क्रांतिवीर सतगुरु कबीर साहिब।।

।।क्रांतिवीर सतगुरू कबीर साहिब।। जब धरती पर, अत्याचार अधिक बढ़ जाते हैं तब आदपुरुष किसी महाशक्तिमान को अपना आशीर्वाद देकर, धरती पर अवतरित करते आए हैं। इसीलिए चौहदवीं शताब्दी के आरंभ में, सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी हुए, उन की सहायता के लिए, सतगुरू क्रांतिवीर कबीर भी अवतरित हुए थे, जिन का जन्म संम्मत 1455 की ज्येष्ठ पूरिणमा को कांशी के लहरतारा में हुआ था और संम्मत 1575 की माघ शुक्ल एकादशी को मगहर में मोक्ष प्राप्त हुआ था। इन की माता जी नीमा और पिता जी नीरू थे। इन से पूर्व ही संम्मत 1433 को सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज का प्रकाश हो चुका था, जिन्होंने ब्राह्मणवाद के अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ जंग शुरू कर रखी थी। जिस रास्ते पर, वे चल रहे थे उसी विकट रास्ते पर सतगुरु कबीर साहिब भी चल पड़े, जिस से वे एक एक मिल कर दो ग्यारह हो गए, तीसरे नामदेव जी भी उन से मिल गए। चौथे गुरु नानकदेव जी, पांचवें सेन भी उन की सेना में शामिल हो गए। इस समय मॉनवता खतरे मेँ पड़ी हुई थी, कत्लेआम जोरों पर चल रहा था, भोलीभाली जनता को लूट कर खाने वाले शासक, मुस्लिम तलबार के भय से, मुंह बंद कर के अपनी जान बचा कर, मुस्लिम बादशाहों को अपनी बेटियां नजराने में भेंट कर के अपनी जिंदगी की भीख मांग रहे थे, केवल कुछ ही राजा, जिन में भारत के मूलनिवासी शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, महाराजा रणजीत सिंह आदि ही मुस्लिम खूनी तलवारों का सामना कर रहे थे, बाकी सभी शेखी बघारने वाले शेर कायरता की गुफाओं में घुस गए थे। जनता मुसलमानों की हवस पूरी करने के लिए, निहत्थी छोड़ दी थी। भारत को लूटने के लिए खुली छूट मुस्लिम बादशाहों को देदी थी। ऐसे में जनता की सुरक्षा की पूर्ण जिम्मेदारी भगवान रविदास जी महाराज ने, अपने कंधों पर लेली थी, जिस के जनरल हुए थे, सतगुरू कबीर साहिब। क्रांतिकारी कबीर:--- जब मानवता का कलंक काफर सिकन्दर लोदी ब्राह्मणों से मिल कर, मूलनिवासी भारतीयों का जबरन इस्लामीकरण कर रहा था, प्रतिदिन वह तलबार के बल पर मूलभारतीयों की सुनन्त करता जा रहा था, जिन की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं बचा था, तब जनता की रक्षा की बागडोर सतगुरु रविदास जी महाराज ने ले ली थी, जिन का पूर्ण साथ दिया था सतगुरू कबीर साहिब ने। ऐसे क्रूशियल समय के दौर में, सभी ब्राह्मण अपनी जनसंख्या बचाने में लगे हुए थे, मूलभारतीयों को मरने के लिए, मुस्लिमों के पास छोड़ रखा था। सन्तों ने भी बीमारी जी जड़ को पकड़ कर, उसी का ही ट्रीटमैंट शुरू किया, इसीलिए कबीर साहिब ने कहा कि, जातिपाति पूछे नाहिं कोय, हरि को भेजे सो हरि का होय। इस दोहे से ब्राह्मणों के किले में, आग जल उठी, क्योंकि ब्राह्मण जाति व्यवस्था के कारण ही तो निठल्ले बन कर तीनों वर्णों को मूर्ख बना कर, भगवान का अवतार बना हुआ था। उधर मुसलमान मुल्ले मौलवी भी, ब्राह्मणों से कहाँ कम थे, क्योंकि वे भी यूरेशियन ही थे और ब्राह्मण भी यूरेशियन ही थे, जिन की मिलीभगत हो गई थी, जिस से भाई, भाई मिल कर, भारत के मूलनिवासी लोगों का खून पीते जा रहे थे, जिस का प्रतिरोध सतगुरू कबीर साहिब अपनी तलवार रूपी लेखनी से करते हुए फरमाते हैं:--- कबीरा खड़ा बाजार में, लिए मुराडा हाथ। जो घर जारे अपना, चले हमारे साथ। सतगुरू कबीर साहिब, क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने वालों को कहते हैं कि, हम खूनी जंग के मैदान में खड़े हैं, जो हमारे साथ मर मिटने के लिए तैयार हैं वही हमारे साथ चलें। वास्तव में ही, वे ब्राह्मणों की खूनी जंग में, पाँव रख चुके थे, इसीलिए अपने संगी साथियों को भी चेतावनी देते हुए कहते हैं कि, हमारे साथ वही चले, जो मर मिटने के लिए हर समय तैयार हैं। कंकर पत्थर जोड़ी के मंदिर मस्जिद लये बनाय। तां चढ़ बांग दे मुल्ला क्या बहरा हुआ खुदाय।। कबीर साहिब ने एक तीर से दो निशाने कर के हिन्दू मुसलमानों को बुरी तरह जख्मी कर दिया था, अपनी खूनी क्रान्ति से, दोनों ही सगे भाईयों को खून से लथपथ कर दिया। वे यहीं तक ही नही रुके उन्होंने फिर कहा:--- जे तूँ बाहमण बाहमनी जाया और बाट बाहर क्यों नहीं आया। जे तूँ तुर्क तुरकनी जाया खतना भीतर क्यों ना कराया। जे पत्थर पूजे हरि मिले, तां मैं पूजूँ पहाड़। तां ते घर की चक्की भली पीसा खाय संसार। पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडत भया ना कोय, ढाई आखर प्रेम के पढ़े, सोऊ पंडत होय। बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को छाया ना मिले फल लगे अति दूर। हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहिमाना। आपस में दोऊ लरी लरी मरे मर्म ना कोऊ जाना कबीर साहिब ने, अपनी वाणी से, ब्राह्मणों के धार्मिक एकाधिकार को चुनोती देकर, परेशान कर दिया था, जिस से आहत हो कर ब्राह्मणों ने, तत्कालीन राजाओं, बादशाहों के पास, अपनी देशभगति की मिशाल कायम करते हुए उन को फांसी पर चढ़ाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी मगर क्रांतिवीर कहाँ रुकने वाला था, उन्हें नदी में डुबाया गया, खूनी हाथी के चरणों में फेंका गया, जेलों में डाला गया मगर परमवीर कहाँ रुका वह तो क्रान्ति पथ पर आगे आगे अग्रसर होता ही गया। सिकन्दर लोदी भी हार कर बैठ गया, ब्राह्मणों की भी हेकड़ी रुक गई। जब सभी ब्राह्मण दांव पेंच लगा कर हार गए, तब वे कबीर साहिब के चरित्रहनन पर उतर आए और उन के खिलाफ प्रचार करने लगे कि, वे विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से अवतरित हुए हैं। अब हमें ये समझ नहीं आई कि, ब्राह्मणों को किस प्रकार पता चला कि कबीर साहिब को विधवा, फिर केवल विधवा ब्राह्मणी ने ही उन को जन्म दिया है? क्या विधवाएँ वच्चों को जन्म देते समय प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाती हैं, या कोई रैली करती हैं जिस में वे हजारों लाखों लोगों के सामने अवैध वच्चों को जन्म देती हैं, मगर होता तो यही आया है कि विधवा, कंवारी लड़की चोरी छुपे बच्चे को जन्म देकर ही कहीं फेंक देती हैं, ताकि वे जग हंसाई, बेइज्जती से बच सकें, मगर कबीर साहिब की मां को अपमानित कर के, ब्राह्मणी भी लिख कर, अपनी जाति को श्रेय भी लिया गया कि वे जन्मजात ब्राह्मण ही थे। ऐसी कथाएं घड़ कर, मूलनिवासी, आदवंशी महापुरुषों को कलंकित और अपमानित करना ही ब्राह्मणों की नियति रही है जो अब भी जारी है। कबीर साहिब जी की श्रेष्ठता का भी लाभ उठाने के लिए, ब्राह्मणो ने, कबीर साहिब के गुरु जी का भी ब्राह्मणीकरण किया है, कि उन के गुरु रामानंद हुए हैं, जो ब्राह्मण अछूतों की परछाईं से भी भ्रष्ट हो जाते थे, उन को कौन ब्राह्मण अपना शिष्य बना कर, अपनी कब्र खोद लेता। कबीर साहिब अपने गुरु के बारे में फरमाते हैं कि:--- मैं तो अपनी माँ की गोद में, क्या जानू मार्ग क्या होय, राह पूछो रविदास से, जिन गठड़ी लाये ढोये। इस कथन से, कबीर साहिब के गुरु की सच्ची कथा बयान हो जाती है, कि मेरे गुरु केवल गुरु रविदास जी ही हैं। कबीर साहिब दूसरे दोहे में ब्राह्मण गुरुओं की पोल खोलते हुए फरमाते हैं कि:--- कबीर बामनु गुरु है जगत का, भगतन का गुरु नाहीं, अरझि उरझि के पचि मूआ, चारहू वेदहु माहिं।। सतगुरू कबीर साहिब केवल क्रांतिकारी योद्धा ही नहीं थे, वे वहुत बड़े धार्मिक रहस्यवादी, भाषा के तानाशाह, चिंतक, फिलास्फर और महाज्ञानी भी थे, जिस की सत्यता का प्रमाण निम्नलिखित है:--- माली आवत देखी कै, कलियां करें पुकार। फूली फली चुनी लीं, काहली हमारी बार। कबीर जी फरमाते हैं कि, जो व्यक्ति परिपक्व हो चुके हैं, वे कहते हैं, कि हमें तो आदपुरुष ने बुला लिया है, बाकी युवाओं का कल नंबर आ रहा है, जिस के कारण, आदमी को आदमी बन कर ही जीवन गुजारना चाहिए, आपस में इंसान बन कर ही रहना चाहिए, कोई भी ऊँच नीच, वर्ण अवर्ण, छूत अछूत नहीं है। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। फरवरी 19,2021।

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