साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल की भूमि अराजी एक्ट के खिलाफ जंग।।
।।साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल की भूमि अराजी एक्ट के खिलाफ जंग।।
जब साहिबे कलाम मंगू राम जी मुगोवाल, डेथ वारण्ट के समाप्त होने पर भारत पहुँचे और घर आ कर, जीवन बिताने लगे तब उन्हें यूरोप और भारत के मनुवाद के शासन का अंतर ज्ञात हुआ था। गद्दरी बाबा भले ही विदेशों की जेलों में मौत का इंतजार करते रहे हों, तोप के सामने उड़ाए जाने का इंतजार करते रहे हों, भले ही जंगली वनवासी लोगों के साथ जीवन जीते रहे हों, मगर वहां जेलों में कोई भी किसी भी प्रकार की दुर्गंध नहीं हुआ करती थी, कोई भी गुलामी नहीं हुआ करती थी, कोई भी किसी के मौलिक अधिकारों को जबरन छीन नहीं सकता था, मगर भारत में आ कर पशुओं के चमड़े की दुर्गंध के बीच ही रहना, सोना, खाना, पीना और जीना पड़ रहा था, अस्सी प्रतिशत मूलनिवासी, मूलभारतीयों को भूमिहीन होने के कारण मनुवादियों की जमीन में शरणार्थी बन कर रहना पड़ रहा था। ऐसी ही दशा में, यूरोप के खुले वातावरण के बीच जीवन व्यतीत कर के, आने वाले साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल जी को, अपने ही पैतृक गांव मुगोवाल में रहना पड़ रहा था, सारे गांव में चमड़े का कारोबार हो रहा था, जिस के कारण दुर्गंध में रहना, उन के लिए बड़ी मुशीबत बन गया था, जिस से दुखी हो कर वे अपने गांव से कहीं दूर जा कर शीशम के घने पेड़ों के नीचे समय बिताते थे।
एक दिन जीवन का नया मोड़ आया। अचानक उन के परिवार की औरतें रोती चिल्लाती हुई घर आईं और कहने लगी कि, जाट ने हमारी दात्रीयां छीन कर हमारा घास भी छीन लिया और अपने घर ले गया। गद्दरी बाबा बाबू मंगू राम जी को ये सुन कर वहुत क्रोध आया और जाट के घर चले गए और जा कर जाट को पूछा, आप ने हमारी औरतों का घास क्यों छीन लिया? जाट ने कहा, जब जमीन ही हमारी है, तो घास भी हमारा ही है। ये सुन कर बाबू मंगू राम जी पटवारी के पास चले गए और पटवारी से पूछा, पटवारी साहब हम अछूत लोग, जमीन किस प्रकार खरीद सकते हैं? पटवारी ने बताया कि आप लोग सन 1911 के भूमि अराजी एक्ट के अनुसार जमीन नहीं खरीद सकते हैं। बाबू मंगू राम ये सुन कर होशियार पुर चले गए और वहां एक वकील से पूछा, वकील साहब, हम अछूत जमीन किस प्रकार खरीद सकते हैं? वकील ने बताया कि, आप अपनी जाति, धर्म बदल लें तभी आप लोग जमीन और जयदाद खरीद सकते हैं।
वकील की दलील सुन कर, बाबू मंगू राम ने सन 1924 से जून 1926 तक सारे भारत देश का भ्रमण कर के 11 और 12 जून सन 1926 को अखिल भारतीय मूलनिवासी, मूलभारतीयों का अपने ही गांव मुगोवाल में एक सम्मेलन बुलाया था, जिस में हजारों अछूतों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। इसी ऐतिहासिक सम्मेलन में, ये प्रस्ताव पारित किए कि, आज से हमारा धर्म "आदधर्म होगा", जिस की पुनः स्थापना के लिए पंजाब आदधर्म मंडल की घोषणा की गई। सभी राष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि, आज से हम मूलनिवासी अछूत आदिधर्मी कहलाएंगे। हमारा हिंदुओं के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होगा। इस सम्मेलन की सफलता से, उस समय सारा मनुवाद कांप उठा था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी22, 2021।
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