पराक्रमी महाराजा महिसासुर।

।। पराक्रमी महाराजा महिसासुर।।
एक हजार वर्ष पूर्व तक भारत में, केबल राक्षस ही मूलनिवासी घरों में जन्म लेते थे, यूरेशियन के घर देवता ही जन्म लेते थे। इन राक्षसों के नाम भी बड़े ही विचित्र रखे गए हैं जिन का शाब्दिक अर्थ ही, सत्य को परिभाषित कर देता है। रावण राक्षस के बाद एक और राक्षस महिसासुर का भी अवतार हुआ था जिस का जन्म भी प्रकृति के उसूलों के खिलाफ ही ब्राह्मणों ने किया है।
महिसासुर का जन्म:---- महिसासुर का जन्म पिता रँभासुर के घर हुआ था, जिस के जन्म की कथा लिखते समय ब्राह्मण लेखकों को जरा भी शर्म नहीं आई थी।
जन्म की मनघड़ंत कथा:----यूरेशियन लेखकों ने लिखा हुआ है कि, एक बार राजा रंभ जल में रह रही भैंस से प्रेम कर बैठा, जिस के संसर्ग से ही महिसासुर का जन्म हुआ था, इसी कारण जब भी महिसासुर चाहे, वह भैंस की सवारी कर सकता था और जब चाहे ये भैंस मनुष्य का रूप धारण कर सकती थी। संस्कृत में महिष का अर्थ भैंस होता है, जो छद्म तरीके से शब्द का अनर्थ कर के ही लिखा गया है, क्योंकि महिसासुर का अर्थ होता है महि अर्थात धरती का राजा जो सुर अर्थात शराब ना पीता हो, इस शब्द का संयोग ही समझा जाए कि, महिष का सर्वाधिक प्राचीन अर्थ महाशक्तिमान, महाशक्तिशाली होता है। ये शब्द इषन प्रत्यय जोड़ कर बना हुआ है। मह, धातु से जिस प्रकार महा, महान, महत्व, महिमा और ब्रह्मा से ब्रह्म, ब्रह्मांड, ब्रह्मजोत, ब्रह्म जोत, ब्रह्म ज्योति, ब्रह्मानन्द, ब्रह्मपुखर, ब्रह्मपुत्र आदि रचे गए हैं। मनुस्मृति से ले कर वर्तमान हिंदी भाषा में भी महिष का अर्थ भैंस बनाया गया है, ये कथा आज से एक हजार वर्ष पूर्व ही लिखी गई हैं, इस से पहले ये कथा कहीं नहीं मिलती है। असुर को ही राक्षस का पर्यायवाची शब्द बना दिया गया है। महिसासुर को भैंसासुर भी कहा गया है।  जो कि यूरेशियन छली लोगों ने जानबूझकर कर, भारत के मूलनिवासी राजा को अपमानित करने के लिए, ईर्ष्यावश, दुराग्रहपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण घृणित कार्य किया है।
अब महिसासुर की लोकप्रियता, महानता, दिव्य स्वरूप के बारे में भी, विश्लेषण कर के देखें, तो ज्ञात होता है कि वे अत्यंत, सत्यवादी, ईमानदार, न्यायप्रिय शासक हुए हैं। वे अलौकिक शक्तियों के भी स्वामी भी थे, जिन के निम्नलिखित सत्य और सटीक प्रमाण आज भी भारत में विद्यमान हैं।
1 भारत में महिसासुर नामक कई गाँव वसे हुए हैं, जो उन की लोकप्रियता के उदाहरण हैं।
2 महिसासुर के नाम से कई चौक चौराहे और मुहल्ले बने हुए हैं। कई नदियों, टीलों, पोखरों के नाम महिसासुर के नाम पर मिलते हैं।
3 झारखंड के पलामू जिले के मनातू प्रखंड के अंतर्गत पद्मा पंचायत का एक गाँव महिसासुर गाँव है। 
4 उत्तरप्रदेश के पीलीभीत जिले के अंतर्गत पूरन पुर विधानसभा क्षेत्र में एक गाँव भैंसासुर आज भी है।
5 मध्यप्रदेश की तहसील अंतागढ़ में भी राजा महिसासुर गांव है। टीकमगढ़ जिले के पास एक बड़ागांव कस्बा है, यहां भैंसासुर का आद दुआरा भी है। जिसे भैंसासुर की मढ़िया के नाम से ही जाना जाता है। सतना जिले के मैहर थाना क्षेत्र प्रभाग के अंतर्गत भी भैंसासुर गांव है। जिला महोबा प्रखंड चरखारी में भी भैंसासुर कस्बा है। यहीं छतरपुर में भैंसासुर पवित्र मुक्तिधाम है। डी डी कोसांबी में भी महिसासुर को महसोबा नगर कहते हैं। महोबा क्षेत्र में महिषासुर की स्मृतियां मौजूद हैं। इसी प्रदेश के जबलपुर में भैंसासुर तिराहा है। बिहार के बिहारशरीफ में भैंसासुर चौराहा है। सिहोर शहर के समीप इच्छाबर मार्ग के बीच पहाड़ी पर भैंसासुर बाबा का धर्म स्थान है। बनारस में भी भैंसासुर का एक आद दुआरा है। वहीं महिसासुर घाट भी है। भैंसासुर बाबा नगर के देवताओं के प्रमुख हैं, वे आह्लः सुनते हैं। झारखंड, बिहार से लेकर महाराष्ट्र, बंगाल तक बाबा भैंसासुर के ऐतिहासिक और प्रसिद्ध स्थल विद्यमान हैं जिन के इतिहास को यूरेशियन लेखक मिटा नहीं सके। उन के प्रसिद्ध आह्लः गीतों, भजनों को कोई मिटा नहीं सका। उन के मंदिरों को , मिटा नहीं सका, कोई भी उन की पूजा अर्चना को समाप्त नहीं कर सका। भले ही यूरेशियन लेखकों ने, अपनी गन्दी कलम से उन के चरित्र को गन्दा किया हुआ है, भले ही छद्म नीति के अंतर्गत मूलनिवासी महापुरुषों, शासकों का इतिहास नष्ट किया हो मगर तत्कालीन भाषा बोलियों में लिखे साहित्य को कोई भी मिटा नहीं सका। तत्कालीन सभ्यता संस्कृति को भी कोई जमीदोज नहीं कर सका। सत्य को ढका तो जा सकता है, मगर हमेशा के लिए मारा नहीं जा सकता। आज नहीं तो कल भारतवर्ष के, आद वंशी, मूलनिवासी यूरेशियन से आजाद अवश्य हो जाएंगे, उस के बाद तेती करोड़ देवी देवताओं का भी भारत में नामोनिशान नहीं रहेगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 11, 2021।

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