आदवंशी दानवीर महाराजा बलि जी महाराज।

।। आदवंशी दानवीर महाराजा बलि जी महाराज।
सम्राट शिवशंकर के साम्राज्य में, अनेकों राजे महाराजे शामिल थे, जिन में से एक दानवीर महाराजा बलि जी भी थे। आदिपुरुष से चली आ रही वंशाबली के शासक अत्यंत धर्मवीर, कर्मवीर, दानवीर, न्यायवीर, शूरवीर, रणवीर और क्रांतिवीर, हुए हैं। अपना सर्वस्व दान कर के भी ये आदर्श शासक तनिक भी ध्यान नहीं रखते थे, कि उन के पास शाम के बक्त के लिये, परिवार को कुछ खाने के लिए बचा भी है या नहीं। ये शासक हमेशा भिख मंगे याचकों को कभी भी निराश नहीं करते थे, भिखारियों को कभी भी दुत्कारते नहीं थे। वे नारी जाति का तो सब से अधिक विश्वास और सम्मान करते थे। नारी की ओर आंख तक उठा कर नहीं देखते थे, नारी को केवल सम्मान और श्रद्धा की प्रतिमूर्ति समझते थे, इसी कारण सभी नारी और भिखारी हमेशा ही उन की दानवीरता का अनुचित लाभ भी उठाया करते थे।
बलि का उदभव:---विरोचन जी एक आदर्श महाराजा थे, उन के महल में एक बुद्धिमान पुत्र रत्न का जन्म हुआ था, जिस का नाम दानवीर बलि रखा गया था।
विरोचन की राजधानी:----महाराजा विरोचन के  साम्राज्य की राजधानी, महाबलीपुरम थी। राजा बलि भी इसी राजधानी से अपना शासन चलाया करते थे।
न्यायप्रिय शासक:----राजा बलि आद पुरूष के, बेगमपुरा संविधान और आदेशानुसार ही शासन चलाते थे। उन के राज में कोई भी अमीर गरीब नहीं था, कोई ऊँच नीच, जाति भेद, छूत अछूत नहीं था। किसी को भी जुर्माना और दण्ड नहीं किया जाता था। कोई भी नागरिक कानून का उल्लंघन नहीं करता था। कहीं भी कोई व्यक्ति अन्याय, अनाचार, व्याभिचार और अत्याचार नहीं करता था। सभी को महाराजा बलि न्याय देते थे।
दानवीर राजा बलि:----राजा बलि वचन के धनी और पक्के थे, इसी कारण उन के बारे में कहा भी गया है कि:---
बलि कुल रीति सदा चली आई। 
प्राण जाई पर वचन ना जाई। 
राजा बलि बड़े ही दानी राजा थे, उन से जो कोई याचक, कुछ भी मांगता था, वही उस भिखारी को दे देते थे, भले ही शाम को उस के परिवार को खाने के लिए कुछ बचे या ना बचे। इधर यूरेशियन आक्रांताओं की नजर उन के राज्य को हड़पने पर थी, जिस के लिये उन्होंने, दानवीर बलि महाराज की उदारता और दानवीरता का अनुचित लाभ उठाने के लिए षडयंत्र रचा, जिस के लिए, विष्णु और उस की पत्नी लक्ष्मी को भीख में, बलि का राज्य छीनने का कार्य सौंपा गया था। दोनो को छद्म नीति से राजा बलि से दान में तीन कदम भूमि दान मांगने का पाठ पढ़ाया गया। राजा बलि, छोटे कद वाले छली वामन उर्फ विष्णु और उस की पत्नी लक्ष्मी को पहचान नहीं सका था। जब चीखते, कराहते हुए विष्णु दंपति, महाराजा बलि के पास आए तो दानवीर दयालू बलि ने, उन से चिल्लाने और रोने का मंतव्य पूछा। विष्णु दंपति ने कहा, महाराज! हमें वरदान चाहिए ताकि आप कहीं मुकर ना जाएं। राजा बलि ने कहा, हम आप को वरदान देते हैं, आप मांगो, जो आप मांगना चाहते हो। महाराज! पहले हम आप के दोनों हाथों को बॉन्ध देना चाहते ताकि आप हमें मार ना दें।दानवीर राजा बलि ने, ऐसा भी करने की आज्ञा दे डाली। विष्णु की औरत लक्ष्मी ने, राजा बलि के हाथ बॉन्ध दिये और कहा, हमें तीन कदम भूमि दे दो। राजा बलि ने, बौने आदमी को तीन कदम भूमि देने का वर दे दिया और तत्काल ही, विष्णु और उस की पत्नी ने, छल कर के, बलि का कत्ल कर दिया था, और सारा राज्य छीन लिया था। विष्णु ने, राजा बलि का साम्राज्य छद्मनीति से छीन कर, केरल की निरीह भोली भाली मूलनिवासी जनता का जीना दूभर कर दिया था। केरल की जनता अपने हठी न्यायवीर, कर्मवीर, दयावीर, धर्मवीर और दानवीर की छल कपट से हत्या हो जाने पर तड़फने लगी, रोने चिल्लाने लगी, उन की स्तुत्ति में, उन के गीत, भजन गाने लगी, जो आज भी ओणम पर्व के दिन केरल में सुने और देखे जा सकते हैं।
राजा बलि की छद्म कथा:---राजा बलि के छल कपट की कथा को आध्यात्मिक रंग में रंग कर, पुराणों में परोसा गया, ताकि इंद्र, मनिंद्र, शिव  और कृष्ण के साथ जोड़ कर, छल कपट को दबाया जा सके मगर सत्य कभी भी नहीं मरता है, एक दिन सत्य सामने अवश्य आ ही जाता है, क्योंकि धरती गोल है, तो फिर कहीं भी आकाश पाताल है ही नहीं, फिर धरती के दो टुकड़े कभी नहीं हो सकते हैं, ना ही कोई समुन्दर में सो कर, तीन कदम भूमि पूरी कर के दे सकता है। राजा बलि ही सारी धरती का मालिक नहीं था, वह तो केवल केरल के एक भूभाग का ही महाराजा था, इसी कारण उसे छल कपट से मार काट कर वहां समुन्दर में फैंक दिया गया था। अतः सारी कथा तर्कहीन, मनघड़ंत और तथ्यों से परे ही लगती है। ये सारा षडयंत्र, राजा बलि की दानवीरता के कारण ही रचा गया था, क्योंकि उस के कुल की रीति चली आ रही थी कि, वे अपना प्रण कभी नहीं छोड़ते थे और जो कोई भी, कुछ भी मांगता था, वे उसे दे देते थे, जिस का अनुचित लाभ दुष्ट यूरेशियन लोगों ने लुटाया है, और इतने बड़े दानी राजा को राक्षस सिद्ध कर के अपमानित किया हुआ है। कोई भी मूलनिवासी महापुरुष ऐसा नहीं है, जिसे ब्राह्मणों ने देवता बताया हो। सभी के सभी असुर, राक्षस, दैत्य, दनुज, राक्षसी और खलनायक ही लिखे गए हैं, जब कि असुर शब्द का अर्थ होता है, जो शराब नहीं पीता है, राक्षस शब्द का अर्थ होता है, रक्षा करने वाला, दैत्य शब्द का अर्थ होता है देने वाला, राक्षसी शब्द का अर्थ होता है, जो रक्षा कर्त्री हो। भाबी मूलनिवासी शासकों को इस कथा से सबक ले कर, किसी भी छली, कपटी को बिना सोचे समझे, कभी भी कोई वरदान नहीं देना चाहिए, क्योंकि महाराजा बलि की मूर्खता से, भारत के मूलनिवासी गुलामी की जिंदगी जीते आ रहे हैं। शासकों को तत्काल एकता के सूत्र में बंध कर, मिल कर चुनाब लड़ना चाहिए और संभल कर शासन करना चाहिए।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 06, 2021।




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