महाऋषि शुक्राचार्य के साथ भी ब्राह्मणवाद का षडयंत्र।

।। महाऋषि शुक्राचार्य के साथ भी ब्राह्मणवाद का षडयंत्र।।
ब्राह्मणवाद ने, भारत के मूलनिवासी महापुरुषों को आज से पांच हजार सालों से, अपनी छद्म नीति का शिकार बनाया हुआ है। इन लोगों ने, कल्पित इतिहास की सृजना कर के, मूलनिवासी जनता को उलझाया हुआ है। आदपुरुष से ही, मानव का धरती पर पदार्पण हुआ है, आज से पाँच हजार साल पहले, यूरेशियन घुसपैठियों ने, मूलनिवासियों के इतिहास को भ्रामक बना कर, भारत के आदिवासी, आदवंशी, मूलनिवासियों, को घातनीति से गुलाम बनाया हुआ है, चाहे इब्राहीम, चाहे ब्रह्मा का इतिहास खोज कर देख लो, दोनो का स्क्रिप्ट एक जैसा ही है। दोनों की कहानी एक जैसी ही है, जिस से साबित होता है कि, यूरेशियन घुसपैठियों ने, यूरोप, अरब देशों के इब्राहीम को त्याग कर, भारत में आ कर ठीक वैसी ही सभ्यता सृजित की हुई है, जैसी सभ्यता ये घुसपैठिए, अपने पूर्वजों के देशों में छोड़ कर आए हैं। ब्रह्मा का संबंध भारतवर्ष के ऋषियों, मुनियों, महाऋषियों के साथ लिंक कर के, उन्हें भी खलनायक, दस्यु, दैत्य, दानव, राक्षस सिद्ध किया हुआ है। ब्रह्मा से ले कर जो इतिहास रचा गया है, वह केवल मात्र पांच हजार साल पूर्व से ले कर एक हजार वर्ष पूर्व तक लिखा गया है। कोई पुराण प्राचीनकाल में नहीं लिखा गया हैं। इन्हीं चार हजार सालों में, महाऋषि वाल्मीकि, शुक्राचार्य, रावण, कंस,  महिसासुर, राजा बलि, चन्ड मुंड आदि हुए हैं, जिन्हें राक्षसों के रूप में, इतिहास के पन्नों में दर्ज कर के चित्रित किया गया है। मूलनिवासी शुक्राचार्य जी महाज्ञानी, विद्वान और मेधावी ऋषि हुए है, जिन्हें राक्षसों का गुरु बता कर, वहुत बड़ा छल किया गया है।
जन्म:---शुक्राचार्य का जन्म महाऋषि भृगु के घर शुक्रवार को हुआ था, जिस के कारण उन का नाम शुक्राचार्य रखा गया था। शुक्राचार्य तीव्र बुद्धि के धनी थे। वे देवताओं के गुरु बृहस्पति से कई गुणा अधिक बुद्धिमान थे।
विवाह:-- भृगु ऋषि के दो विवाह हुए थे। पहली पत्नी का नाम ख्याति था, ख्याति देवी के गर्भ से दाता और विधाता दो पुत्र, और एक बेटी हुई थी। दूसरी पत्नी का नाम दिव्या था, जिस से उशना और च्यवन दो पुत्र हुए थे। उशना पुत्र ही भविष्य में शुक्राचार्य कहलाए।
भृगु ऋषि की दैवी शक्ति:---भृगु ऋषि वहुत बड़े ज्योतिषाचार्य, भविष्य द्रष्टा, विद्वान योगी, ज्ञानी हुए हैं, जिन के नाम से बनी भृगु संहिता विश्व में प्रसिद्ध है। उन के नाम पर आज भी कई पंडे और पुजारी अपना और अपने परिवारों का भरण पोषण करते आ रहे हैं। उन के सपुत्र शुक्राचार्य भी अत्यंत तीव्र बुद्धि, महाज्ञानी, विद्वान हुए हैं। उन की बुद्धि को देख कर ही उन के गुरु बृहस्पति ने, उन्हें दोयम दर्जे की शिक्षा देने का छल शुरू किया हुआ था, जिस छल को शुक्राचार्य जी समझ गए थे और उस छली गुरु को त्याग कर गौतम ऋषि को अपना गुरु बना लिया था।
यूरेशियन गुरुओं का छल कपट जारी है:--बड़े ही आश्चर्य की बात है कि, यूरेशियन आक्रांताओं ने, भारत के महाऋषियों के ज्ञान को शिरोधार्य कर लिया था, उन के बनाए पूजा घरों को अपना लिया था, मूलनिवासी सम्राट सिद्धचानो जी महाराज, शिव शंकर, को अपना लिया मगर उन के वंशजों को अपनी छल कपट नीति का शिकार बनाया हुआ था, जो वर्तमान में भी जारी है। आज मूलनिवासी वच्चों के साथ भी, वही व्यवहार किया जा रहा, जो शुक्राचार्य, एकलव्य, साहिबे कलाम मंगू राम मुगोवाल, और स्वामी अछूतानंद जी महाराज के साथ किया गया था। दोहरी शिक्षा व्यवस्था की स्थापना कर के, मूल निवासी छात्र, छात्राओं को, निम्न स्तर की शिक्षा दी जा रही है। मेधावी छात्र छात्राओं के भविष्य को अंधकारमय बनाया जा रहा है, जिस छल कपट को आदवंशियों और मूलनिवासियों को समझना होगा। अपने वच्चों के लिये स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय खोल कर, उन के भविष्य को बचाने का प्रयास करना होगा।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
फरवरी 05, 2021।

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