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Showing posts from February, 2021

लार्ड लोथियन बहस से हुई आदधर्म मंडल की उपलब्धियां।।

।। लार्ड लोथियन बहस से हुई आदधर्म मंडल की उपलब्धियां।। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और भारत रत्न डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जोड़ी ने, लार्ड लोथियन के सामने जो कमाल किया था, उस से समूचा ब्राह्मणवाद कांप उठा, क्योंकि साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी ने जो रणनीति तैयार की थी, उस की भनक किसी को भी लग नहीं पाई थी। उन जी योजनाओं का किसी भी छदमी ब्राह्मण को अहसास नहीं हुआ था, अगर हो जाता तो ना जाने क्या छल खेला जाता। जहां सिख धर्म, हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, के नेता, अंदर और बाहर के शूद्रों को अपनी जनसंख्या बढ़ाने के लिए मुँह से लारें टपका रहे थे, वहां सभी के मुंह से, बबूल के कड़बे स्वाद परेशान कर रहे थे। शाही कमीशनों की रिपोर्टों के आधार पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडॉनल्ड ने, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज के, ज्ञापनों और तर्को के आधार पर भारत के वास्तविक मूलनिवासियों को ही नहीं अपितु समस्त अल्पसख्यकों को भी प्रतिनिधित्व देने का निर्णय लिया गया था, जिस को कम्युनल अबार्ड कहा गया था। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने, जिस तरीके से आदधर्म मंडल के दबाब समूह की मांगों को, ला...

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल लाहौर कांफ्रेंस में।।

।।साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल लाहौर कांफ्रेंस में। अछूतों के दुश्मन मोहनदास करमचंद गांधी ने अंग्रेजों को कहा था कि, भारत में कोई अछूत नहीं हैं, केवल छोटे हिन्दू ही हैं, जिन्हें हम जल्दी ही अपने बराबर बना लेंगे, जिस से वे संतुष्ट हो गए थे, कि ये सत्य हो होगा। साहिबे कलाम के ज्ञापनों की गांधी एंड कंपनी ने, मिट्टी पलीत कर दी थी। जब इस षडयंत्र का आदधर्म मंडल के नेताओं को पता चला तो वे सारे सकते में पड़ गए। सभी पांच साल के अथक परिश्रम को मिट्टी में मिलते देख कर, हार मानने लग पड़े थे। ब्राह्मणवाद का मोहरा गांधी भी नहले पर दहला फेंक रहा था। जहां ये वकील अपनी दलीलों से, अंग्रेजों को मूर्ख बना कर, अछूतों के अधिकारों को छीनने की विसात बिछाते जा रहे थे, वहां कम पढ़े लिखे किस प्रकार मुकाबला कर सकते थे, मगर साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी हिम्मत हारने वाले नेता नहीं थे। वे भी अपनी योजनाओं को सफल बनाने में दिन रात लगे रहे। भले ही गांधी ने अंग्रेजों को मूर्ख बना दिया था, भले ही ब्राह्मणों ने तुरुप चाल चल कर, अछूतों को गुलाम बनाने की योजना को सफल बना लिया था, मगर गांधी, नेहरू, बल्लभभाई पटेल, साहिबे कलाम...

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी और स्वामी ईशर दास।

।।साहिबे कलाम मंगूराम मुगोवाल और स्वामी ईशर दास।। सन 1929 ईस्बी को पंजाब के लुधियाना में सन्त सम्मेलन आयोजित किया गया। जिस में सर्वसम्मति से ये प्रस्ताव पारित किया गया कि, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ को, स्वामी ईशरदास जी महाराज ही तैयार करेंगे। स्वामी जी ने उपस्थित सँगत को, पूर्ण विश्वास दिलाते हुए कहा कि:--- दीर्घ शब्द में गुर की महिमा, लिखी ना जाए। जे गुर किरपा करनगे तो आप लैहन लिखाए। स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, आदपुरुष की महिमा के बारे में कहा, कि ,परम पिता परमेश्वर की महिमा को कोई भी माई का लाल लिख नहीं सकता है, यदि वे ये चाहेंगे तो स्वत ही अपनी भोली भाली निरीह सँगत के लिए, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ, लिखवा लेंगे। स्वामी जी ने, जब ये उत्तरदायित्व स्वीकार कर लिया, तब साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी निश्चिंत हो गए और, आशावान हो गए कि हम अपनी मंजिल को प्राप्त कर लेंगे। वास्तव में आदपुरुष ने, पहले ही मूलनिवासी आदिवासियों की स्वतंत्रता के साथ, स्वत: ही नींव बनाई हुई थी, जिस के लिये ही स्वामी ईशर दास जी महाराज, गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और उन के साथी आदधर्मी हजारा राम पिपलांवाला, सन्...

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ।

।। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ।। जनवरी सन 1928 इस्बी को जोहन साईमन कमीशन जब लाहौर पहुँचा था, तब साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के नेतृत्व में हंस राज प्रेमगढ़ आदि, अपने पांच हजार लाल पगड़ी  धारियों के साथ, "गुरु रविदास शक्ति, अमर है, अमर है" के नारे लगाते हुए, साईमन कमीशन के पास पेश हुए थे। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी ने, जोहन साईमन कमीशन को अपना मेमोरेंडम दे कर, गुलामों के गुलाम अछूतों की दर्दनाक तस्वीर प्रस्तुत की, जिस को साईमन ने, तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री को सौंप दिया था, मगर जब पुनः साईमन कमीशन की रिपोर्ट भारत में आई, तो आदधर्म मंडल के नेता उसे पढ़ कर बड़े हैरान हुए। रिपोर्ट में लिखा था कि, पंजाब के आदिधर्मी अछूत, भारत के अन्य सूबों के अछूतों की अपेक्षा बेहतर स्थिति में हैं, जिस रिपोर्ट को पढ़ कर, आदधर्म मंडल ने, एम सी राजा का बहिष्कार कर दिया और कहा कि, ये आदमी हमारा प्रतिनिधि नहीं है। नबंबर 1928 को आदधर्म मंडल का डेपुटेशन पुनः साईमन कमीशन को मिला। इंग्लैंड में आदधर्म मंडल के मेमोरेंडम पर चर्चा हुई और आदधर्म की मांगों को स्वीकार कर लिया गया...

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल से बढ़ कर कोई राष्ट्रवादी नेता नहीं हुआ।

।। साहिबे कलाम मंगू राम से बढ़ कर कोई राष्ट्रवादी नेता नहीं हुआ। आदधर्म मंडल के नौ विधायक सन 1937 के असेंबली चुनाबों में जीता कर, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी ने जो चमत्कार कर दिखाया था, उस से हिन्दू-मुस्लिम नेता सकते में पढ़ गए थे। हिन्दू नेताओं के पांवों तले जमीन खिसक गई थी, उधर मुस्लिम नेता मुहम्मद अली जिंन्हा के भी होश उड़ गए थे। हिन्दू-मुस्लिम नेताओं को वहुजन राज की भनक पड़ गई थी कि, हम साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल से बाजी हार जाएंगे, जिस के लिये हिन्दू मुस्लिम नेताओं ने अपनी अपनी विसात बिछाने के लिए योजनाएं बनानी शुरू कर दीं थी। हिन्दू नेताओं गांधी, नेहरू ने, दस साल के लिए गुलामी और मांग कर अंग्रेजों को सकते में डाल दिया था, उधर मिस्टर मुहम्मद अली जिंन्हा ने भी विशाल पाकिस्तान के निर्माण के लिए, स्वपन में अपने खुआब लेने के लिए  शुरू कर दिए थे। मुहम्मद अली जिंन्हा ने, पंजाब आदधर्म मंडल को निगलने के लिए, अपने सचिव को कुछ साथियों सहित , गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी के घर, गाँव मुगोवाल भेजा ताकि उन से सौदेबाजी कर कर के, उन के नौ विधायकों का समर्थन जुटा कर, पाकिस्तान की ...

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और मनुवादी आतंकवाद।।

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और मनुवादी आतंकवाद।। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल पंजाब और स्वामी अच्छूतानंद जी महाराज कानपुर, उत्तर प्रदेश के प्रयासों से, अंग्रेजी सरकार ने भारत के अछूतों को विशेष अधिकार दे दिये थे, जिन में अछूतों को दो वोट का अधिकार, मनुवादियों से बर्दास्त नहीं हो रहा था, जिस के खिलाफ मोहन दास करमचंद गांधी ने, यरवदा जेल में आमरण अनशन रख दिया था। गांधी इतना धोखेबाज क्रूर व्यक्ति था कि, भारतवर्ष के मूलभारतीयों को कोई भी अधिकार नहीं देना चाहता था, इसी लिए उस ने, अंग्रेजों को कह दिया था कि भारत में कोई भी अछूत नहीं है, केवल छोटे हिन्दू हैं जिन्हें हम जल्दी ही अपने बड़े हिंदुओं के साथ मिला लेंगे, जो एक वहुत बड़ी मक्कारी भरी चाल चली जा रही थी। मूलभारतीयों को गुलाम बनाये रखने की साजिश रच कर, और सुरक्षित हो कर जेल में बैठ गया था, ताकि कोई अछूत उसे कोई नुकसान ना पँहुचा सके मगर हुआ इस के विपरीत कि, जिन के लिये ये छली काम कर रहा था, उन्हीं लोगों ने उसे मौत के घाट उतार दिया था, कहते हैं ना देर है अंधेर नहीं। कम्युनल अबार्ड के खिलाफ गांधी जहां यरवदा जेल में ड्रामा कर रहा था, वहीं मूलभ...

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल की अधूरी शिक्षा।

।।साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल की अधूरी शिक्षा।। ब्राह्मणवाद इतना खतरनाक राक्षस है, जिस का अनुमान, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी की शिक्षा से लगाया जा सकता है। इन के पिता हरनाम दास अपने बेटे मंगू राम को अंग्रेजी की उच्च शिक्षा दिलाने का खुआब देखा करते थे, वे चाहते थे कि उन का बेटा अंग्रेजी पढ़ लिख कर, समाज का नाम रोशन करे। अछूत समाज को अंग्रेजी की समस्या से मुक्त कराना भी उन का लक्ष्य था, क्योंकि उस समय कोई भी अछूत अंग्रेजी ना तो पढ़ सकता था और ना ही लिख सकता था। अछूतों को अंग्रेजी के पत्र पढ़ने के लिए भी मनुवादियों के पास जा कर जलील होंना पड़ता था। अछूतों को अंग्रेजी के पत्र पढ़ाने के लिए, कई प्रकार की गुलामी करनी पड़ती थी, इसीलिए पिता हरनाम दास जी ने, साहिबे कलाम मंगू राम जी को, होशियार पुर के समीप बिजबाड़ा स्कूल में पढ़ने भेजा। मंगू राम को, पहले तो विद्यालय में प्रवेश ही बड़ी मुश्किल से मिला, जब मिला तो छुआछूत का मॉन्स्टर उन के साथ ही वहां आ गया। टीचर चमार शब्द से ही करंट खाते थे, फिर चमार को 2222WwWwW22WW2W2W22W2WWW2222222WWW222WWW22W2222WW2WW2W2W222Q तो दूर की बात थी। उन्हें मनुवादी वच्च...

साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल की भूमि अराजी एक्ट के खिलाफ जंग।।

।।साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल की भूमि अराजी एक्ट के खिलाफ जंग।। जब साहिबे कलाम मंगू राम जी मुगोवाल, डेथ वारण्ट के समाप्त होने पर भारत पहुँचे और घर आ कर, जीवन बिताने लगे तब उन्हें यूरोप और भारत के मनुवाद के शासन का अंतर ज्ञात हुआ था। गद्दरी बाबा भले ही विदेशों की जेलों में मौत का इंतजार करते रहे हों, तोप के सामने उड़ाए जाने का इंतजार करते रहे हों, भले ही जंगली वनवासी लोगों के साथ जीवन जीते रहे हों, मगर वहां जेलों में कोई भी किसी भी प्रकार की दुर्गंध नहीं हुआ करती थी, कोई भी गुलामी नहीं हुआ करती थी, कोई भी किसी के मौलिक अधिकारों को जबरन छीन नहीं सकता था, मगर भारत में आ कर पशुओं के चमड़े की दुर्गंध के बीच ही रहना, सोना, खाना, पीना और जीना पड़ रहा था, अस्सी प्रतिशत मूलनिवासी, मूलभारतीयों को भूमिहीन होने के कारण मनुवादियों की जमीन में शरणार्थी बन कर रहना पड़ रहा था। ऐसी ही दशा में, यूरोप के खुले वातावरण के बीच जीवन व्यतीत कर के, आने वाले साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी को, अपने ही पैतृक गांव मुगोवाल में रहना पड़ रहा था, सारे गांव में चमड़े का कारोबार हो रहा था, जिस के कारण दुर्गंध में रहना, उन क...

महाऋषि वेद व्यास का कलंकित जीवन।।

।। महाऋषि वेद व्यास का कलंकित जीवन।। वेदों पुराणों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि, जिन राजाओं महाराजाओं की कथाएं वेदों पुराणों में भरी पड़ी हैं,वे सभी मूलभारतीयों की ही हैं,जिन्हें मनुवादी पुट देकर पुनः लिखा गया है।हरिबंश पुराण में लिखा गया है कि सत्यवती पिछले जन्म में पितरों की बेटी अछोदा थी, जिसे पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप था। एक लेखक लिखता है, कि सत्यवती एक अभिशप्त बेटी को अप्सरा अद्रिका नाम  दिया गया था। अद्रिका एक शाप से, मच्छली में तब्दील हो गई थी और यमुना नदी में रहने लगी थी। दूसरी किंवदंती के अनुसार, एक चेदि राजा ने, आकाशीय मार्ग से, अपना वीर्य अपनी रानी को भेजा था, मगर किसी ईगल के साथ मध्य वायु से लड़ने के कारण वीर्य नदी में गिर गया और शापित आद्रिका मच्छली द्वारा निगल लिया गया था, जिस से मच्छली गर्भवती हो गई। जल्दी ही एक मछुआरे ने मच्छली को पकड़ लिया, जब उस ने मछली का उत्सर्जन किया तो, उस के गर्भ से एक लड़का और एक लड़की निकली। लड़के कानाम मत्स्य राज रखा गया था जो बाद में मत्स्य राजा रबना था और लड़की का नाम काली रखा गया था, जिसे बाद में सत्यवती कहा गया था।सत्यवती अपने पिता मछुआर...

क्रांतिवीर सतगुरु कबीर साहिब।।

।।क्रांतिवीर सतगुरू कबीर साहिब।। जब धरती पर, अत्याचार अधिक बढ़ जाते हैं तब आदपुरुष किसी महाशक्तिमान को अपना आशीर्वाद देकर, धरती पर अवतरित करते आए हैं। इसीलिए चौहदवीं शताब्दी के आरंभ में, सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी हुए, उन की सहायता के लिए, सतगुरू क्रांतिवीर कबीर भी अवतरित हुए थे, जिन का जन्म संम्मत 1455 की ज्येष्ठ पूरिणमा को कांशी के लहरतारा में हुआ था और संम्मत 1575 की माघ शुक्ल एकादशी को मगहर में मोक्ष प्राप्त हुआ था। इन की माता जी नीमा और पिता जी नीरू थे। इन से पूर्व ही संम्मत 1433 को सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज का प्रकाश हो चुका था, जिन्होंने ब्राह्मणवाद के अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ जंग शुरू कर रखी थी। जिस रास्ते पर, वे चल रहे थे उसी विकट रास्ते पर सतगुरु कबीर साहिब भी चल पड़े, जिस से वे एक एक मिल कर दो ग्यारह हो गए, तीसरे नामदेव जी भी उन से मिल गए। चौथे गुरु नानकदेव जी, पांचवें सेन भी उन की सेना में शामिल हो गए। इस समय मॉनवता खतरे मेँ पड़ी हुई थी, कत्लेआम जोरों पर चल रहा था, भोलीभाली जनता को लूट कर खाने वाले शासक, मुस्लिम तलबार के भय से, मुंह बंद कर के अपनी जान बचा कर, मुस्...

महाऋषि वाल्मीक जी के चरित्र हनन की दंतकथाएं।।

।।महाऋषि वाल्मीकि जी के चरित्र हनन की दंतकथाएं।। बड़े ही आश्चर्य की बात है कि, भारत के जितने भी मूलनिवासी महापुरुष हुए हैं, वे प्रारंभ में, या पिछले जन्म में, कोई ना कोई हीन कर्म करते रहे हैं, जब कि यूरेशियन ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही नहीं सभी ऋषि, मुनि भी अनैतिक कर्म, भ्रष्ट, झूठ छल, फरेब, दगाबाजी करने से पीछे नहीं रहे हैं मगर उन के ये अनैतिक, बुरे कार्य भी किसी ना किसी बहाने से छुपा कर, उन्हें पाक, पवित्र ही सिद्ध किया हुआ है। इसी लिखने की नीति के अनुसार महाऋषि वाल्मीकि को भी कंलकित किया हुआ है, स्कूली पाठ्यक्रमों में पढ़ा कर, वच्चों के दिलो में, वाल्मीकि जी के प्रति, कटु भावना पैदा की गई है। वे बचपन में चोर, डाकू लुटेरे थे, राहगीरी करते थे, खून, कत्लेआम कर के अपना और अपने परिवार का पेट भरते थे। उन के लिखे गए, साहित्य का लाभ उठाने के लिए, उन की दाद देने के लिए, उन का सम्मान करने के लिए, नई कथा और घड़ी गई है कि वे, नागा प्रजाति में जन्मे थे। वे प्रचेता वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि के भाई थे। इन को मनुवादी सिद्ध करने के लिए ये कथा घड़ी गई है, इन्हें कलंकित करने के लिए निसंतान भीलनी द्वारा बचपन...

प्रोफेसर सरदार दित्त सिंहजी।

।। प्रोफेसर सरदार ज्ञानी दित्त सिंह जी। अनादिकाल से ही, अगर साहित्य के इतिहास पर नजर डाली जाए तो, भारत भूमि पर, केवल मूलनिवासी, आदिवासी ही महापुरुष अवतरित हुए हैं, जिन्हों ने साहित्य के क्षेत्र में नाम कमाया है। चाहे वेदों, पुराणों के रचयिता वेद व्यास को ही देख लो, चाहे रामायण के लेखक वाल्मीकि जी को देख लो, चाहे वर्तमान स्वतंत्र भारत के संविधान लेखक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को देख लो, चाहे गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के लेखक स्वामी ईशरदास जी महाराज को देख लो, चाहे क्रान्ति के महानायक गुरु रविदास जी महाराज और वर्तमान क्रांतिवीर साहिब कांशीराम जी को देख लो, जिन के सिद्धांत सारे विश्व में फैले हुए है। विदेशी बुद्धिजीवियों, स्कॉलरों ने भी, इन के ज्ञान और सिद्धांतों का अनुशीलन कर के, ऐसे अविष्कार किये हैं, जिन से मॉनव जीवन, सरल, सुखमय हुआ है। वर्तमान में ही दृष्टिपात किया जाए तो, गुरु रविदास जी महाराज ने भी कहा था:--- ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सभन को अन्न। छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न।यही पंक्तियां कार्ल मार्क्स के, समाजवाद की नींव बन गई और कई देशों में, समाजवाद आ भी गया था। इसी तरह पंज...

उपप्रधान मंत्री बाबू जगजीवन राम का हश्र।

।।उपप्रधान मंत्री बाबू जगजीवन राम का हश्र।। भारत के मूलनिवासी धार्मिक, राजीतिक नेता ब्राह्मणवाद को नहीं समझ रहे, अमीर ब्राह्मण अपने गरीब ब्राह्मणों को भी, गरीब बनाए रखने से पीछे नहीं हैं फिर मूलभारतीयों, आदवंशियों, मूलनिवासियों की तो औकात ही क्या है ? ये  यूरेशियन अमीर पाँच हजार वर्षों से, छल कपट से, मूलनिवासी भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए, नित नए नए ढंग अपनाते हैं, जिन को मूलनिवासी धार्मिक और राजनीतिक नेता नहीं समझ पा रहे हैं। यूरेशियन धर्म और राजनीति के लोग मूलनिवासी नेताओं की, खरीद फरोख्त कर के, अपनी राजसत्ता को बचाते आए हैं। जब कि इन लोगों के पास ना तो दिमाग है, ना ही सोच है, केवल छल कपट, हेराफेरी से ही काम चलाते आए हैं। वाल्मीकि रामायण से सूर्यवँशी रामचन्द्र जो मूलनिवासी आदिवासी ही है, का उस के ही मूलनिवासी रावण के साथ युद्ध करवा कर दोनों को ही मिट्टी में मिला दिया था, जिस रणनीति को ना तो राम समझा था, ना ही राजा रावण। वस्ल्मीकि की लिखी हुई रामायण के स्वरूप को मनुवादी रंग का पुट देकर, उस पर अपना कब्जा कर के अधिपत्य जमा लिया हुआ है। जब स्वतंत्र भारत को संविधान चाहिए था तब भी, इ...

प्रथम आई ए एस अच्युतानंद जी से अन्याय।

 ।।प्रथम आई ए एस अच्युतानंद से अन्याय।। स्वतंत्रता के बाद, भारत में, मेधावी योग्य युवाओं को उच्च पदों के लिए चुनने के लिए, लोकसेवा सेवा आयोग की स्थापना की गई थी। इस से पूर्व भी अंग्रेजी सरकार ने भी आई सी एस परीक्षाओं के माध्यम से, प्रशासनिक उच्च पदों के चयन के लिए परीक्षाएं आयोजित की थीं जिन के माध्यम से प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए गए थे। इसी सिस्टम को स्वतंत्र भारत में भी लागू किया गया था। अंग्रेज सरकार, बिंना जातीय, वर्ण भेद, धर्म भेद के  ही, चयन करती थी, कभी भी पक्षपात नहीं करती थी मगर ज्यों ही, मूलभारतीयों के दुश्मन जवाहरलाल नेहरु की सरकार बनने लगी त्यों ही भारतवर्ष के मूलनिवासी लोगों के साथ जातीय भेदभाव शुरू हो गया था, आजादी की लड़ाई लड़ने के कारण मूलनिवासी कांग्रेस को अपनी पार्टी समझ कर, जवाहरलाल नेहरु को अपना प्रधानमंत्री चुनने के लिए, कांग्रेस को वोट देते रहे मगर ये कपटी प्रधानमंत्री, अंदर ही अंदर मूलनिवासियों की जड़ों को काटता रहा, आर एस एस जैसी संस्था को पालता पोसता रहा। कभी भी इस आदमी ने, आरक्षण शतप्रतिशत लागू नहीं किया और ना ही साढ़े बाईस प्रतिशत मंत्री केंद्रीय मंत्...

सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य के अंगूठे का कत्ल।

 ।।सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य के अंगूठे का कत्ल।। जब से भारतीय मूलनिवासी यूरेशियन के गुलाम हुए हैं, तभी से मूलभारतीयों, मूलनिवासियों और आदवंशियों के महापुरुषों को या तो कत्ल किया गया है या उन की विलक्षण प्रतिभा का भी नामो निशान मिटाया जाता आ रहा है। सम्राट शिव शंकर का मर्डर, शंबूक का कत्ल, रावण का छल से कत्ल, राजा बलि का हाथ बॉन्ध कर के कत्ल, एकलव्य की प्रतिभा का निशान मिटाने के लिए, उस के अंगूठे का कत्ल इतिहास आज तक भुला नहीं सका।  एकलव्य कौन थे:---एकलव्य निषादराज का राजकुमार था, वनवासी तो तीर धनुष चलाने में, जन्मजात ही पारंगत होते हैं, फिर उन्हें कौन माई का लाल था, जो एकलव्य जैसे तीव्र बुद्धि के मालिक को तीर चलाना सीखा सकता था। वन में, एकलव्य धनुष चलाने का अभ्यास कर रहा था, जिसे द्रोणाचार्य का कुत्ता परेशान कर रहा था। एकलव्य ने, उस का मुंह तीरों से बन्द कर दिया था, जिसे देख कर द्रोणाचार्य सहित पांडव पुत्रों के होश उड़ गए थे, उन के पैरों तले मिट्टी खिसक गई, क्योंकि तीर कुत्ते के मुंह के अंदर घुस कर उस की जिह्वा को बंद कर बैठे थे, जैसा करना अर्जुन के वश का नहीं था। अर्जुन कुत्त...

राक्षस कुंभकर्ण।

  । । कुंभकर्ण राक्षस ।। सम्पूर्ण मूलनिवासी महापुरुषों का इति हास , तर्कहीन, महाझूठ और कोरी कल्पनाओं पर ही आधारित लगता है। रावण महिसासुर से ले कर, सभी मूलनिवासी भारतीय नायकों के सिरों पर सींग, भयंकर शक्लें, शक्तिशाली वीर योद्धाओं के रूप में चित्र बना कर और उन का अंत दैवीय शक्ति सम्पन्न लोगों के विचित्र सुदर्शन चक्र जैसे काल्पनिक हथियारों से लिखा गया है। जिस इतिहास को भारतीय निरक्षर मूलनिवासी भी सत्य मानते आए हैं। ऐसे ही एक भारतीय महा योद्धा, कुंभकर्ण को भी इतिहास के पन्नों में दर्ज किया गया।है। कुंभकर्ण का परिचय:---कुंभकर्ण, लंकापति राजा रावण का भाई था, जिस के सिर पर भी सींग थे, भयानक, भयावह आकार, डरावनी आंखें, विशालकाय महायोद्धा और गुफाओं में सोने वाला राक्षस लिखा गया है। जो छः महीने बाद भी केवल एक दिन के लिए जागता था। वह फिर दुबारा छः महीने के लिए भोजन कर के सो जाया करता था क्योंकि इस ने ब्रह्मा से निद्रासन का वरदान मांगा हुआ था। जब युद्ध के दौरान किसी तरह कुंभकर्ण को जगाया भी गया, तभी उस ने निंद्रा तोड़ी थी। वीर कुंभकर्ण ने युद्ध में अपने विशाल शरीर से वानर सेना पर आक्रमण करन...

महाऋषि शंबूक जी महाराज का वध।

।।महाऋषि शंबूक वध।। ब्राह्मणवाद, छलकपट की दहलीज पर खड़ा है, जंगलराज के सिद्धांत पर चलता है जिस प्रकार इन्हीं ब्राह्मण कहानीकारों ने, भेड़ के बच्चे और भेड़िए की कथा घड़ी हुई है, आप ने पानी गन्दा किया है ? का बहाना लगा कर, भेड़िए ने मेमने को खा लिया था। ऐसा ही महाऋषि शंबूक के साथ भी घटा था। एक दिन किसी ब्राह्मण का इकलौता बेटा मर गया। तपस्वी शंबूक महाऋषि को मरवाने के लिए, ब्राह्मणों ने लड़के के शव को लाकर राजद्वार पर रख दिया और विलाप करने लगे। उन का आरोप था की बालक की अकाल मृत्यु का कारण राज्य में कोई दुष्कृत्य हैं। ऋषि- मुनियों ने इस पर विचार करके निर्णय दिया की राज्य में कहीं कोई अनधिकारी तप कर रहा हैं। रामचंद्र ने इस विषय पर विचार करने के लिए मंत्रियों को बुलाया। नारद ने उस सभा में कहा, हे राजन! द्वापर में भी शुद्र का तप करना वहुत बड़ा अधर्म हैं। आप के राज्य की सीमा में कोई शूद्र व्यक्ति तपस्या कर रहा हैं। इसी कारण ब्राह्मण बालक की मृत्यु हुई हैं। यह सुनते ही रामचन्द्र पुष्पक विमान पर सवार हो गया और महाऋषि शंबूक की खोज में निकल पड़ा था दक्षिण दिशा में शैवल पर्वत के उत्तर भाग में एक सरोवर पर तप...

पराक्रमी महाराजा महिसासुर।

।। पराक्रमी महाराजा महिसासुर।। एक हजार वर्ष पूर्व तक भारत में, केबल राक्षस ही मूलनिवासी घरों में जन्म लेते थे, यूरेशियन के घर देवता ही जन्म लेते थे। इन राक्षसों के नाम भी बड़े ही विचित्र रखे गए हैं जिन का शाब्दिक अर्थ ही, सत्य को परिभाषित कर देता है। रावण राक्षस के बाद एक और राक्षस महिसासुर का भी अवतार हुआ था जिस का जन्म भी प्रकृति के उसूलों के खिलाफ ही ब्राह्मणों ने किया है। महिसासुर का जन्म:---- महिसासुर का जन्म पिता रँभासुर के घर हुआ था, जिस के जन्म की कथा लिखते समय ब्राह्मण लेखकों को जरा भी शर्म नहीं आई थी। जन्म की मनघड़ंत कथा:----यूरेशियन लेखकों ने लिखा हुआ है कि, एक बार राजा रंभ जल में रह रही भैंस से प्रेम कर बैठा, जिस के संसर्ग से ही महिसासुर का जन्म हुआ था, इसी कारण जब भी महिसासुर चाहे, वह भैंस की सवारी कर सकता था और जब चाहे ये भैंस मनुष्य का रूप धारण कर सकती थी। संस्कृत में महिष का अर्थ भैंस होता है, जो छद्म तरीके से शब्द का अनर्थ कर के ही लिखा गया है, क्योंकि महिसासुर का अर्थ होता है महि अर्थात धरती का राजा जो सुर अर्थात शराब ना पीता हो, इस शब्द का संयोग ही समझा जाए कि, महिष का...

रावण राक्षस के भाई अहिरावण का नाम कल्पित।

।। रावण राक्षस के भाई अहिरावण का नाम कल्पित।। भारतवर्ष में, रावणों की भरमार रही है, वीर महायोद्धा रावण के समय में दूसरा शौर्यवान बलशाली योद्धा भी राक्षस ही था, जिस का नाम रावण के तुल्य ही था मगर, था उसी की तरह अहिरावण। अहिरावण भी एक विचित्र राक्षस था, अहिरावण पाताल में स्थित रावण का मित्र था, जिस ने युद्ध के दौरान रावण के कहने से आकाश मार्ग से उतर कर राम के शिविर में सारे संसार के मालिक राम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था। राम रावण को कामाक्षी देवी के मंदिर में, बलि देने के लिए ले गए थे, जहां से बचा कर हनुमान ही उन्हें लाए थे। ये कथा भी एक मनुवादी लेखक ने ही लिखी हुईं है जिस का अध्ययन करना जरूरी है। दन्त के कथानुसार, जब अहिरावण राम और लक्ष्मण को कामाक्षी देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए, ले गया तो वहां पर वह विभीषण का भेष धारण कर, राम के शिविर में घुसकर अपनी माया के बल पर, राम को नीचे पाताल लोक में ले आया था, तब राम और लक्ष्मण दोनों को ही मुक्त कराने के लिए, वीर पवन पुत्र हनुमान भी पाताल लोक पहुंच गए थे और वहां उनकी भेंट अपने ही पुत्र मकरध्वज से हुई, जिस के कारण उस को पुत्र मकरध्वज के साथ ल...

सर्वश्रेष्ठ महानायक राक्षस कालनेमि।।

। । सर्वश्रेष्ठ महानाय क राक्षस कालने मि।। रावण एक कुशल शासक था और एक कुशल प्रशासक भी था, एक धर्मात्मा भी था, कुशल नीति निर्धारक भी था, कुशल प्रकांड विद्वान भी था, नारी का सम्मान भी वहुत करता था, इन्हीं योग्यताओं के कारण, उस ने, प्रजा की भलाई और सुरक्षा के लिए, योग्य ही नहीं, बुद्धिमान राक्षस भी सीमाओं के ऊपर नियुक्त किये हुए थे, जिन में एक थे कालनेमि। कालनेमि को राक्षस रावण का विश्वस्त सेवक बताया गया है। एक विद्वान लेखक लिखता है कि, कालनेमि भयंकर मायावी और क्रूर था। इस की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। रावण ने इसे एक बहुत ही कठिन कार्य सौंप दिया था। जब राम-रावण युद्ध में लक्ष्मण को शक्ति लग गई थी, तब लक्ष्मण बेहोश हो गया था। तब राम ने, हनुमान को तुरंत संजीवनी लाने के लिए कहा गया था। हनुमान जब द्रोणाचल पर्वत की ओर चल पड़ा तो वीर रावण ने उस के रास्ते मे रूकाबट डालने के लिए वीर कालनेमि नामक राक्षस को भेजा दिया था। राक्षस कालनेमि ने, हनुमान के आने से पूर्व ही अपनी माया से तालाब, मंदिर और सुंदर बगीचा बना लिया था और कालनेमि वहीं एक ऋषि का भेष धारण कर के मार्ग में बैठ गया था। हनुमान जब...

देवी, देवता और राक्षसों का छद्म इतिहास।।

।। देवी , देवता और  राक्षसों का   उतपति का छद्म इतिहास ।। आदिकाल में सुर, असुर, देव, दानव, दैत्य, रक्ष, यक्ष, दक्ष, किन्नर, निषाद, गंधर्व, नाग आदि कोई भी जातियां नहीं थीं। आदपुरुष या आदम से चली आदमी जाति ही थी, मगर ज्यों ज्यों धरती पर आदमी की वृद्धि हुई, त्यों त्यों, उन के नाम से वंश भी बनते गए थे, जिन्हें उन वंशों के गोत्र कहा जाने लगा। भारतवर्ष के मूलनिवासी भृगु ऋषि के वंशज भार्गव कहलाए थे, इसी प्रकार भारद्वाज एक और वंश का नामकरण हुआ। आद का पुत्र जुगाद हुआ, उस के बाद नील हुआ। ज्यों ही भारत में यूरेशियन घुसपैठियों ने, छल बल से मूलनिवासी शासकों से सत्ता छीनी त्यों ही ये भारतीय नील वंश का वास्तविक नाम मिटाने के लिए, नल नील नामक कथा घड़ी गई। सम्राट नील ने, जनता की रक्षा के लिए राक्षस नियुक्त किये हुए थे, यूरेशियन आक्रांताओं ने, इन्हीं क्षेत्रीय रक्षा अधिकारियों को नेगेटिव अर्थ में परिवर्तित कर के, भयानक, कुरूप, सींगों वाला राक्षस सिद्ध कर के अपमानित किया हुआ है। राक्षस उतपति के बाद मूलनिवासी सुरक्षा दलों के कई नाम रखे गए, वर्तमान समय में, इन्हें असुरों और दानवों जैसा ही मान क...

राजा बलि, शुक्राचार्य और अरब देशों का इतिहास।

।।राजा बलि, शुक्राचार्य और अरब देशों का इतिहास।। भारतवर्ष के, मूलनिवासी शासकों की फ़ितरत रही है कि, वे हमेशा ही मिल कर नहीं रहे हैं, ये फ़ितरत आज भी जारी है। राजा बलि भी इसी कड़ी का एक जिद्दी राजा था, जिस ने दानवीर बनने के लिए, अपने दूरद्रष्टा गुरु शुक्राचार्य के आदेश को नहीं माना था और विष्णु के, छल प्रपंच से खुद तो मरा ही था, साथ में अपने तीव्र बुद्धि, गुरु शुक्राचार्य जी को भी ले डूबा और भारत के मूलनिवासी लोगों को भी गुलामी की जंजीरों के बंधनों में बॉन्ध दिया था। तत्कालीन मूलनिवासी शासक मक्का मदीना से चल रही केंद्रीय सरकार के अधीन शासन करते थे, और यदि अपने राजधर्म को समझते हुए, राजधर्म के अनुसार शासन करते तो राजा बलि और उन के गुरु शुक्राचार्य की दुर्गति नहीं हो सकती थी। वे विष्णु और लक्ष्मी को प्रश्रय देने की गलती ना करते तो शुक्राचार्य भी काणा ना होता और ना ही उन्हें केरल नगरी छोड़ कर, सत नगरी मक्का मदीना जाना पड़ता। शुक्राचार्य और अरब का संबंध:---जब राजा बलि ने, अपनी दानवीरता का अहम नही छोड़ा, तब शुक्राचार्य केरल को त्याग कर, मक्का मदीना चले गए थे। वे वहां अपने पौत्र और्ब उर्फ अर्व्ब उर...

आदवंशी दानवीर महाराजा बलि जी महाराज।

।। आदवंशी दानवीर महाराजा बलि जी महाराज। सम्राट शिवशंकर के साम्राज्य में, अनेकों राजे महाराजे शामिल थे, जिन में से एक दानवीर महाराजा बलि जी भी थे। आदिपुरुष से चली आ रही वंशाबली के शासक अत्यंत धर्मवीर, कर्मवीर, दानवीर, न्यायवीर, शूरवीर, रणवीर और क्रांतिवीर, हुए हैं। अपना सर्वस्व दान कर के भी ये आदर्श शासक तनिक भी ध्यान नहीं रखते थे, कि उन के पास शाम के बक्त के लिये, परिवार को कुछ खाने के लिए बचा भी है या नहीं। ये शासक हमेशा भिख मंगे याचकों को कभी भी निराश नहीं करते थे, भिखारियों को कभी भी दुत्कारते नहीं थे। वे नारी जाति का तो सब से अधिक विश्वास और सम्मान करते थे। नारी की ओर आंख तक उठा कर नहीं देखते थे, नारी को केवल सम्मान और श्रद्धा की प्रतिमूर्ति समझते थे, इसी कारण सभी नारी और भिखारी हमेशा ही उन की दानवीरता का अनुचित लाभ भी उठाया करते थे। बलि का उदभव:---विरोचन जी एक आदर्श महाराजा थे, उन के महल में एक बुद्धिमान पुत्र रत्न का जन्म हुआ था, जिस का नाम दानवीर बलि रखा गया था। विरोचन की राजधानी:----महाराजा विरोचन के  साम्राज्य की राजधानी, महाबलीपुरम थी। राजा बलि भी इसी राजधानी से अपना शासन...

महाऋषि शुक्राचार्य के साथ भी ब्राह्मणवाद का षडयंत्र।

।। महाऋषि शुक्राचार्य के साथ भी ब्राह्मणवाद का षडयंत्र।। ब्राह्मणवाद ने, भारत के मूलनिवासी महापुरुषों को आज से पांच हजार सालों से, अपनी छद्म नीति का शिकार बनाया हुआ है। इन लोगों ने, कल्पित इतिहास की सृजना कर के, मूलनिवासी जनता को उलझाया हुआ है। आदपुरुष से ही, मानव का धरती पर पदार्पण हुआ है, आज से पाँच हजार साल पहले, यूरेशियन घुसपैठियों ने, मूलनिवासियों के इतिहास को भ्रामक बना कर, भारत के आदिवासी, आदवंशी, मूलनिवासियों, को घातनीति से गुलाम बनाया हुआ है, चाहे इब्राहीम, चाहे ब्रह्मा का इतिहास खोज कर देख लो, दोनो का स्क्रिप्ट एक जैसा ही है। दोनों की कहानी एक जैसी ही है, जिस से साबित होता है कि, यूरेशियन घुसपैठियों ने, यूरोप, अरब देशों के इब्राहीम को त्याग कर, भारत में आ कर ठीक वैसी ही सभ्यता सृजित की हुई है, जैसी सभ्यता ये घुसपैठिए, अपने पूर्वजों के देशों में छोड़ कर आए हैं। ब्रह्मा का संबंध भारतवर्ष के ऋषियों, मुनियों, महाऋषियों के साथ लिंक कर के, उन्हें भी खलनायक, दस्यु, दैत्य, दानव, राक्षस सिद्ध किया हुआ है। ब्रह्मा से ले कर जो इतिहास रचा गया है, वह केवल मात्र पांच हजार साल पूर्व से ले कर...

महाऋषि शुक्राचार्य सपुत्र भृगु महाऋषि।।

।। महाऋषि शुक्राचार्य सपुत्र भृगु महाऋषि।। जन्म:----शुक्राचार्य का जन्म पिता भृग ऋषि के घर माता दिव्या के गर्भ से हुआ था। महादेवी दिव्या, दानी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री थी। माता पिता ने, शुक्राचार्य का नाम उशना रखा था। कहा जाता है कि, वे एक आंख के अंधे थे। इन के भाई का नाम च्यवन था। पत्नी:----शुक्राचार्य के पुत्र शंद और अमर्क थे।उन की बेटी का नाम देवयानी था जिसे बृहस्पति के पुत्र कच से प्यार हो गया था। दूसरी दन्तकथा के अनुसार, देवयानी का विवाह नहुष राज के पुत्र ययाति से हुआ था, जो बाद में राजा बन गया था। शुक्राचार्य ने इस विवाह की सहमति इस शर्त पर दे दी थी कि, ययाति दूसरी शादी नहीं करेगा मगर ययाति ने इस शर्त को ठुकरा कर, देवयानी की नौकरानी दासी शर्मिष्ठा पर मोहित हो कर उस से भी शादी कर ली थी, जिस से आहत हो कर शुक्राचार्य ने ययाति को शाप दे दिया कि, ययाति तुम तत्काल बूढ़े हो जाओगे। इससे ययाति ने कहा कि इस का प्रभाव तो देवयानी पर भी पड़ेगा तब फिर शुक्राचार्य ने कहा कि अगर कोई आप को अपनी जवानी दे देगा तब आप पुनः जवान हो जाओगे। जब ययाति ने अपने पांचों पुत्रों से जवानी मांगी तो चार पुत्र...

सम्राट बाणासुर का मिथ्या इतिहास।।

।। सम्राट बाणासुर का मिथ्या इतिहास। असुर कौन थे:----भारतवर्ष की धरती अवतारी महापुरुषों की धरती है, जहां आदि पुरुष से ले कर वर्तमान चंवरवंश तक के शासक हुए हैं, जिन के जीने के सिद्धांत, अत्यंत कड़ें थे, वे सुरा सुंदरी से, दूर रहते थे, जिस के कारण, उन्हें असुर कहते हैं, जिस का शाब्दिक अर्थ होता है, जो व्यक्ति सुर, शराब नहीं पीता है। ऐसे थे भारतवर्ष के, संयमी, सौम्य, सुशील, मर्यादित, न्यायिक, चरित्रवान सम्राट, जिन में से एक हुए हैं, बाणासुर जी महाराज। इन्हें छद्म यूरेशियन आक्रांताओं ने, छद्म इतिहास लिख कर  असुर राज, महाकाल, सहस्त्रबाहु, भूतराज भी लिखा हुआ है। बाणासुर का जन्म:----आज से पांच हजार वर्ष पूर्व, सोनितपुर में राजकुमार बाणासुर का जन्म हुआ था।  पिता:----सम्राट बलि वैरोचन सम्राट बाणासुर जी के पिता थे। माता:----बाणासुर की माता साम्राज्ञी आशना थी। बाणासुर की पत्नी:----सम्राट बाणासुर की पत्नी अनौप्पया थी। बाणासुर की पुत्री:----बाणासुर की ऊषा नाम की पुत्री हुई है। बाणासुर का इतिहास:----पांच हजार वर्ष पूर्व, सम्राट बाणासुर भारतवर्ष के एकछत्र सम्राट थे, जिन की, कई राजधानियां थी, ज...

भारतवर्ष की सुपर संविधान सभा।।

       ।।भारतवर्ष की सुपर विधानसभा।। भारतवर्ष की स्वतन्त्रता से पूर्व, सन 1946 में संविधान तैयार करने के लिए 389 सदस्यों की कमेटी का चुनाब किया गया था। जिस में से भी एक सुपर कमेटी बनाई गई। इस सुपर कमेटी के अधीन एक ड्रॉफ्टिंग कमेटी भी बनाई गई। इस प्रारूप कमेटी का काम केवल, सुपर कमेटी के फाईनल किये गए संविधान को लिखने का काम करना था, जिस के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव अंबेडकर मनोनीत किये गए थे, जिन के साथ सात सदस्य और नियुक्त किए गए थे, मगर सातों में से भी केवल डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने ही संविधान का ड्राफ्ट तैयार किया था। सुपर कमेटी के सुपर अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद मनोनीत किये गए थे, उन के साथ निम्नलिखित सदस्य थे:--- 1 डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष। 2 जवाहरलाल नेहरू। 3 सरदार बल्लभ भाई पटेल। 4 गोविंद बल्लभ पंत। 5 सरोजनी नायडू। 6 सी राजगोपालाचारी। 7 शरद चन्द्र बोस। 8 डॉक्टर सचिदानंद सिन्हा। 9 जी सी मावलंकर। 10 ए कृषणा स्वामी अय्यर। 11 डी पट्टाभि सितारामय्या । 12 एच सी मुखर्जी। 13 ए वी ठक्कर। 14 गोपीनाथ बारदोलोई। 15 बी एल मित्र। 16 सैय्यद मोहम्मद सादुल्लाह। 17 बी एन राव।...