प्रथम आई ए एस अच्युतानंद जी से अन्याय।

 ।।प्रथम आई ए एस अच्युतानंद से अन्याय।।

स्वतंत्रता के बाद, भारत में, मेधावी योग्य युवाओं को उच्च पदों के लिए चुनने के लिए, लोकसेवा सेवा आयोग की स्थापना की गई थी। इस से पूर्व भी अंग्रेजी सरकार ने भी आई सी एस परीक्षाओं के माध्यम से, प्रशासनिक उच्च पदों के चयन के लिए परीक्षाएं आयोजित की थीं जिन के माध्यम से प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए गए थे। इसी सिस्टम को स्वतंत्र भारत में भी लागू किया गया था।

अंग्रेज सरकार, बिंना जातीय, वर्ण भेद, धर्म भेद के  ही, चयन करती थी, कभी भी पक्षपात नहीं करती थी मगर ज्यों ही, मूलभारतीयों के दुश्मन जवाहरलाल नेहरु की सरकार बनने लगी त्यों ही भारतवर्ष के मूलनिवासी लोगों के साथ जातीय भेदभाव शुरू हो गया था, आजादी की लड़ाई लड़ने के कारण मूलनिवासी कांग्रेस को अपनी पार्टी समझ कर, जवाहरलाल नेहरु को अपना प्रधानमंत्री चुनने के लिए, कांग्रेस को वोट देते रहे मगर ये कपटी प्रधानमंत्री, अंदर ही अंदर मूलनिवासियों की जड़ों को काटता रहा, आर एस एस जैसी संस्था को पालता पोसता रहा। कभी भी इस आदमी ने, आरक्षण शतप्रतिशत लागू नहीं किया और ना ही साढ़े बाईस प्रतिशत मंत्री केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए, ना ही कभी मूलनिवासी भूमिहीनों को भूमि बांटी। जब साहिब श्री कांशीराम जी ने, नारा दिया कि, जो जमीन सरकारी है वह हमारी है, मंडल कमीशन लागू करो बरना कुर्सी खाली करो, जो वहुजन कि बात करेगा, वह दिल्ली से राज करेगा, वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। तब इंदिरा गांधी सरकार हिली थी और साहिब कांशीराम जी के क्रांतिकारी डंडे से भयभीत हो कर और आंदोलन को कुचलने के लिए, उबड़ खाबड़ भूमि कुछ ही भूमिहीनों को बांट दी गई और फिर वोट ले कर राज करने लगी मगर उस ने भी दो चार प्रतिशत से अधिक मूलनिवासी जनता को नौकरियां नहीं दीं, जब आदपुरुष से इन कपटी शासकों का अन्याय बर्दाश्त नहीं हुआ तो, साहिब कांशीराम जी के ही करकमलों से, कांग्रेस पार्टी को पिंडदान करवा दिया, जिस के कारण, आज तक कांग्रेस का पुनर्जन्म नहीं हुआ।

जवाहरलाल नेहरू ने, प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती में बेइमानी शुरू करवाई और ब्राह्मणों की ही अधिक भर्ती की, राजपूतों और वैश्यों को भी ठिकाने लगा दिया था,1990 तक के आंकड़े बताते हैं, कि 3600 आई ए एस में से, 2600 ब्राह्मण ही थे, 850 आरक्षण प्राप्त मूलनिवासी, बाकी बचे 150 में से राजपूत, वैश्य, मुसलमान, जाट सिख कितने होंगे, उन का अनुमान स्वत ही लगाया जा सकता। जब आई ए एस की पहली प्रतियोगिता परीक्षा हुई थी, तो उस बैच की परीक्षा में, बंगाल के आदवंशी, मूलनिवासी टॉपर अच्युतानंद जी को 1050 में से 609 अंक मिले थे, जब कि मद्रास के सामान्य कैटेगरी अर्थात सवर्ण कृष्णन को 602 यानि 57.33 अंक मिले थे, परन्तु साक्षात्कार में कृष्णन को 300 में से 260 यानी 86.66 अंक दिए गए थे, जब कि मूलनिवासी टॉपर अच्युतानंद दास को 110 यानी 36.66 प्रतिशत अंक दिए गए थे, जब कि उन के अंक 270 बनते थे। जब से गोरे अंग्रेज भारत को छोड़ कर गए हैं और काले अंग्रेज सत्ता में आए हैं, तब से ही भारतवर्ष के सभी मूलनिवासी अन्याय, अनाचार, व्याभिचार, अत्याचार और मावलिंचिंग के शिकार होते आ रहे हैं। इन लोगों ने, हर वर्ष ही मूलनिवासी और आदिवासी टॉपरों के साथ ऐसा ही करवाया है, पक्षपाती केंद्र और राज्य सरकारों ने, सभी वर्गों के साक्षात्कारों में, मूलनिवासी प्रतियोगियों के साथ ऐसा ही अन्याय किया है। इन बेईमान भ्रष्ट सत्ताधीशों के साथ अमीर मूलनिवासी नेता भी मिले हुए हैं, जिन की मिली भगत के कारण मूल निवासियों को कोई न्याय नहीं मिल रहा है। यदि मूलनिवासी राजनेता एक मंच पर नहीं आए और मिल कर राज नहीं छीना तो, मूलनिवासी पुनः गुलामी भरी नारकीय जिंदगी जीने के लिए ही विवश हो जाएंगे।

रामसिंह आदवंशी।

अध्यक्ष।

विश्व आदधर्म मंडल।

फरवरी 15, 2021।


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