साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी और स्वामी ईशर दास।

।।साहिबे कलाम मंगूराम मुगोवाल और स्वामी ईशर दास।। सन 1929 ईस्बी को पंजाब के लुधियाना में सन्त सम्मेलन आयोजित किया गया। जिस में सर्वसम्मति से ये प्रस्ताव पारित किया गया कि, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ को, स्वामी ईशरदास जी महाराज ही तैयार करेंगे। स्वामी जी ने उपस्थित सँगत को, पूर्ण विश्वास दिलाते हुए कहा कि:--- दीर्घ शब्द में गुर की महिमा, लिखी ना जाए। जे गुर किरपा करनगे तो आप लैहन लिखाए। स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, आदपुरुष की महिमा के बारे में कहा, कि ,परम पिता परमेश्वर की महिमा को कोई भी माई का लाल लिख नहीं सकता है, यदि वे ये चाहेंगे तो स्वत ही अपनी भोली भाली निरीह सँगत के लिए, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ, लिखवा लेंगे। स्वामी जी ने, जब ये उत्तरदायित्व स्वीकार कर लिया, तब साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी निश्चिंत हो गए और, आशावान हो गए कि हम अपनी मंजिल को प्राप्त कर लेंगे। वास्तव में आदपुरुष ने, पहले ही मूलनिवासी आदिवासियों की स्वतंत्रता के साथ, स्वत: ही नींव बनाई हुई थी, जिस के लिये ही स्वामी ईशर दास जी महाराज, गद्दरी बाबा साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल और उन के साथी आदधर्मी हजारा राम पिपलांवाला, सन्त गुरदियाल दास जी महाराज चकसाधु पंजाब और डॉक्टर भीम राव अंबेडकर को नियुक्त कर दिया था, जिन्होंने मिल कर वहुजन समाज की लड़ाई लड़ी और ब्राह्मणवादियों की छद्म नीति का सामना करते हुए, मूलनिवासी अछूतों को अधिकार दिलाए थे। जिला ऊना तत्कालीन पंजाब का ही हिस्सा था, जिस के चार पांच किलोमीटर की दूरी पर ही ऐतिहासिक गांव कुठार खुर्द है, स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, इसी पवित्र धरती के ऊपर विराजमान हो कर सन 1929 में, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ साहिब की वाणी 29 वर्ष की आयु मे, लिखना शुरू की थी। स्वामी जी निरन्तर अपने काम में व्यस्त रह कर, वाणी की रचना करते गए। रात के एकांत में भी वे, आदि गुरुओं की विचारधारा के अनुरूप शब्द रचना करते ही गए। मातेश्वरी गुरदेई जी फरमाती थीं कि, जब उन के मन मष्तिष्क में भाव आते थे, तो वे तुरंत नींद त्याग कर, रात के अंधेरे में ही, कलम दवात को उठा कर, शब्द रचना करने में बैठ जाते थे। उन्होंने जगह जगह कलमें और दवातें रखी हुई थीं, जहां भी उन के मन में कोई गुरवाणी का भाव उत्पन्न हो जाता था, वहीं वे लिखना शुरू कर देते थे। साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी, स्वामी ईशर दास जी के ऐतिहासिक कार्य को जानने के लिए, निरन्तर उन के पास आते और ग्रँथ की प्रगति से संतुष्ट हो कर जाते थे। स्वामी जी का ये क्रम निरन्तर 1960 तक जारी रहा। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। 26 फरवरी, 2021।

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