देवी, देवता और राक्षसों का छद्म इतिहास।।

।। देवी, देवता और राक्षसों का उतपति का छद्म इतिहास।।
आदिकाल में सुर, असुर, देव, दानव, दैत्य, रक्ष, यक्ष, दक्ष, किन्नर, निषाद, गंधर्व, नाग आदि कोई भी जातियां नहीं थीं। आदपुरुष या आदम से चली आदमी जाति ही थी, मगर ज्यों ज्यों धरती पर आदमी की वृद्धि हुई, त्यों त्यों, उन के नाम से वंश भी बनते गए थे, जिन्हें उन वंशों के गोत्र कहा जाने लगा। भारतवर्ष के मूलनिवासी भृगु ऋषि के वंशज भार्गव कहलाए थे, इसी प्रकार भारद्वाज एक और वंश का नामकरण हुआ। आद का पुत्र जुगाद हुआ, उस के बाद नील हुआ। ज्यों ही भारत में यूरेशियन घुसपैठियों ने, छल बल से मूलनिवासी शासकों से सत्ता छीनी त्यों ही ये भारतीय नील वंश का वास्तविक नाम मिटाने के लिए, नल नील नामक कथा घड़ी गई। सम्राट नील ने, जनता की रक्षा के लिए राक्षस नियुक्त किये हुए थे, यूरेशियन आक्रांताओं ने, इन्हीं क्षेत्रीय रक्षा अधिकारियों को नेगेटिव अर्थ में परिवर्तित कर के, भयानक, कुरूप, सींगों वाला राक्षस सिद्ध कर के अपमानित किया हुआ है। राक्षस उतपति के बाद मूलनिवासी सुरक्षा दलों के कई नाम रखे गए, वर्तमान समय में, इन्हें असुरों और दानवों जैसा ही मान कर, देवी देवताओं की उत्पत्ति अदिति से, असुरों की दिति से, दानवों की दनु, कद्रू से नाग वंश की मानी गई है। कश्यप जाति की सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुआ था, उनमें से कुछ वीर पुरुषों ने, मूलनिवासी प्रजा की रक्षा का दायित्व संभाला, उन्हें राक्षस कहा गया था और जिन्होंने यक्षण (पूजन) का दायित्व संभाला वे यक्ष कहलाए।
एक हजार वर्ष पूर्व से ही कल्पित रामायण युग शुरू हुआ लगता है, इसी काल में राक्षसों का आतंक बहुत ज्यादा बताया गया है। लेखकों ने, कल्पनाओं को सत्य सिद्ध करने के लिए, पूरा जोर लगाया हुआ है। कल्पित पात्रों के नाम से, नक्षत्रों, वनों, नदियों, तीर्थ स्थलों और उपवनों के नामकरण किये गए हैं, गीत, भजन, नाटक, रास लीलाएं रची गईं है, ताकि कोई मूर्ख व्यक्ति भी इन कल्पनाओं पर अविश्वास ही ना कर सके। जब वर्तमान ब्राह्मणवादी सरकार सुप्रीम कोर्ट में, अपना हल्फ़िया ब्यान दर्ज करती है कि, राम नाम का कोई व्यक्ति नहीं हुआ है, तो फिर किस प्रकार इन कल्पित पात्रों और तर्कहीन कथाओं पर विश्वास किया जा सकता है ? उदाहरण के तौर पर (मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़) पर राक्षसों का आतंक लिखा गया है, विश्व विख्यात दंड नामक राक्षस के कारण ही इस क्षेत्र का नाम दंडकारण्य पड़ा था। कल्पित रामायण काल के दस बड़े बड़े राक्षस बताए गए हैं, जिन सभी का इतिहास, झूठ, फरेब की दीवारों पर टँगा हुआ प्रतीत होता है।
राक्षस रावण।।
मूलनिवासी शासक रावण की माता, माली की पुत्री कैकसी बताई गई है। रावण का अपने नाना की ओर झुकाव ज्यादा था, एक लेखक ने लिखा हुआ है कि, रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, दक्ष सेनापति और वास्तुकला का कुशल मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ज्योतिर्ज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। राक्षसों के प्रति उसके लगाव के चलते उसे राक्षसों का मुखिया घोषित कर दिया गया था। रावण ने लंका को नए सिरे से बसाकर राक्षस जाति को एकजुट किया था और फिर से राक्षस राज कायम किया था। उस ने लंका को कुबेर से छीना था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था, कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और कई तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी भी पुरूष के पास नहीं था। सभी उससे भयभीत रहते थे। पौराणिक मान्यता अनुसार एक शाप के चलते असुर राज विष्णु के पार्षद जय और विजय ने ही रावण और कुंभकर्ण के रूप में फिर से जन्म लेकर धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया था। द्वापर युग में यही दोनों राक्षस शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इनको तीन जन्मों की सजा थी। रावण ने रक्ष संस्कृति का विस्तार किया था। रावण ने कुबेर से लंका और उनका विमान छीना। रावण ने राम की सीता का हरण किया और अभिमानी रावण ने शिव का अपमान किया था। विद्वान होने के बावजूद भी रावण क्रूर, अभिमानी, दंभी और अत्याचारी था।
उपरोक्त कथा का तर्कसंगत अध्ययन किया जाए और फिर इस का विश्लेषण भी किया जाए तो, सारी कथा, विरोधाभास से ही भरी हुई है प्रतीत होती है। जब धरती ही गोल है, तो फिर कहीं भी स्वर्ग नरक नहीं है, किसी के कहने से किसी का कोई अनीष्ट, बुरा, हानि, लाभ, अहित नहीं होता है, अगर ऐसा होता, होता तो फिर सभी देशों की सीमाओं पर इतनी सेनाएं तैनात क्यों की हुई हैं, तब तो फिर अभिशाप देने वाले ही सीमाओं की सुरक्षा के लिए तैनात करने चाहिए थे, ताकि वे अभिशाप देते रहते और किसी भी सैनिक को शहीद होने की जरुरत नहीं हो सकती थी।
रावण सर्वश्रेष्ठ राजा था:---रामायण में दर्ज है कि रावण वहुमुखीं प्रतिभा सम्पन्न शासक था, अथाह ज्ञान का भंडार था, विश्व विख्यात प्रकांड विद्वान था, फिर ऐसा व्यक्ति कभी भी कोई भी अनैतिक कार्य कर ही नहीं सकता था, मगर ये आर्य, अनार्य जाति का विवाद और संघर्ष का ही जीता जागता उदाहरण लगता है, जो आज भी जारी है, क्योंकि भारत के पूर्व प्रधनमंत्री राजीव गांधी ने भी, श्री लँका में भारतीय सेना भेज कर, वहां के मूलनिवासी आंदोलनकारियों को दबाने के लिए, ब्राह्मणवादी सरकार की सहायता की थी, इसीलिए रावण को भी यूरेशियन का दुश्मन समझ कर, उसे अपमानित और जलील कर के, उस का इतिहास धूमिल किया गया है। ब्राह्मणवाद का यह षडयंत्र रहा है, कि ये लोग नारी जाति के झूठे लांछन लगा कर, विश्वामित्र जैसे मूलनिवासी राजनेताओं को कलंकित कर के गन्दी राजनीति खेलते आए हैं, जो मनुवादियों की फितरत रही है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 08, 2021।

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