महाऋषि शुक्राचार्य सपुत्र भृगु महाऋषि।।

।। महाऋषि शुक्राचार्य सपुत्र भृगु महाऋषि।।
जन्म:----शुक्राचार्य का जन्म पिता भृग ऋषि के घर माता दिव्या के गर्भ से हुआ था। महादेवी दिव्या, दानी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री थी। माता पिता ने, शुक्राचार्य का नाम उशना रखा था। कहा जाता है कि, वे एक आंख के अंधे थे। इन के भाई का नाम च्यवन था।
पत्नी:----शुक्राचार्य के पुत्र शंद और अमर्क थे।उन की बेटी का नाम देवयानी था जिसे बृहस्पति के पुत्र कच से प्यार हो गया था। दूसरी दन्तकथा के अनुसार, देवयानी का विवाह नहुष राज के पुत्र ययाति से हुआ था, जो बाद में राजा बन गया था। शुक्राचार्य ने इस विवाह की सहमति इस शर्त पर दे दी थी कि, ययाति दूसरी शादी नहीं करेगा मगर ययाति ने इस शर्त को ठुकरा कर, देवयानी की नौकरानी दासी शर्मिष्ठा पर मोहित हो कर उस से भी शादी कर ली थी, जिस से आहत हो कर शुक्राचार्य ने ययाति को शाप दे दिया कि, ययाति तुम तत्काल बूढ़े हो जाओगे। इससे ययाति ने कहा कि इस का प्रभाव तो देवयानी पर भी पड़ेगा तब फिर शुक्राचार्य ने कहा कि अगर कोई आप को अपनी जवानी दे देगा तब आप पुनः जवान हो जाओगे। जब ययाति ने अपने पांचों पुत्रों से जवानी मांगी तो चार पुत्रों ने जवानी देने के लिए मना कर दिया मगर चौथे ने अपनी जवानी दे दी जिससे ययाति जवान हो गया था। इसी कारण ययाति ने चारों पुत्रों को श्राप दे दिया था कि आप का वंश यदुवंश कहलाएगा मगर आप राजपाठ नहीं कर पाएंगे और चौथे पुत्र पुरू को रासजपाठ दे दिया जिस से, ये लोग पुरुवंश के शासक बने, ये कथा भी तर्कसंगत नहीं लगती है, कोई मनोवैज्ञानिक कथा अनुभव नही होती है, मगर मूलनिवासी शुक्राचार्य जी भी ब्राह्मणवाद के शिकार अवश्य लगते हैं।
शुक्राचार्य के गुरु:----शुक्राचार्य का गुरु, ब्रह्मा का पुत्र अंगीरस था। वे शिक्षा देते समय, अपने पुत्र बृहस्पति और शुक्राचार्य में भेदभाव करते थे, जिससे आहत होकर शुक्राचार्य ने, उन्हें त्याग दिया और असुरों का गुरु बन गया, जिस से आहत हो कर, शुक्राचार्य ने अपने गुरु को त्याग दिया और देवताओं की तवाही के लिए, असुरों के गुरु बन गए थे, जब कि उन से कम ज्ञानी, बुद्धिहीन बृहस्पति देवताओं का गुरु बन गया। 
विवाह:----शुक्राचार्य का विवाह, जयंति और गो नामक लड़कियों से हुआ था।
राजा बलि के गुरु:---- शुक्राचार्य दैत्यराज बलि के गुरु थे। पुराणों में लिखा गया है कि, वे राजा बलि को, छली विष्णु ब्राह्मण के छल से रक्षा करने के लिए, एक पानी के जलपात्र की टोटी में छुप कर बैठ गए थे। जब राजा बलि ने, सींक को जल में डाल कर देखना चाहा कि, इस में क्या है ? जिस के कारण शुक्राचार्य की एक फूट गई थी, इसीलिये उन्हें एकाक्ष भी कहते हैं। शिव की आराधना करने से, शुक्राचार्य ने, शिवशंकर से संजीवनी विद्या प्राप्त कर ली थी, जिस से उस ने और उन की माता ने, अनेकों राक्षसों को जीवित कर दिया था, अनेकों बार ही देवताओं को जीत लिया था जिससे आहत हो कर यूरेशियन विष्णु ने शुक्राचार्य की माता की चक्र से हत्या कर दी थी। इसी कारण ऋषि भृगु ने यूरेशियन विष्णु को अभिशाप दे दिया था कि तुझे गर्भ में रह कर दण्ड भुगतना पड़ेगा इसीलिए आप का धरती पर बार बार जन्म होगा। महाऋषि शुक्राचार्य जी ने ब्राहस्पत्य शास्त्र की रचना की थी, जिस में एक हजार अध्याय हैं। 
उपरोक्त कथाएं भी अमनोवैज्ञानिक, तर्कहीन और सत्य से परे ही लगती हैं मगर यूरेशियन लेखकों की फ़ितरत ही रही है कि, मूलनिवासी महापुरुषों को, ऐसी ही छद्म कथाओं के द्वारा निम्न सिद्ध किया गया है।
शुक्राचार्य की विशेषताएं:----मत्स्य पुराण के अनुसार  शुक्राचार्य का वर्ण स्वेत था, सिर पर सुंदर मुकुट, गले में माला, स्वेत कमल फूल पर विराजमान, हाथ में रुद्राक्ष माला, हाथों में दण्ड, मुद्रा और भिक्षा पात्र सुशोभित होता है। 
1 आठ घोड़ों वाला वाहन रथ है, वे वृष तुला राशि के स्वामी हैं, जिन की बीस वर्ष की महा दशा होती है।
2 शुक्राचार्य रसों औषधियों मंत्रों के स्वामी थे। आजीवन तपस्या, साधना करते हुए सारी संपति असुर शिष्यों को दे दी थी।
3 शुक्राचार्य नीति शास्त्र के जन्मदाता थे।
क:--- अन्न ना निंन्नघात अर्थात अनाज का अपमान नहीं करना चाहिये।
ख:--- धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्ति स चश्रुंते अर्थात धर्म ही मनुष्य को सम्मान दिलाता है।
ग:--- यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथयेन तस्य सोर्थोवसीदति अर्थात मित्र का चुनाब सोच समझ कर करना चाहिए।
घ:--- नअत्यन्तम विश्वसेत कच्चिद विश्वस्तमपि सर्वदा अर्थात किसी पर भी अधिकतम विश्वास नहीं करना चाहिये।
च :--- दीघदर्शी सदा च स्यात चिरकारी भवेन हि अर्थात कल के बारे मे सोचें, लेकिन कामों को कल पर ना टालें।
अब शुक्राचार्य के जीवन का विश्लेषण किया जाए तो, यूरेशियन ब्रह्मा विष्णु महेश के षड़यंत्र स्पष्ट नजर आते हैं, जिन को ढकने का काम भी किया गया है और उन की स्किन भी सेफ की हुई लगती है। शुक्राचार्य मूलनिवासी महाऋषि भृगु के अत्यंत प्रत्युन्नमती मेधावी पुत्र थे, जिनके सामने बृहस्पति कहीं नहीं ठहरता था लेकिन, पक्षपाती गुरु मूलनिवासी महाऋषि शुक्राचार्य को वास्तविक गहन अध्ययन नहीं कराता और ना ही बृहस्पति के समान पढ़ाता है, जो बाद में छदमी गुरु द्रोणाचार्य भी महाऋषि पुत्र एकलव्य के साथ करता है, वही नीति वर्तमान में ब्राह्मण जारी रख कर, मूलनिवासियों के साथ करने के लिए, दोहरी शिक्षा देते आ रहे हैं। महाऋषि शुक्राचार्य मूलनिवासी, आदवंशी, आदिवासी महाऋषि हुए हैं जिन के साथ भी अमानवीय व्यवहार किया गया है, उन्हें भी असुरों का गुरु घोषित किया गया है जबकि वे खुद ही असुर थे इसीलिए वे अपने असुर मूलनिवासी समाज को शिक्षा देने में ही अपना धर्म समझते थे। विष्णु की हैवानियत के कारण, महाऋषि भृगु जी विष्णु ब्राह्मण को अभिशाप दिलाते हुए, दर्शाया गया है कि, उसी के शाप के कारण विष्णु को बार बार जन्म ले कर माता की कोख की जेल की सजा काटनी पड़ती है, जो अति हास्यास्पद ही लगती है क्योंकि कोई भी जीव पुनर्जन्म नहीं लेता है, ना ही कोई स्वर्ग नरक है, ना ही कोई अभिशाप नामक अस्त्र शस्त्र है, जिस से कोई अभिशप्त हो जाए।
वास्तव में, यूरेशियन घुसपैठियों ने अपने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के काले कारनामों को छिपाने के लिए ही मूलनिवासी, आदवंशी, आदिवासी गुरुओं, पीरों, ज्ञानियों, ध्यानियों, सन्तों, महंतों महापुरुषों और योद्धाओं को छलबल से मारा हुआ है, जो आज भी जारी है। वर्तमान आदवंशी मूलनिवासियों को, ब्राह्मणों के छद्म इतिहास को समझना होगा और उस का पोस्टमार्टम कर के, भावी सन्तानों को, यूरेशियन घुसपैठियों की छल और घातनीति को समझाना होगा, जिन का जबाब भी उन्हीं की भाषा में दे कर, अन्याय, अत्याचार से, मूलभारतीयों की गुलामी को खत्म करना होगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 04, 2021।

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