प्रोफेसर सरदार दित्त सिंहजी।

।। प्रोफेसर सरदार ज्ञानी दित्त सिंह जी। अनादिकाल से ही, अगर साहित्य के इतिहास पर नजर डाली जाए तो, भारत भूमि पर, केवल मूलनिवासी, आदिवासी ही महापुरुष अवतरित हुए हैं, जिन्हों ने साहित्य के क्षेत्र में नाम कमाया है। चाहे वेदों, पुराणों के रचयिता वेद व्यास को ही देख लो, चाहे रामायण के लेखक वाल्मीकि जी को देख लो, चाहे वर्तमान स्वतंत्र भारत के संविधान लेखक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को देख लो, चाहे गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के लेखक स्वामी ईशरदास जी महाराज को देख लो, चाहे क्रान्ति के महानायक गुरु रविदास जी महाराज और वर्तमान क्रांतिवीर साहिब कांशीराम जी को देख लो, जिन के सिद्धांत सारे विश्व में फैले हुए है। विदेशी बुद्धिजीवियों, स्कॉलरों ने भी, इन के ज्ञान और सिद्धांतों का अनुशीलन कर के, ऐसे अविष्कार किये हैं, जिन से मॉनव जीवन, सरल, सुखमय हुआ है। वर्तमान में ही दृष्टिपात किया जाए तो, गुरु रविदास जी महाराज ने भी कहा था:--- ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सभन को अन्न। छोट बड़ सभ सम वसै तां रविदास रहे प्रसन्न।यही पंक्तियां कार्ल मार्क्स के, समाजवाद की नींव बन गई और कई देशों में, समाजवाद आ भी गया था। इसी तरह पंजाब की धरती पर, प्रोफेसर ज्ञानी दित्त सिंह ही हुए जिन्होंने, सिख धर्म की डूबती नैया को बचाया था। जब कुछ सिख नेता रास्ता भटक गए और पंजाब में हिंदुइज्म के लिए, सब कुछ छोड़ने के लिए ततपर हो गए थे, तब दित्त सिंह जी ने, खालसा पेपर के माध्यम से, सिखी में प्राण फूंके थे। गुरु ग्रँथ साहिब की पहली बार व्याख्या कर के, जन जन तक पहुँचाने वाले तो केवल और केवल प्रोफेसर ज्ञानी दित्त सिंह ही थे, जिन्होंने गुरुओं की वाणी को, पुनः सुरजीत किया था। प्रोफेसर ज्ञानी दित्त सिंह जी, मूलनिवासी समाज के रत्न थे, वे कविराज थे, सर्वांगमुखी लेखक थे, पंजाबी पत्रकारिता के पितामह, भाषण कला के उघे श्रृंगार, शास्रार्थ और अखाड़ों के विजेता, निर्भय व्याख्याकार, सामाजिक बुराइयों के श्रेष्ठ समाज सुधारक, पवित्र पावन गुरु ग्रँथ साहिब के व्याख्याकार, इतिहासकार थे। सिंह सभा के जनक भी थे, जिस के माध्यम से, सिख धर्म को पुनः अपने मूल स्वरूप में समझने, पहचानने और जानने के लिए सजीव किया था। प्रोफेसर दित्त सिंह जी के जीवन का सार ज्ञानी गुर दित्त सिंह ने, अपनी लिखी पुस्तक  "ज्ञानी दित्त सिंह जीवन अते रचना" में किया है। प्रोफेसर दित्त सिंह जी का जन्म इकीस अप्रैल सन 1852 को, उन के नानके के गाँव नंदपुर  कलौड़ जो पटियाला रियासत के अंतर्गत आता था, हुआ था। इन के पिता जी का नाम दिवान सिंह और माता जी का नाम विशन कौर था। इन के पिता जी भी ज्ञानी साधु ही थे, जिन्होंने दित्त सिंह जी को स्वयं प्रारंभिक शिक्षा दी थी, उस के  बाद अंबाला जिले के साधुओं, सन्तों के आश्रय में रह कर भी शिक्षा हासिल की थी। तत्कालीन सुप्रसिद्ध विद्वान गुरबख्श सिंह से भी विद्या प्राप्त कर के, उन के आस पास के लोग, इस छोटे से बालक दित्त सिंह साधु की पूजा करने लग पड़े थे, जिस के बारे में, गुलाब दासियों के भाई दित्त सिंह के विरुद्ध निकाले गए इश्तिहार से ज्ञात होता है। वे आप के सिखी धारण करने के कारण वहुत दुखी हुए थे। कुछ समय प्रोफेसर दित्त सिंह जी लाहौर के पास गांव चठियाँ वाले गुलाब दासियाँ के डेरे में रुके जहां उन्होंने खूब शिक्षा अर्जित की। इसी कारण उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ज्ञानी की उपाधि हासिल की। ये उपाधि प्राप्त कर के ओरिएंटल कालेज लाहौर में पंजाबी के पहले अध्यापक नियुक्त हुए। यहाँ पर दित्त सिंह जी ने, अनेकों समाज सेवक तैयार किये, जिन में योगी विश्वनाथ और भाई तख्त सिंह फिरोजपुर प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम वर्णन योग्य हैं। पहली बार यही इन का साक्षात्कार प्रोफेसर गुरमुख सिंह जी के साथ हुआ था, जिन के सहयोग और प्रेरणा के साथ ही ये अमृतधारी सिख सुशोभित हुए और सिख धर्म की सेवा के क्षेत्र में, अपनी बल, बुद्धि और ज्ञान के कारण मैदान में आ गए थे। अपनी विद्वता और योग्यता की पैनी धार से, स्वामी दयानंद को, तीन चार बार शास्त्रार्थ में, बुरी तरह हरा कर, ये चारों ओर चर्चा के केंद्र बन चुके थे। सौभाग्य की बात तो ये थी कि, आप की विद्वता और योग्यता ने, सिखी की मुरझा रही वेल को पुनः सजीव किया और अधिक से अधिक लाभ सिख धर्म को इन्होंने ही दिलाया। सिखी में नई आत्मा, नई जागृति पैदा करने वाले प्रोफेसर दित्त सिंह ही हुए। सिखी को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए, इन्होंने अपनी लेखनी, अपने कार्यों से भरपूर सेवा की। आप ने सिख धर्म को उन्नति के शिखर पर ले जाने के लिए तीस पुस्तकें लिखीं। गुरु ग्रँथ साहिब को, आम सँगत को समझाने के लिए, इन्होंने ही सरल भाषा मे टिका लिख कर इतिहास बनाया था, जिस काम को कोई भी विद्वान, उन से पूर्व नहीं कर सका था। बड़े दुख की बात है कि, वर्ण और जातीय वैषम्य के कारण, विश्वविद्यालय और अन्य क्षेत्रों में ऐसे वहुत कम लोग ही प्रोफेसर दित्त सिंह जी के बारे में जानते हैं, जिस ने सिखी को नया जीवन दिया नई सोच, नई शोध, नई दिशा, नया निखार,  ला कर, सिख समाज को सीधे रास्ते पर चलाया था पंजाब में जितनी भी लहरें चलीं, उन के पीछे प्रोफेसर दित्त सिंह जी का ही हाथ है मगर फिर भी उन के बारे में, सिखों ने, कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया जिस से, उन का नाम जीवन्त रह सके। अगर प्रोफेसर दित्त सिंह जी कहीं मनुवादी होते, तो उन्हें मनुवाद का पैगंबर तक घोषित कर दिया गया होता। रामसिंह आदवंशी। अध्यक्ष। विश्व आदधर्म मंडल। फरवरी 17, 2021।

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