गुरु रविदास और ब्राह्मणवाद में परिवर्तन।।

।।गुरु रविदास और ब्राह्मणवाद में परिवर्तन।।
गुरु रविदास जी महाराज ने जो, वहुजन क्रान्ति का शंखनाद, जन्म लेते ही किया था, उससे, ब्राह्मणवाद कांप उठा था। ब्राह्मणों ने बीसवीं शदी में आकर अपने छलप्रपंचों, आडंबरों का गहन अध्ययन किया जिससे, ये लोग इस निर्णय पर पँहुच चुके हैं कि, जो वेदों, पुराणों, मनुस्मृतियों, ब्राह्मण ग्रँथों, दर्शन शास्त्रों में, बेतुके ही नहीं तर्कहीन प्रक्षिप्तांश जोड़े गए हैं, उनसे ब्राह्मणवाद की सारे संसार में बुरी तरह से किरकिरी होती आई है, तर्कहीन बेसिरे, बेमुँहें हनुमान, ब्रह्मा, गणेश, देवी, देवताओं के चित्र, शूद्रों को अमानवीय तरीकों से जलील करने वाले, शास्त्रों के प्रसंग, मूल निवासी महाऋषियों के कत्ल, सन्तों और महापुरुषों की जेल यात्राएँ, ब्राह्मण धर्म की मिट्टी पलीत करते आए हैं, जिन का पुनः आलोचनात्मक विश्लेषण करके, ब्राह्मणों द्वारा नए ढंग से लिखने का चलन शुरू हो गया है, गीता प्रेस गोरखपुर ने जो ताजा नई वाल्मीकि रामायण छपवाई है, उसमें से महाऋषि शंबूक, कत्ल कांड हटा दिया गया है।
अब ये चिंतन और आत्मविश्लेषण का विषय है कि, ब्राह्मण इतना बड़ा निर्णय किन किन परिस्थितियों में, क्यों लेने के लिए, विवश हो गए? क्यों अपने इतिहास को बदलने के लिए तैयार हो गए? इन प्रश्नों के उत्तर तलासने का प्रयास अगर किसी ने किया है तो, प्रोफेसर लालसिंह ने किया है, वे लिखते हैं कि,गुरु रविदास जी महाराज को, खूँखार हिंदू धर्म की विचारधारा और इसके कार्यन्वयन करने वाले राजे महाराजे और ब्राह्मणों के विरुद्ध हथियारबंद क्रान्ति मचाकर धर्म यद्ध लड़ना पड़ा है, इसलिए बुनियादी तौर पर और अपने स्वभाव से, वे क्रांतिकारी अवश्य हुए हैं। एक क्रांतिकारी केवल तबदीली ही कर सकता है, इसलिए गुरु रविदास जी ने तबदीली ही नहीं की, बल्कि हिन्दू धर्म की विचारधारा को भी नष्ट करके, इस की जगह एक निर्मित धर्म की, नई  विचारधारा के अनुसार अमली रूप से विचरण किया है, इसलिए हर पक्ष और हर रूप से गुरु रविदास जी क्रांतिकारी हुए हैं।
डाक्टर धर्मपाल सिंघल एवं डाक्टर बलदेव सिंह बद्धन (सन्त नामदेव तथा सन्त रविदास तुलनात्मक अध्ययन पृष्ठ-171) के अनुसार सन्तों ने धर्म कठिन साधना, कर्मकांड की ऊहापोहता एवं समाज के पक्षपातपूर्ण रवैये के स्थान पर धर्म को मन्दिरों से निकाल कर जन जन के द्वार तक ले जाने का सफल उपक्रम किया है। उन्होंने एक नए युगधर्म ( धर्ममानव ) की नींव डाली है, जिसके अनुसार सब सुखी हों, सब निरोग हों और सब के लिये मंगल कामनाएं की गई हैं। लोक संस्कृति, लोक काव्य, लोक भाषा को दी गई नई दिशा के कारण वे सन्त भारतीय बांगमय (साहित्य) के विकास एवं प्रचार-प्रसार में चिरकाल तक स्मरण किये जाते रहेंगे।
डाक्टर प्रभाकर माचवे (हिंदी और मराठी की निर्गुण सन्त काव्य पृष्ठ -415) के अनुसार वैदिक परंपरा में नीच जाति का गुरु ही नहीं हो सकता था परन्तु सन्तमार्ग में किसी भी जाति का गुरु हो सकता है। सन्त तुकाराम के सोलह शिष्यों में से दस ब्राह्मण थे। यह क्रांतिकारी परंपरा गुरु रविदास जी ने ही चलाई थी। गुरु रविदास जी ने सभी जातियों के नर नारियों को भगवान के साक्षात दर्शन करवा कर, आम जनता का हौंसला बढ़ाया था। आप ही पहले महापुरुष हुए जिन्होंने चितौड़गढ़ के महाराणा कुंभा की महाराणी झालाबाई को अमर अखण्ड नाम दान, अध्यात्म ज्ञान  प्रदान कर तत्कालीन प्रकाण्ड ब्राह्मणों को दिखा दिया था, कि नारी जो मनुष्य की जन्मदात्री है, वह नीच या छोटी कैसे हो सकती है? इस संसार का कोई भी व्यक्ति ना छोटा है, ना नीच है, सब इंसान बराबर हैं।
वास्तव में, गुरु रविदास जी महाराज से पूर्व, पांच हजार वर्षों के इतिहास में, कहीं भी, ब्राह्मण धर्म के खिलाफ, तर्कपूर्ण ढंग से, किसी ने भी, कभी भी कोई आवाज बुलंद करके, विद्रोह नहीं किया था। ज्यों ही गुरु रविदास जी ने, ब्राह्मण भेष धारण कर के, शंख बजाकर, ब्राह्मणवाद के, टेंट में क्रांति की चिंगारी छोड़ी, त्यों ही, ब्राह्मणों के आडंबरों के किले भष्म होते गए, उनकी चमत्कारी शक्ति के समक्ष, ये सभी लोग मूकदर्शक बन कर, रहने के लिये विवश हो गए, जितने षडयन्त्र ये लोग कर सकते थे, किये, जितनी विष्णु की षडयन्त्रपूर्ण चालें चल सकते थे, चलीं, मगर इन्हें राजा बलि, सम्राट शिव, सम्राट महिसासुर, राजा नंद, जैसे अदूरदर्शी, गुरु रविदास जी महाराज नही मिले, जिन्हें ये लोग छल सकें और इसी कारण ये लोग हमेशा औंधे मुंह गिरते रहे। जितने शास्त्रार्थ हुए उनमें ये लोग बुरी तरह पराजित हुए। गुरु जी की अभेद्य शक्ति के समक्ष इन की एक भी पेश नहीं चली, जिसके कारण गुरु रविदास जी के खिलाफ, इनका द्वेषपूर्ण, घृणा फैलाओ अभियान, उनके ब्रह्मलीन होने के पश्चात ही शुरू हुआ, जिसमें इन्होंने गुरु जी को चर्मकार सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जबकि गुरु रविदास जी स्वयं अपने श्री मुख से कहते हैं कि:---
""चमरठा गाँठि ना जानी""
अर्थात हम चमड़ा हाथ में पकड़ कर, जूते मुरम्मत करना नहीं जानते, वास्तव में, वे तो फ़टी पुरानी गन्दगी से लथपथ, लोगों की आत्मा की रिपेयर करते थे, जिस के स्थान पर ब्राह्मण लेखकों ने, गुरु जी को रंबी और आर हाथ में पकड़ा कर चर्मकार के रूप में प्रसिद्ध करने में ही अपनी ऊर्जा बर्बाद की। गुरु जी के स्पष्ट और दो टूक शव्दों में कहने पर भी, ब्राह्मण रुके नहीं और बड़ी बेशर्मी से गुरु जी के खिलाफ, अपना घृणित अभियान जारी रखा, जिस की बिना सोचे समझे गुरु रविदास जी के अनुयायियों ने भी नकल की है और गुरु जी को, क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत ना करके केवल चर्मकार के रूप में ही सँगत के समक्ष प्रस्तुत किया है, मगर अब जब मूलनिवासी समाज मनोवैज्ञानिक, तर्कपूर्ण ढंग से आलोचनात्मक विश्लेषण कर रहा है तो ,इन्होंने अपना नजरिया बदल कर नए ढंग से लिखना शुरू कर दिया है, जो गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी से ही संभव हुआ है मगर इस अति विष्मयकारी परिवर्तन को समझने और अध्ययन करने की, हमारे समाज को नितांत आवश्यकता है।।सोहम।।जय गुरुदेव।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
जुलाई 13,2020।

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