उपप्रधान मंत्री बाबू जगजीवन राम का हश्र।
।।उपप्रधान मंत्री बाबू जगजीवन राम का हश्र।।
भारत के मूलनिवासी धार्मिक, राजीतिक नेता ब्राह्मणवाद को नहीं समझ रहे, अमीर ब्राह्मण अपने गरीब ब्राह्मणों को भी, गरीब बनाए रखने से पीछे नहीं हैं फिर मूलभारतीयों, आदवंशियों, मूलनिवासियों की तो औकात ही क्या है ? ये यूरेशियन अमीर पाँच हजार वर्षों से, छल कपट से, मूलनिवासी भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए, नित नए नए ढंग अपनाते हैं, जिन को मूलनिवासी धार्मिक और राजनीतिक नेता नहीं समझ पा रहे हैं। यूरेशियन धर्म और राजनीति के लोग मूलनिवासी नेताओं की, खरीद फरोख्त कर के, अपनी राजसत्ता को बचाते आए हैं। जब कि इन लोगों के पास ना तो दिमाग है, ना ही सोच है, केवल छल कपट, हेराफेरी से ही काम चलाते आए हैं। वाल्मीकि रामायण से सूर्यवँशी रामचन्द्र जो मूलनिवासी आदिवासी ही है, का उस के ही मूलनिवासी रावण के साथ युद्ध करवा कर दोनों को ही मिट्टी में मिला दिया था, जिस रणनीति को ना तो राम समझा था, ना ही राजा रावण। वस्ल्मीकि की लिखी हुई रामायण के स्वरूप को मनुवादी रंग का पुट देकर, उस पर अपना कब्जा कर के अधिपत्य जमा लिया हुआ है। जब स्वतंत्र भारत को संविधान चाहिए था तब भी, इन के पास दिमाग नहीं था, तब भी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर से संविधान लिखवाया और उसी के वंशज मूलनिवासियों को मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया। इसी तरह, जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में, कोई भी योग्य व्यक्ति नहीं मिला था, तब भी अछूत मूलनिवासी जगजीवन राम को ही बड़े बड़े पदों की जिम्मेदारी देकर, नेहरू ने, शासन चलाया। जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी ने भी बाबू जगजीवन राम के कंधे का सहारा लेकर ही शासन किया। 1971 की भारत पाकिस्तान जंग भी बाबू जगजीवन राम ने, खुद युद्ध क्षेत्र में जा कर, जवानों का हौसला बुलंद कर के जीती थी। जब इंदिरा गांधी के राज में अकाल पड़ा था, अन्न की त्राहि त्राहि मची थी, तब भी निष्कलंक मंत्री, बाबू जगजीवन राम को कृषि मंत्री बनाया था, बाबू जी के मंत्री बनते ही आदपुरुष ने, भारत की भूखी प्यासी धरती पर खूब जल चढ़ाया और अकाल खत्म किया था। तब भी बाबू जी से बढ़ कर कोई भी सांसद शुभ लक्षणों वाला और योग्य नहीं मिला था, इसी कारण इन के पास दो दो मंत्रालय भी रहे। बाबू जगजीवन राम जी 1952 से 1956 तक संचार मंत्री, 1956 से 1962 तक परिवहन और रेलबे मंत्री, 1962 से 1963 तक परिवहन और संचार मंत्री के पद पर रह कर जवाहर लाल नेहरु के साथ अपनी योग्यता का प्रदर्शन किया था। सन 1966 से 1967 तक, बाबू जी श्रम रोजगार और पुनर्वास मंत्री रहे। 1967 से 1970 तक खाद्य और कृषि मंत्री रहे। 1970 में रक्षा मंत्री बनाये गए। बांग्ला देश बनाना केवल इन्हीं का ही चमत्कार था। वे 1974 से 1977 तक कृषि एवं सिंचाई मंत्री रहे। इतने अनुभव और बड़े बड़े पदों पर रहने के बाबजूद भी कांग्रेस ने, इन्हें प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया था। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने, देश में तानाशाही थोंप दी थी, तब इन्होंने कांग्रेस को किक मार दी थी। विपक्ष ने बाबू जी को प्रधानमंत्री बनाने का आश्वासन दे कर, अपने साथ मिला लिया और इन्होंने जनता दल को भारी जीत दिलाई थी जिससे जनता दल की सरकार बन गई, तब फिर छली ब्राह्मणवाद ने, बाबू जी के साथ छल किया और मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बना दिया था। जे पी और उन के मनुवादियों ने मूलनिवासी जनता के साथ गद्दारी कर डाली। बाबू जगजीवन राम को फिर उपप्रधान पद से ही नमाज कर रक्षा मंत्री बनाया गया, वे 1977 से 1979 तक इस पद पर रहे।
भारत ही नहीं समूचे विश्व के इतिहास में, बाबू जगजीवन राम के तुल्य कोई भी हस्ती ऐसी नहीं मिलेगी, जो आजीवन राजनीति में अजेय रही हो, जो निरन्तर पचास सालों तक जीतता रहा हो, कोई इतने वर्षों तक सत्ता में रहा हो, मगर 1977 में हार का मुंह देखने वाली इंदिरा गांधी को फिर 1980 में प्रधानमंत्री बना दिया गया, जब कि उस को हार का कलंक लगा हुआ था मगर अजेय बाबू जगजीवन राम जी को ना तो कांग्रेस ने, ना ही जनता दल के ब्राह्मणवादियों ने, भारत का प्रधानमंत्री बनने दिया। इसी कारण बाबू जगजीवन राम ने कहा था, "इस कम्बख्त मुलख में चमार कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता"। बाबू जी के कटु अनुभव का लाभ, ना तो राम विलास पासवान ने उठाया, ना ही शरद यादव, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव ने। यदि ये लोग बाबू जगजीवन राम जी के अनुभव का लाभ उठाते और साहिब कांशी राम के साथ चलते तो, ये लोग भी प्रधानमंत्री अवश्य बनते मगर मनुवादियों की अर्थी को कंधा देने के कारण, इन्होंने खुद भी जलालत की जिंदगी जी और विपन्न मूलनिवासी समाज को भी जलालत की जिंदगी जीने के लिए ही मजबूर किया हुआ है। वर्तमान अहंकारी मूलनिवासी राजनेता, अपने पूर्वज नेताओं के खट्टे अनुभव से भी सीख नहीं पा रहे हैं, कि जब पचास वर्षों तक राज करने वाले, सब से वरिष्ठ सांसद बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया, तो हमारी क्या औकात है, कि हमें भी कोई इस सर्वोच्च पद पर आसीन कर देगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 16, 2021।
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