महाऋषि शंबूक जी महाराज का वध।

।।महाऋषि शंबूक वध।।
ब्राह्मणवाद, छलकपट की दहलीज पर खड़ा है, जंगलराज के सिद्धांत पर चलता है जिस प्रकार इन्हीं ब्राह्मण कहानीकारों ने, भेड़ के बच्चे और भेड़िए की कथा घड़ी हुई है, आप ने पानी गन्दा किया है ? का बहाना लगा कर, भेड़िए ने मेमने को खा लिया था। ऐसा ही महाऋषि शंबूक के साथ भी घटा था। एक दिन किसी ब्राह्मण का इकलौता बेटा मर गया। तपस्वी शंबूक महाऋषि को मरवाने के लिए, ब्राह्मणों ने लड़के के शव को लाकर राजद्वार पर रख दिया और विलाप करने लगे। उन का आरोप था की बालक की अकाल मृत्यु का कारण राज्य में कोई दुष्कृत्य हैं। ऋषि- मुनियों ने इस पर विचार करके निर्णय दिया की राज्य में कहीं कोई अनधिकारी तप कर रहा हैं। रामचंद्र ने इस विषय पर विचार करने के लिए मंत्रियों को बुलाया। नारद ने उस सभा में कहा, हे राजन! द्वापर में भी शुद्र का तप करना वहुत बड़ा अधर्म हैं। आप के राज्य की सीमा में कोई शूद्र व्यक्ति तपस्या कर रहा हैं। इसी कारण ब्राह्मण बालक की मृत्यु हुई हैं। यह सुनते ही रामचन्द्र पुष्पक विमान पर सवार हो गया और महाऋषि शंबूक की खोज में निकल पड़ा था
दक्षिण दिशा में शैवल पर्वत के उत्तर भाग में एक सरोवर पर तपस्या करते हुआ, एक तपस्वी मिल गया, जो पेड़ से उल्टा लटक कर तपस्या कर रहा था। जिसे देख कर राम ने कठोर तप करते हुए तपस्वी के पास जाकर कहा, तुम धन्य हो। हे पराक्रमी पुरुष! तुम किस वर्ण में उत्पन्न हुए हो ? आप की क्या इच्छा हैं। ये भी बताओ कि तुम ब्राह्मण हो या क्षत्रिय? वैश्य हो या शूद्र हो ?
राम की बातों को सुन कर, वह तपस्वी बोला, हे राम ! मैं झूठ नहीं बोलूँगा। देव लोक को पाने की इच्छा से ही तप में लगा हूँ। मेरा नाम शम्बूक हैं। वह इस प्रकार कह ही रहा था, कि रामचन्द्र ने म्यान से तलवार निकाली और उस का सर काट दिया।
इस कथा को पढ़कर मन में ये प्रश्न उठते हैं कि, क्या किसी भी शूद्र के लिए तपस्या धर्म शास्त्रों में वर्जित हैं?
क्या किसी शूद्र वर्ण के व्यक्ति द्वारा तपस्या करने से किसी ब्राह्मण बालक की मृत्यु हो सकती हैं?
क्या राजा रामचन्द्र जिसे भगवान कहते हैं, शूद्रों से भेदभाव करते थे?
वेदों में शूद्रों के बारे में लिखा है कि:----
1. तपसे शुद्रम। यजुर्वेद 30/5
अर्थात- बहुत परिश्रमी और कठिन कार्य करने वाला साहसी और परम उद्योगों अर्थात तप को करने वाले को ही शूद्र कहते हैं।
2. नमो निशादेभ्य। यजुर्वेद 16/27
अर्थात- शिल्प, कारीगर व्यक्ति, परिश्रमी शुद्र और निषाद हैं उस को नमस्कार करना चाहिए और उन का सत्कार करना चाहिए।
3 रुचं शुद्रेषु। यजुर्वेद 18/48
अर्थात- जैसे ईश्वर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र से एक समान प्रीति करता हैं वैसे ही विद्वान लोग भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र से एक समान प्रेम करे।
4 पञ्च जना मम। ऋग्वेद
अर्थात पांचों ही वर्णों के मनुष्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र एवं अति शूद्र निषाद) मेरे यज्ञ को प्रेम पूर्वक सेवन करें। पृथ्वी पर जितने मनुष्य हैं, वे सब ही यज्ञ करें।
इसी प्रकार के अनेक प्रमाण शूद्रों के तपस्या करने के वेदों में मिलते हैं।
जब वेदों में, ऐसे प्रावधान हैं, तो फिर क्या हिन्दू भगवान राम को, इन व्यवस्थाओं का तनिक भी ज्ञान नहीं था ? क्या ऐसे व्यक्ति को भगवान भी कहा जा सकता है, जिसे अपने विवेक बुद्धि से, तर्क से, सत्य और असत्य को समझने परखने और न्याय करने का ज्ञान नहीं था। वास्तव में, इस घटना से सावित होता है, कि ब्राह्मणों ने सचमुच ही, राजपूत राजाओं सहित सभी को ज्ञानहीन, विवेकहीन रखने के लिए, शिक्षा के दरवाजे बंद कर रखे थे, केवल उन्हें मरने मारने की ही शिक्षा का प्रबंध किया हुआ था, जो आज भी जारी है, वाणियाँ भी केवल व्यापार करने तक सीमित था, शूद्र तो तीनों ही वर्णों की सेवा करने और गुलामी करने के लिए, विवश किया हुआ था। राजाओं को, न्याय अन्याय का कोई ज्ञान नहीं होता था, केवल ब्राह्मणों द्वारा स्थापित कानूनों का पालन ही मन मस्तिष्क में बैठाया हुआ था, जिस के वे पालन करते रहते थे।
ब्राह्मण तीनों ही वर्णों के बुद्धिजीवियों, मेधावी लोगों को मरवाने के लिए राजाओं को प्रयोग करते थे और आज भी करते आ रहे हैं, क्योंकि जब तक मोहनदास करमचंद गांधी आदि की जरूरत थी तब तक तो वे पूज्य थे मगर जब वे, सत्ता तक पहुंचने की हिमाकत करते तब तक वे कत्ल कर दिए गए। यही शंबूक ऋषि से किया गया है। भारत के मूलनिवासी स्वर्ग नरक में कोई भी विश्वास नहीं रखते, केवल कर्म को ही पूजा समझते आए हैं, इसीलिए शंबूक कदापि उलटे लटक कर, भक्ति नहीं कर सकते थे, कदापि किसी राजा के समक्ष झुक नहीं सकते थे, क्यों कि, सभी सन्त महात्माओं के समक्ष हमेशा से ही झुकते आए हैं, गुरु रविदास जी महाराज के, समक्ष बाबन राजे, महाराजे, महारानियाँ, बेगमें और बादशाह झुके थे, गुरु जी कभी भी किसी के पास नहीं झुके, इसीलिए ऋषि शंबूक की हत्या ब्राह्मणवादी छल ही था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 12, 2021।

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