रावण राक्षस के भाई अहिरावण का नाम कल्पित।

।। रावण राक्षस के भाई अहिरावण का नाम कल्पित।।

भारतवर्ष में, रावणों की भरमार रही है, वीर महायोद्धा रावण के समय में दूसरा शौर्यवान बलशाली योद्धा भी राक्षस ही था, जिस का नाम रावण के तुल्य ही था मगर, था उसी की तरह अहिरावण। अहिरावण भी एक विचित्र राक्षस था, अहिरावण पाताल में स्थित रावण का मित्र था, जिस ने युद्ध के दौरान रावण के कहने से आकाश मार्ग से उतर कर राम के शिविर में सारे संसार के मालिक राम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था। राम रावण को कामाक्षी देवी के मंदिर में, बलि देने के लिए ले गए थे, जहां से बचा कर हनुमान ही उन्हें लाए थे। ये कथा भी एक मनुवादी लेखक ने ही लिखी हुईं है जिस का अध्ययन करना जरूरी है।

दन्त के कथानुसार, जब अहिरावण राम और लक्ष्मण को कामाक्षी देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए, ले गया तो वहां पर वह विभीषण का भेष धारण कर, राम के शिविर में घुसकर अपनी माया के बल पर, राम को नीचे पाताल लोक में ले आया था, तब राम और लक्ष्मण दोनों को ही मुक्त कराने के लिए, वीर पवन पुत्र हनुमान भी पाताल लोक पहुंच गए थे और वहां उनकी भेंट अपने ही पुत्र मकरध्वज से हुई, जिस के कारण उस को पुत्र मकरध्वज के साथ लड़ाई लड़नी पड़ी, क्योंकि पुत्र मकरध्वज भी अहिरावण का द्वारपाल था। मकरध्वज ने कहा- अहिरावण का अंत करना है, तो इन पांच दीपकों को एक साथ एक ही समय में बुझाना होगा। यह रहस्य ज्ञात होते ही हनुमान ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इन पांच मुखों को धारण कर के उन्हों ने एक साथ सारे दीपकों को बुझा दिया और अहिरावण का अंत कर दिया था। हनुमान ने, राम लक्ष्मण को मुक्त करवाया था।।

1कितनी बिडंबना है कि, एक राक्षस ही भगवान और उस के भाई को बंधन में बॉन्ध कर पाताल लोक में ले गया, जिस का कहीं किसी को पता है ही नहीं चला था, कि वह कहां है ?

2 राम और लक्ष्मण दोनों ही भगवानों को एक मूलनिवासी अहिरावण राक्षस से मुक्त कराने के लिए, मूलनिवासी हनुमान को ही कठिन काम करना पड़ा।

3 ब्राह्मण लेखकों की फितरत रही है कि, वाप बेटे को लड़ाओ और कांटे से कांटा निकालो, ऐसा ही करने के लिए, मकरध्वज और उस के पिता हनुमान की कथा घड़ी गई है जिस में बेटा ही अपने आका मेघनाद को मारने का छद्म कर के लिए, हनुमान को पांच दीपकों को बुझाने के लिए कहता है, जिस काम के लिए हनुमान को पांच मुंह बनाने पड़े थे, जो तर्क की बात नहीं है।

4 हनुमान का पुत्र मकरध्वज, अहिरावण का पैहरेदार था, वह कभी भी अपने आका को मारने नहीं देता मगर कथा ही मनघड़ंत है।

अब इन कथनों से स्पष्ट होता है,कि हनुमान का अपने मूलनिवासी समाज के विरुद्ध कार्य करता था, जिस कृतघ्नता के कारण, उस का अपने पुत्र मकरध्वज पर कोई कंट्रोल नहीं था, तभी तो वह अहिरावण के पास सैनिक के रूप में भर्ती हुआ था जो और पहरेदार का काम करता था। राम और लक्ष्मण की कोई औकात नहीं थी कि वे अहिरावण का मुकाबला कर सकें। सम्राट सिद्धचानो की पत्नी कामाक्षी देवी के ही उस समय मन्दिर थे, जिन में मूलनिवासी और ब्राह्मण पूजा अर्चना करते थे।

कितनी तर्कहीन, अर्थहीन, बेपेंदी कथा घड़ी गई है कि भगवान को ही राक्षस पाताल ले जा कर, परेशान करता है।

अगर मूलनिवासी शासकों के नामों के नामकरण पर भी चर्चा की जाए तो, पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है कि, ब्राह्मण लेखकों ने, मूलनिवासी महापुरुषों के नाम भी उन के कल्पित चरित्र के अनुसार ही घड़े हुए हैं। कोई और नाम भी तत्कालीन लिखने वाले लेखकों को नहीं मिला तो पुनरावृत्ति कर के राजा रावण के भाई के लिए, राक्षस रावण के साथ अहि जोड़ कर, अहिरावण राक्षस घड़ा गया जो कल्पित कथा लगती है। मूलनिवासी शासकों को वीर, योद्धा, पराक्रमी, शक्तिशाली, अजेय ही लिखा गया है मगर वे सभी उनसे कहीं कम आयु के कृष्ण जैसे वच्चों के द्वारा, पराजित दिखाए गए हैं, जो ब्राह्मणों की कल्पित इतिहास लिखने की प्रवृत्ति रही है, जिन्हें मूलनिवासी भी सच मानते रहे और पराक्रमी पूर्वजों को खुद ही अपमानित करते आए हैं, जिस घोर षडयंत्र को समझ कर, मूलनिवासी लेखकों को नए इतिहास की रचना करनी पड़ेगी।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।।। रावण राक्षस के भाई अहिरावण नाम कल्पित।।

भारतवर्ष में, रावणों की भरमार रही है, वीर महायोद्धा रावण के समय में दूसरा शौर्यवान बलशाली योद्धा भी राक्षस ही था, जिस का नाम रावण के तुल्य ही था मगर, था उसी की तरह अहिरावण। अहिरावण भी एक विचित्र राक्षस था, अहिरावण पाताल में स्थित रावण का मित्र था, जिस ने युद्ध के दौरान रावण के कहने से आकाश मार्ग से उतर कर राम के शिविर में सारे संसार के मालिक राम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था। राम रावण को कामाक्षी देवी के मंदिर में, बलि देने के लिए ले गए थे, जहां से बचा कर हनुमान ही उन्हें लाए थे। ये कथा भी एक मनुवादी लेखक ने ही लिखी हुईं है जिस का अध्ययन करना जरूरी है।

दन्त के कथानुसार, जब अहिरावण राम और लक्ष्मण को कामाक्षी देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए, ले गया तो वहां पर वह विभीषण का भेष धारण कर, राम के शिविर में घुसकर अपनी माया के बल पर, राम को नीचे पाताल लोक में ले आया था, तब राम और लक्ष्मण दोनों को ही मुक्त कराने के लिए, वीर पवन पुत्र हनुमान भी पाताल लोक पहुंच गए थे और वहां उनकी भेंट अपने ही पुत्र मकरध्वज से हुई, जिस के कारण उस को पुत्र मकरध्वज के साथ लड़ाई लड़नी पड़ी, क्योंकि पुत्र मकरध्वज भी अहिरावण का द्वारपाल था। मकरध्वज ने कहा- अहिरावण का अंत करना है, तो इन पांच दीपकों को एक साथ एक ही समय में बुझाना होगा। यह रहस्य ज्ञात होते ही हनुमान ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इन पांच मुखों को धारण कर के उन्हों ने एक साथ सारे दीपकों को बुझा दिया और अहिरावण का अंत कर दिया था। हनुमान ने, राम लक्ष्मण को मुक्त करवाया था।।

1कितनी बिडंबना है कि, एक राक्षस ही भगवान और उस के भाई को बंधन में बॉन्ध कर पाताल लोक में ले गया, जिस का कहीं किसी को पता है ही नहीं चला था, कि वह कहां है ?

2 राम और लक्ष्मण दोनों ही भगवानों को एक मूलनिवासी अहिरावण राक्षस से मुक्त कराने के लिए, मूलनिवासी हनुमान को ही कठिन काम करना पड़ा।

3 ब्राह्मण लेखकों की फितरत रही है कि, वाप बेटे को लड़ाओ और कांटे से कांटा निकालो, ऐसा ही करने के लिए, मकरध्वज और उस के पिता हनुमान की कथा घड़ी गई है जिस में बेटा ही अपने आका मेघनाद को मारने का छद्म कर के लिए, हनुमान को पांच दीपकों को बुझाने के लिए कहता है, जिस काम के लिए हनुमान को पांच मुंह बनाने पड़े थे, जो तर्क की बात नहीं है।

4 हनुमान का पुत्र मकरध्वज, अहिरावण का पैहरेदार था, वह कभी भी अपने आका को मारने नहीं देता मगर कथा ही मनघड़ंत है।

अब इन कथनों से स्पष्ट होता है,कि हनुमान का अपने मूलनिवासी समाज के विरुद्ध कार्य करता था, जिस कृतघ्नता के कारण, उस का अपने पुत्र मकरध्वज पर कोई कंट्रोल नहीं था, तभी तो वह अहिरावण के पास सैनिक के रूप में भर्ती हुआ था जो और पहरेदार का काम करता था। राम और लक्ष्मण की कोई औकात नहीं थी कि वे अहिरावण का मुकाबला कर सकें। सम्राट सिद्धचानो की पत्नी कामाक्षी देवी के ही उस समय मन्दिर थे, जिन में मूलनिवासी और ब्राह्मण पूजा अर्चना करते थे।

कितनी तर्कहीन, अर्थहीन, बेपेंदी कथा घड़ी गई है कि भगवान को ही राक्षस पाताल ले जा कर, परेशान करता है।

अगर मूलनिवासी शासकों के नामों के नामकरण पर भी चर्चा की जाए तो, पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है कि, ब्राह्मण लेखकों ने, मूलनिवासी महापुरुषों के नाम भी उन के कल्पित चरित्र के अनुसार ही घड़े हुए हैं। कोई और नाम भी तत्कालीन लिखने वाले लेखकों को नहीं मिला तो पुनरावृत्ति कर के राजा रावण के भाई के लिए, राक्षस रावण के साथ अहि जोड़ कर, अहिरावण राक्षस घड़ा गया जो कल्पित कथा लगती है। मूलनिवासी शासकों को वीर, योद्धा, पराक्रमी, शक्तिशाली, अजेय ही लिखा गया है मगर वे सभी उनसे कहीं कम आयु के कृष्ण जैसे वच्चों के द्वारा, पराजित दिखाए गए हैं, जो ब्राह्मणों की कल्पित इतिहास लिखने की प्रवृत्ति रही है, जिन्हें मूलनिवासी भी सच मानते रहे और पराक्रमी पूर्वजों को खुद ही अपमानित करते आए हैं, जिस घोर षडयंत्र को समझ कर, मूलनिवासी लेखकों को नए इतिहास की रचना करनी पड़ेगी।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।

फरवरी 09, 2021।

Comments

Popular posts from this blog

गुरु रविदास जी की क्रांतिकारी वाणी दोधारी है।

क्रांतिकारी शूरवीर गुरु रविदास जी महाराज।।

।।राम बिन संशय गाँठि न छूटे।।