महाऋषि वाल्मीक जी के चरित्र हनन की दंतकथाएं।।
।।महाऋषि वाल्मीकि जी के चरित्र हनन की दंतकथाएं।।
बड़े ही आश्चर्य की बात है कि, भारत के जितने भी मूलनिवासी महापुरुष हुए हैं, वे प्रारंभ में, या पिछले जन्म में, कोई ना कोई हीन कर्म करते रहे हैं, जब कि यूरेशियन ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही नहीं सभी ऋषि, मुनि भी अनैतिक कर्म, भ्रष्ट, झूठ छल, फरेब, दगाबाजी करने से पीछे नहीं रहे हैं मगर उन के ये अनैतिक, बुरे कार्य भी किसी ना किसी बहाने से छुपा कर, उन्हें पाक, पवित्र ही सिद्ध किया हुआ है। इसी लिखने की नीति के अनुसार महाऋषि वाल्मीकि को भी कंलकित किया हुआ है, स्कूली पाठ्यक्रमों में पढ़ा कर, वच्चों के दिलो में, वाल्मीकि जी के प्रति, कटु भावना पैदा की गई है। वे बचपन में चोर, डाकू लुटेरे थे, राहगीरी करते थे, खून, कत्लेआम कर के अपना और अपने परिवार का पेट भरते थे। उन के लिखे गए, साहित्य का लाभ उठाने के लिए, उन की दाद देने के लिए, उन का सम्मान करने के लिए, नई कथा और घड़ी गई है कि वे, नागा प्रजाति में जन्मे थे। वे प्रचेता वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि के भाई थे। इन को मनुवादी सिद्ध करने के लिए ये कथा घड़ी गई है, इन्हें कलंकित करने के लिए निसंतान भीलनी द्वारा बचपन मे ही इन्हें चुराने की कथा घड़ी गई है। भीलनी की आय का मुख्य स्रोत दस्यु कर्म था। भीलनी बुरे कर्म और लूटपाट की कमाई कर के रत्नाकर को खिलाती थी। भीलनी का ही व्यवसाय रत्नाकर से अपना लिया और वह भी भीलनी से भी बढ़ कर, घोर पाप कर्म, खून खराबा करने लगा था। सरेआम कत्लेआम करने लगा।
जब रत्नाकर युवा हो गए तो, किसी भील ने चोर रत्नाकर को अपनी भीलनी बेटी दे दी। उन का विवाह एक भीलनी से हो गया। विवाह के बाद वाल्मीकि के कई बच्चे हो गए। जिन के पेट भरने के लिए वह और अधिक नरसंहार करने लगा। एक दिन जब वह राहगीरी के लिए, रास्ते पर बैठा था, तब उस ने, रास्ते में से गुजरते हुए, साधुओं की मंडली को, उन की हत्या करने की धमकी दे दी। एक नारद नामक साधु ने जब उस से पूछा कि आप, ये पाप कर्म क्यों करते हो ? तब रत्नाकर ने, कहा कि ये मैं अपनी पत्नी वाल वच्चों के पालन पोषण के लिए करता हूँ। तब साधु नारद ने कहा कि, जो पाप कर्म तुम कर रहे हो, उस का दण्ड तो तुझे ही मिलेगा, अकेले तुझे ही भुगतना पड़ेगा। नारद साधु ने रत्नाकर को कहा, जाओ घर में जा कर, परिवार से पूछो कि, जो पाप कर्म, जो कत्लेआम, जो ठगी मैं करता हूँ, उस के हिस्सेदार तुम भी बनोगे या नहीं। रत्नाकर ने कहा आप तो भाग जाएंगे। तब नारद ने कहा, कि आप हमें यहाँ पेड़ से बॉन्ध दो ताकि हम जा ही ना सकें। रत्नाकर ने ऐसा ही किया और घर चला गया। घर जा कर सभी परिवार के सदषयों को पूछा, कि क्या मेरे गुनाहों को आप भी बांट लोगे या नहीं। परिवार के सभी लोगों ने पाप कर्म के भागीदार बनने से इंकार कर दिया। पत्नी ने रत्नाकर को फटकार लगाई, जिस से उस की आंखें खुल गईं और आ कर, रत्नाकर ने साधु मंडली से क्षमायाचना करते हुए, मुक्ति का मार्ग पूछा। नारद ने कहा, तूं राम राम जपने का काम करो, पापी रत्नाकर राम राम तो जप नहीं सका और बारह साल तक मरा मरा जपता रहा। तमसा नदी के किनारे पर, एक ही जगह बैठा रहा, जिस के कारण उस के शरीर पर बांमी चढ़ गया। बारह वर्षों के बाद राम ने दर्शन दिए और उस की दिव्य दृष्टि खुल गई, जिस के कारण उसे वाल्मीकि कहा जाने लगा और राम के जन्म के दस हजार वर्ष पूर्व ही, वाल्मीक जी ने रामायण लिख डाली। अब इस पाप कर्म की कथा की भी तर्कसंगत चीरफाड़ की जाए तो अनुभव होता है, कि इस कि सच्चाई क्या है:----
सत्पुरुष प्रचेता की संतान को चुरा कर, भीलनी ले गई और वहां वह चोर बन गया, ये चोर बनने की कथा किसी के गले मे नहीं उतरती है, कि क्या उस समय दिव्य दृष्टि वाले प्रचेता की संतान को कोई क्या चुरा सकता था।
क्या उस समय इतनी अंधेरगर्दी मची हुई थी कि, कोई भी किसी के वच्चों को चुरा कर घर मे रख लेता था, जिस की चोरी का किसी को पता तक नहीं चलता था।
क्या भील लोग उस समय थे, जब कि ये जाति विभाजन आज से पांच हजार वर्ष पूर्व आए यूरेशियन लोगों ने करना शुरू किया था, फिर भीलनी कहां से आ गई।
क्या भीलनी सारी आयु पर्यन्त चोरी करती हुई लोगों ने सहन कर ली थी ?
क्या उस डाकू औरत को किसी ने मौत के घाट नहीं उतारा था?
क्या रत्नाकर को खून खराबे की पूर्ण छूट मिल चुकी थी, कि वह जिस किसी आदमी का खून खराबा, कत्लेआम करना चाहे कर सकता था?
क्या नारद ही सारी धरती पर विचरण करता था, जब देखो नारद ही नारद धरती, आकाश पाताल की सी आई डी करता फिरता है, वही सभी की चुगली, झगड़े कराता फिरता है।
क्या अछूत प्रचेता के युग में भी थे, जो पाप कर्म कर के ही परिवार का भरण पोषण करते थे ?
जब भीलनी का परिवार ही चोरों का था, तो वे पाप कर्म को बांटने के लिए क्यों तैयार नहीं हुए।
क्या ये कथा किसी के गले उतरती है, कि इतने साधु, रत्नाकर के आने तक, पेड़ से बंधे रहे, जब कि फिल्मों के कलाकार खलनायक के बांधने पर भी छूटते हुए दिखाए जाते हैं।
क्या कोई बारह सालों तक नँगा भूखा रह कर जिंदा रह सकता है?
क्या बारह वर्षों तक, किसी के शरीर पर चढ़ी हुई दीमक सहन की जा सकती है?
क्या सारे भारत में दीमक के घरों को बांमी ही कहा जाता था, जिस के कारण वाल्मीकि शब्द बन गया होगा।
इन सारे प्रश्नों के उत्तर यही स्पष्ट करते हैं कि ये कथा बड़ी चतुराई से घड़ी गई है ताकि आदवंशी मूलनिवासी महापुरुष को अपमानित किया जा सके। अगर वाल्मीकि प्रचेता की ही सन्तान थी तो उस की शोभायात्रा में, जाट ब्राह्मण, वाणियाँ और राजपूत तो क्या दूसरी जातियां भी शामिल क्यों नहीं होतीं हैं। क्यों ये लोग वाल्मीकि मन्दिरों में जा कर मत्था नहीं टेकते हैं?
क्यों उन के पूजारियों के हाथों से प्रसाद ले कर नहीं खाते हैं?
क्यों चमार बाबा सिद्धचानो जी महाराज के पास ही मनुवादी मत्था रगड़ते हैं। ये सारे के सारे प्रश्न यही सावित करते हैं कि वाल्मीक जी आदवंशी, मूलनिवासी थे, जिन की विद्वता मनुवादियों से देखी नहीं गई थी और उन का साहित्य हथियाने के लिए, उन्हें मनुवादी भी सिद्ध किया गया और उस का पूर्ण लाभ भी उठाया गया है, जो ब्राह्मण और मनुवादियों की नीति रही है। मूलनिवासियों को मनुवादी लेखकों की तर्कहीन कथाओं पर विश्वास नहीं करना चाहिए और मनोवैज्ञानिक ढंग से सोच विचार कर के ही, सत्य को परख कर विश्वास करना चाहिए।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 18, 2021।
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