत ज्ञान सिद्ध करते नहीं थकते हैं, आज विज्ञान के इरा में भी इन्हें आदर्श साहित्य मानकर, अखबारों रेडियो दूरदर्शन पर दिखाते फिरते हैं, इन्हीं देवियों देवताओं के नकारात्मक हरकतों, विचारों, छलात्मक पैंतरों को भावी नागरिकों को पढ़ाया और समझाया जाता है, जिस से वच्चों की मानसिकता भी विकृत होती जा रही है, वही देवी देवताओं के चारित्रिक गुण सीख कर, भारतीय समाज को दूषित करने का नकारात्मक ज्ञान हासिल करते जा रहे हैं। सड़कों पर युवा, लड़कियों को मशख्रियाँ मारते हुए, कृष्ण के अंदाज में कहते हुए सुने भी है कि, तेरे पिछे फिरदा कुंआरा। जो माब्लिंचिंग हो रही है, वह भी रामायण युगीन ब्राह्मणों द्वारा शंबूक की हत्या का ही प्रभाव जान पड़ता है। गुरु रविदास जी ने इसीलिए, ब्राह्मण पुजारियों की लूटघसूट और बुराइयों पर कड़ा तीखा ही नहीं कटु सत्य प्रहार करते हुए, कहा है कि:----
जीवन चारि दिवस का मेला रे।
बामन झूठा, वेद भी झूठा।
झूठा ब्रह्म अकेला रे।
मन्दर भीतर मूरति पूजति।
बाहर बैठा चेला रे।
लड्डू भोग चढ़ावती जनता।
मूरति के ढिग केला रे।
पत्थर मूरति कछु ना खाती।
खाते बामन चेला रे।
जनता लुटती, लूटते बामन सारे रे।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, ये जीवन चार दिनों का इकठ्ठ है अर्थात सांसारिक जीवन को एक मेला कह कर, संबोधित करते हैं कि, इन दुर्लभ चार दिनों में ब्राह्मण कितना झूठ बोलता है, झूठ बोल बोल कर, जनता को लूट रहा है, वेदों की रचना सँगत को भरमाने के लिये की हुई है, बार बार जिनके प्रमाण दे दे कर, भोलीभाली जनता को, मिलकर अंधाधुंध लूटते ही जाते हैं, जबकि ये वेद झूठ के पुलिंदे ही हैं। जिनका एक मात्र ब्रह्म भी झूठ का ही प्रतीक लगता है। मंदिर के भीतर पत्थरमूर्ति विराजमान है, जिसकी पूजा अर्चना जनता करती ही जाती, चढ़ावा चढ़ाती ही जाती है। बाहर उस चढ़ावे पर नजर रखने के लिये चेला बैठा हुआ है, जनता मूर्ति को लड्डु चढ़ा कर भोग लगाती जाती है, मूर्ति के सामने केलों के ढेर लगे हुए हैं, बेचारी पत्थर की मूर्ति तो कुछ भी नहीं खाती है, मगर गुरुजी और चेला दोनो बड़े मजे से खाते फिरते हैं। सारे पण्डे, पुजारी, जनता को लूटते रहते। गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी के तीर खींच खींच कर निरीह जनता के दिलों पर मारे हैं कि, आपका भाई, शोषण हो रहा है, आपको लूटा जा रहा है, आप इस लूट को समझो, अपने हक हलाल की कमाई को बर्बाद मत करो। ये क्रांतिकारी प्रवचन कोई माई का लाल, उस समय तो क्या आज भी स्वतंत्रता मिलने के बाद भी नहीं दे पा रहा है। सर्वोच्च पद पर बैठा राष्ट्रपति भी अपने सम्मान को बचाने में असफल रहा है। गुरु रविदास जी प्रत्येक किस्म की क्रांति का आह्वान करते हुए फरमाते हैं कि, अपने अधिकारों को समझो और उन्हें पाने के लिये, जिस हद तक जा सकते हो, जाओ! ।।सोहम।।जय गुरुदेव।।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।

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