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Showing posts from October, 2020

गुरु रविदास जी की शिष्या "मीराँबाई" की भाई को फटकार।!

।। गुरु रविदास की शिष्या "मीराँबाई" की भाई फटकार! गुरु रविदास जी, अपनी शिष्या की कड़ी परीक्षा ले रहे थे, जिस के बारे में मीराँबाई अनभिज्ञ थीं, मगर अपनी दिव्य दृष्टि से सारे कौतुकों को भी देख रहे थे। मीराँ का अहंकारी भाई, मीराँ को मारने के लिए, जहर का प्याला देकर, उस के समक्ष खड़ा था। विवश मीराँबाई, आँखें बंद कर के अपने गुरु रविदास जी को याद करती हुई उन से अपनी व्यथा को बताती हुई, मुंह में कुछ बोल रही थी, जिसे उस का दारुण भाई, बोलती हुई मीराँ को सुनता है, जिस से आहत हो कर वह मीरांबाई को, कसाईयों की तरह, पछ पछ कर, कत्ल करने की धमकी देता है, जिस का चित्रण स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, दिव्य गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 572-573 पर बड़ी ही मार्मिकता से किया है:-----                  ।। शब्द जिला।। मीराँ पीन्दी ना पिआला तीर मारूं कस कस के। नहीं नाल शमशीर मारूं पछ पछ के। कैसी बुड़ बुड़ है लगाई। किस को रही है ध्याई। तेरी मौत सिर पर आई। किधर जाणा नस नस के। नहीं धरनी बीच गडवाई। देवां कूकरां ते तुड़वाई। पी तूँ पिआला मीरांबाई। मारूं दस दस के। जे जांणदे ...

गुरु रविदास की शिष्या "मीराँबाई" कहती गुरुआ जहर को अमृत बना दो।।

।। गुरु रविदास की शिष्या "मीराँबाई" कहती गुरुआ जहर को अमृत बना दो।। गुरु रविदास जी महाराज, अपने सभी शिष्यों की कड़ी से कड़ी परीक्षा लेते थे। कबीर साहिब, सदना, नामदेब, मीरांबाई को मारने की कोशिश की गई थी, मगर किसी की भी पेश नहीं चली थी। मूलनिवासी कभी भी किसी भी प्राणी की हत्या नहीं करते हैं, जिस के बारे में इतिहास ईमानदारी से बताता है, मगर मनुबाद तो अपनी बेटियों को जिंदा जला कर के सतीत्व की दुहाई देता आया है। मनुवादी बच्चियां जिनको सतीत्व के नाम पर आग में जलाया जाता रहा है, वे भी इस घोर अन्याय के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठातीं थी मगर मीरांबाई, नारी के अन्याय के खिलाफ खुद आगे आई और मनुबाद के मुंह पर जोरदार चांटा जड़ा। मनुवादी क्रूर व्यवस्था के खिलाफ जंग लड़ने के लिए, मीरांबाई ने सिर पर, कफ़न बांधा और ब्राह्मणों की बनाई जाति व्यवस्था को ध्वस्त करने की मिशाल कायम की। मीरांबाई ने जब, जाति व्यवस्था के उपर जोरदार हथौड़ा चलाया तो सारा मनुवाद चिल्लाया मगर गुरु रविदास जी के आशीर्वाद से कोई भी मीराँ का वाल बांका नहीं कर सका। उस के मायके ही अपनी बेटी को झूठी वर्ण व्यवस्था की रक्षा के लिए, मीराँबाई...

गुरु रविदास की शिष्या, "मीरांबाई" को भाई द्वारा जहर।।

।।गुरु रविदास की शिष्या, "मीरांबाई" को भाई द्वारा जहर। गुरु रविदास जी ने, ऐसा कौतुक भरा नाटक रचा हुआ था कि, उस के पात्र भी हर वर्ग के चुन चुन कर लिये थे। गुरु जी ने अच्छे पात्र से अच्छे कर्म करवाए और बुरे पात्र से बुरे कर्म लिए मगर उन के इस कौतुक को केवल बुद्धिमान विद्वान लोग ही समझ सके मूर्ख और पथभ्रष्ट लोग, बुरे कर्मों में ही उलझे रहे और बेमौत मरते रहे। गुरु जी ने खलनायकों और खलनायिकाओं को कतई नही बख्शा था। कर्मों के अनुसार सभी को सुख और दुख अवश्य दिए। गुरु जी ने ये भी साबित किया कि, सत्पुरुषों की प्रीत के साथ सुख तो कम ही मिलते हैं मगर दुख अधिक मिलते हैं। जो साधक दुखों को सहन कर जाते हैं, वे ही अमर होते हैं। गुरु रविदास जी महाराज, के इन विचारों को गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 570- 572 पर, स्वामी ईशरदास जी महाराज, अपने शब्दों में लिखते हैं कि:----                ।। शब्द आसा।। सुखैन ना हुन्दी साहिबो, नाल भगतां प्रीति करनी। लगाऊंणी सवलड़ी निभाऊणी साहिबो मुशकलड़ी औखी नाम कमाई फ़रनी। गुर वाक मनाऊंणा संगल पांऊँणा औखा लगणा गुरां दी करनी। सम दम रो...

गुरु रविदास जी की शिष्या, मीरांबाई को माता का फरमान।।

।।गुरु रविदास जी की शिष्या, मीरांबाई को माता का फरमान।। गुरु रविदास जी ने, मीरांबाई को, भक्ति मार्ग का रास्ता बताते हुए, रास्ते में आने वाली मुशीबतों और सभी प्रकार की आने वाली रुकाबटों की पूरी जानकारी दे दी थी जिस की सूचना उस की माता को भी मिल गई। माता श्री भी ये सुन कर, बड़ी उद्विग्न हो गई कि, मीरां ने चमार जाति का गुरु बना कर, अपने लिये तो मुशीबतों का पहाड़ खड़ा कर ही लिया है मगर सारे राजपूत समाज के साथ भी दुश्मनी मोल ले ली है। माता श्री का दिल तो मोम होता ही है, चाहे वच्चे कितने ही उच्छृंखल क्यों ना, वे क्यों ना कितने ही अपराध कर दें मगर वह हमेशा अपने वच्चों के भले के लिए ही दिन रात सोचती है, इस कारण मीरांबाई की माता, मीरांबाई को समझाती है, जिस का चित्रण स्वामी ईशरदास महाराज ने, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 569-570 पर बड़ी संजीदगी से किया है:----                     ।।शब्द पहाड़ी।। साधां दे ना जा मान तूँ मीरां मेरा कहिणा। लाज काज की डुबिआ डुबोई ना शर्म ना भाई भैंणा। जात चमार जाए रविदास दे फड़या तूँ दिन रात बहिणा। तात भाई तेरे मार द...

गुरु रविदास जी महाराज और मीरांबाई का वैराग्य।।

।।गुरु रविदास जी और मीरांबाई का वैराग्य।। गुरु रविदास जी महाराज के अलौकिक उपेदश को सुन कर, मीरां संसार से पूर्णरूपेण विरक्त हो गई। अपने मनःस्थिति को स्पष्ट करते हुए, गुरु जी को विश्वासः दिलाते हुए मीरांबाई उन के प्रति अपनी आस्था बताती हुई, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 568-569 पर, स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में कहती है:---              ।।शब्द शाम कल्याण ।। समझ लिआ जग कूड़ दिसदा। भैंण भाई अंग संग साक कौण किसदा। छुट गए झूठे पिआर गुरुआ। भेद पाया सिरजण हार गुरुआ। गुरु बिन जग में ना और दिसदा। अंत के बेले ना सहाई कोई है। शब्द गुरु बिन हैं ना कोई ढोई। पाएगा मरतबा प्रेम जिसदा। प्रेम वाली डोर हुण नहीं टुटदी। अमली अफीम मुशकल छुटदी। भरिया प्रेम पियाला कौण कहिदे विषदा। श्री रविदास गुरु ना बिसारियो। मिल गया खैर तेरे दरबारियों। तुझ बिन बाली कौण रूह इसदा। मीरांबाई, गुरु रविदास जी के समझाने बुझाने के उपरांत, गुरु जी को विनम्रतापूर्वक कहती है कि, गुरु जी मैं समझ गई हूं कि, ये सारा संसार कूड़ा कर्कट ही है। बहन भाई आक साक अर्थात सगे संबधी कोई भी किसी का नहीं है। अब...

गुरु रविदास जी ने मीराबाई को सच्चा मार्ग बताया।

।।गुरु रविदास जी ने मीराबाई को सच्चा मार्ग बताया।। गुरु रविदास जी महाराज ने, सर्व मॉनवता के लिए ही आजीवन अथक श्रम किया है, उन्होंने कभी भी किसी जाति पाति को अपने मार्ग में नहीं आने दिया। गुरु जी ने सभी वर्णों, जातियों, धर्मों, मजहबों के लोगों को गले लगाया था जिन में वाणियां जाति के गुरु नानकदेव को भी अपने नाम दान की बख्शिश की थी, राजपूत जाति की मीरांबाई को अपनी सर्वश्रेष्ठ शिष्या के रूप में मान्यता दी थी, नाई जाति के सेन को भी अपना शिष्य बना कर अपनी समन्वयवादी सोच को सँगत के सामने प्रस्तुत किया है। गुरु रविदास जी ने,  पद दलित नारी को जाति में मीरांबाई को सर्वोच्च स्थान दिया है और मीरांबाई ने भी कास्ट क्रीड, ऊँच-नीच को धता दिखा कर चमार गुरु को ही स्वीकार किया था, गुरु रविदास जी के आशीर्वाद से, मीरांबाई विश्व की सर्वश्रेष्ठ निर्गुण भक्ति की साधिका कहलाई है। मीरांबाई गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 567-568 पर स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में कहती है:----                   ।।शब्द सिंधड़ा।। कीते तीरथ साधु ढूंढे इन्हां भेव नूँ पाया है। आई स...

गुरु रविदास जी की आबरू, आदपुरुष ने रखी।

।।गुरु रविदास जी की आबरू, आदपुरुष ने रखी। गुरु रविदास जी महाराज की परीक्षा, महाराजा कुंभसिंह की राजधानी चितौड़गढ़ के महल में चल रही थी। गुरु जी अहंकारियों के अहंकार को तोड़ने के लिए, छल कपट कर के भरी सभा में अपमानित करने वालों से, अपनी आबरू की रक्षा करने के लिए, मन ही मन में, भगवान के पास प्रार्थना कर रहे थे। वे मन में ईश्वर का ध्यान लगा कर अरजोई कर रहे थे, कि राजे, महाराजे और ब्राह्मण मेरी इज्जत उतारने पर आमादा हैं, आप ही मेरे सहारे हो, आप ही मेरी नैया को पार लगाने वाले हो, ये सभी मुझ से ईर्ष्या और बैर विरोध कर के मुझे नीचा दिखाने का षडयंत्र रचे हुए हैं, आज फिर आप ही का सहारा है, आ कर मेरी नैया को किनारे लगा दो। गुरु रविदास जी षड्यंत्रकारियों के षडयंत्रों को असफल करने के लिए, निरंकार से अरजोई कर रहे थे, जिस का वर्णन स्वामी ईशरदास जी ने, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 564-565-566 पर बड़े ही सुंदर ढंग से किया हुआ है:----                ।।शब्द आसा।। नाम रटत हत सगले रोग हरि। महीपति के दर द्विज रिस खाए। महां वर दिव्य शोभ सिंघासन बनाए। सालिगराम आए च...

गुरु रविदास जी के विरुद्ध राजाओँ के पास विप्रों की शिकायतें।।

।।गुरु रविदास जी के विरुद्ध राजाओँ के पास विप्रों की शिकायतें।। गुरु रविदास जी महाराज, ऐसे दिव्य पुरुष हुए हैं जिन के समक्ष कोई भी अस्त्र शस्त्र सफल नहीं होता था, हिन्दुओं, मुसलमानों और ब्राह्मणों ने ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर, गुरु जी को नीचा दिखाने का प्रयास किया मगर बुरी तरह ओंधे मुंह ही गिर कर चकनाचूर हुए। आठ साल के बालक रविदास जी के ऊपर निर्दयी, पापी पंडे, तिलकधारियों, ने वह जुल्मोसितम ढाए, जिन्हें कोई पहलवान भी सहन नहीं कर सकता था। गुरु जी ने अकेले ही, मनुबाद और ब्राह्मणवाद का मुकाबला किया था और सभी को पराजित किया था। ब्राह्मणों की जब गुंडागर्दी, गुरु जी का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकी तो, बड़े बड़े मुकद्दमें बना कर, उन्हें राजाओं की अदालतों में बुला कर, कड़ी से कड़ी शर्ते रख कर, परीक्षाएं ले कर, मानसिक रूप से परेशान किया गया। स्वामी ईशरदास महाराज ने, वैश्विक धर्म ग्रँथ, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 562-563 पर इन शिकायतों का वर्णन किया है:----                 ।।शब्द पहाड़ी।। विपराँ शिकायतां कीतीयाँ, झाली दर्श गुरां दे चल आई। चितौड़ शहर ते बनारस आई लल...

गुरु रविदास जी और धरती मुसाफिर की सराँ।।

।।गुरु रविदास जी और धरती मुसाफिर की सराँ।। गुरु रविदास महाराज ने, आजीवन साधु सन्तों का जीवन व्यतीत किया है। चार वर्ष की आयु में ही, ब्राह्मणों, पंडों से लोहा लेना शुरू कर दिया था। उन्होंने पूजा, पाठ, भक्ति, और साधना के एकाधिकार को चुनौती देंकर, ब्राह्मणवाद के किले में आग लगा कर, राजाओं को भी सन्न कर दिया था। ब्राह्मणों के स्वांग भर कर, ब्राह्मणों का मजाक उड़ा कर, ब्राह्मणों की नींद उड़ा दी थी। धोती पहन कर, तिलक बजाकर, शंख बजा कर पाँच हजार वर्षों से चले आ रहे, प्रत्येक क्षेत्र के ब्राह्मणी एकाधिकार और गुंडागर्दी को, पहली बार चैलेंज किया था, तो केवल गुरु रविदास जी ने ही किया था। ब्राह्मणों को, भगवान का कोई डर नहीं था कि, मरने से पहले आदमी को अपने कर्मो का फल भुगतना पड़ता हैं, कर्म गति को कोई टाल भी नहीं सकता है, कबीर साहिब ने भी कहा है कि "कर्म गति टारे ना टरे", अर्थात जो अच्छे बुरे कर्म किये जाते हैं, उन की चाल को कोई भी टाल नहीं सकता। स्वामी ईशरदास जी ने भी कर्म के बारे मे कहा है, "करनी का ढंग निराला साधो करनी का ढंग निराला"। चार पांच हजार सालों से, भारतीयों का जीवन नर...

गुरु रविदास जी और तीर्थ स्थान का ढोंग।।

।।गुरु रविदास जी और तीर्थ स्नान का ढोंग।। गुरु रविदास जी महाराज ने, ब्राह्मणवादी सोच, चिंतन और मूक छलकपट को उजागर कर के सत्य के आधार पर जीवन यापन करने का क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया था, जिस ने विश्व को एक तर्कपूर्ण सिद्धांत, नियम, चिंतन के आधार देकर, क्रांतिकारी परिवर्तन करने के लिए  आधार बना कर दिए हैं, जिन विचारों ने विश्व के चिन्तकों, विचारकों, समाज सेवकों, धर्म के रास्ते पर चलने वाले धार्मिक व्यक्तियों और राजनेताओं को तर्कपूर्ण दिशा दी है। गुरु रविदास जी के ही सिद्धान्तों के अनुकरण से ही, विश्व के नेताओं ने, समाजवाद और वैश्विक संयुक्त राष्ट्र मंडल जैसी संस्थाओं को मूर्त रूप दिया और उस के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। गुटु जी ने मानवीय एकता के लिए, धर्मों की बाढ़, जातियों की निरर्थकता, ऊँच नीच काले गोरे के भेदभाव को मानव एकता के मार्ग में रुकाबट बताया है।  छलों, प्रपंचों के अड्डे भारत में जन्म लेकर, यहीं से समाज सुधार शुरू कर के, वेदों पुराणों की तर्कहीनता को फटकारते हुए गुरु रविदास जी लिखते हैं कि:-----                   ...

गुरु रविदास जी और साधु का पारस धातु।

।।गुरु रविदास जी और साधु का पारस धातु।। गुरु रविदास जी को, मनुवादी केवल अनपढ़ चमार ही समझते रहे, क्योंकि अछूतों को पढ़ने लिखने सत्संग करने, कराने का कोई मौलिक अधिकार था ही नहीं जिस के कारण इन मूर्ख, अंधविश्वासी तिलकधारियों ने उन को सत्पुरुष, ज्योतिर्ज्ञानी, की मान्यता कभी नहीं दी। गुरु जी अपनी  क्रान्ति की ज्योति ले कर अग्निपथ पर निरन्तर चलते ही रहे। गांव गांव डेरा डाल कर कुछ दिन वहां रुकते फिर आगे चल देते। ऊँच नीच, छुआछूत, छोटे बड़े, अमीर गरीब, जात कुजात, श्रेष्ठ पतित, वर्ण अवर्ण की दीवारों को ध्वस्त करते हुए, अपने विजय रथ को हांकते हुए कन्याकुमारी से ले कर ईरान इराक तक निरन्तर सफर जारी रखा, जिस के सबूत जगह जगह पर बनी हुई, उनकी स्मृतियाँ आज भी मिलती हैं। एक बार गुरु जी दिल्ली के समीप महिपालपुर ठहरे हुए थे, कि वहां एक साधु गुरु जी के दर्शन करने आ गया। अपनी विद्वता, श्रेष्ठता, जातीय अहंकार और ज्ञान को दर्शाते हुए, उस ने गुरु जी को एक पारस धातु दिया और कहा कि, ये आप रख लो, बुरे और बदहाली के समय, आप इससे सोना बना लेना। गुरु जी ने पारस को लेने से इन्कार कर दिया मगर साधु, पारस धातु को गुरु...

गुरु रविदास जी और मानव की इच्छाएं व्यर्थ।

।।गुरु रविदास जी और मानव की इच्छाएं व्यर्थ! गुरु रविदास जी, मानव की वैश्विक संलिप्तता की, वास्तविकता को समझाते हुए, कहते हैं कि, ये संसार नश्वर है, यहां कोई चिरस्थाई नहीं रह सकता, कोई किसी का नहीं है, किसी का किसी से कोई संबधी नहीं है। सभी स्वार्थवश एक दूसरे से मिल कर रहते हैं इसीलिए वे फरमाते हैं, कि हे मानव! तूँ कुछ ही दिन का मेहमान है, फिर ये संसार का रंगीन उपवन त्यागना पड़ेगा, जब वह अंत समय आ ही जाता है, जब काल का जाल पड़ जाता है, फिर काल जाल से कोई भी निकल नहीं सकता है। गुरु रविदास जी के भावों को, स्वामी ईशरदास जी, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ 1034-1035 पर लिखते हैं कि:-----                ।। शब्द पहाड़ी।। रहिणी नहीं रात मिलदी जिस घर बिच मौजां सी मणिआँ। जा घर माहे गबरू सी होया। मिहनत कर कर अहिनिश खपोया। तांण बैठा तूँ लमीआँ तांणिआँ। वणज बपार लख हजार कीते। निस बासर ते बेशूमार कीते। वण बैठा बपारी तूँ वाणिआँ। जो कुछ खट खट घर को लिआवे। बराकट बराकट जोड़ करावे। सो पूंजी नहीं मिली लजाणिआँ। ऐह तन बन गई कची गागरी। काल उदक जावत भाजरी। कितने कु रोज होर लँघ...

गुरु रविदास जी का जगननाथ पुरी कौतुक।।

।। गुरु रविदास जी का जग्गनाथ पुरी कौतुक।। गुरु रविदास जी महाराज अवतरित ही भारत के मूलनिवासियों के दुखों को दूर करने के लिए हुए थे। भारत के मूलनिवासी मनुस्मृतियों के काले कानूनों के कारण नारकीय जिंदगी जी रहे थे। मनुवादियों के साथ बैठकर खा पी नहीं सकते, उन के साथ विवाह-शादी नहीं कर सकते, एक कुएं से इकठ्ठे पानी ना तो भर सकते, ना ही पी सकते, जबकि उनके अछूत हाथों से उगाया गया अनाज खा जाते, उन के द्वारा घड़े में भरा हुआ पानी पी जाते, मंदिर में चढ़ाया हुआ धन डकार जाते। मनुवादियों के साथ, अछूत छू तक नहीं सकते थे, उनके सामने ऊँचे स्थान तो क्या, यहाँ तक कि उन के सामने अपनी चारपाई पर भी बैठ नहीं सकते थे, गेहूं, चने, चावल और दूध आदि स्वास्थ्य वर्धक अनाज तक खा नहीं सकते थे, जमीन तक के मालिक नहीं बन सकते थे। इन्हीं अत्याचारों और शोषणों से निजात दिलाने के लिए ही, गुरु रविदास जी ने विराट स्वरूप धारण किया हुआ था। एक दिन वे जग्गनाथ पुरी मंदिर में चले गए, जिस का वर्णन स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 447-449 में इस प्रकार किया है:----            ...

गुरु रविदास जी ने, जातपात खत्म करवाई।।

।।गुरु रविदास जी ने, जातपात खत्म करवाई।। गुरु रविदास जी को, पूजापाठ करने, कराने से रोकने के लिए, ब्राह्मणों ने नागरमल के पास, कई शिकायत पत्र दे दिए और फरियाद की, कि रविदास सत्संग कर के, हमारे आरक्षण में सेंध मार रहा है, जिसे पूजापाठ और भक्ति का कोई अधिकार नहीं है। ये अनाधिकार चेष्टा कर रहा है, इससे हमारा शास्त्रार्थ करवाया जाए ताकि इस की भक्ति की शक्ति का पता सब को चल सके। राजा नागरमल ने भी, ब्राह्मणों की झूठी शिकायत को सुन कर, गुरु रविदास जी महाराज और धूर्त ब्राह्मणों का नदी के किनारे शास्त्रार्थ करवाया, जिसमें शर्त रखी गई थी कि, दोनों पक्ष नदी में अपने अपने देवताओं को तैराएँगे, जिस में ढोंगी ब्राह्मण पत्थर तैरा नहीं सके, मगर गुरु रविदास जी ने दो मन की पत्थर की सिला तैरा दी, जिस के कारण राजा नागरमल और असँख्य लोगोँ ने गुरु रविदास जी को अपना गुरु स्वीकार कर के, उन से नाम दान की बख्शिश लेली। गुरु रविदास जी महाराज ने भी राजा नागरमल से छुआछूत और जातिपाँति समाप्त करने की शर्त पर राजा को ज्ञान दीक्षा दे दी जिस का वर्णन, स्वामी ईशरदास जी महाराज ने गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 445-446 ...

गुरु रविदास जी के समय विश्व में भारी जुलम।।

।।गुरु रविदास जी के समय विश्व में भारी जुलम।। गुरु रविदास जी महाराज के समय से पूर्व भारत कत्लगाह बना हुआ था। शुद्र और नारी तो कहीं भी, कोई दलील अपील के अधिकारी नहीं थे। दोनों को हर क्षेत्र में बलि का बकरा बनाया हुआ था, मनुवादी मुस्लिम शासकों के साथ मिल कर, शूद्रों और नारी के ऊपर अथाह अत्याचार करते थे, शूद्र दिन रात, पशुओं की तरह काम करते थे मगर भूख मिटाने के लिए, भरपेट भोजन तक  नहीं दिया जाता था, नारी को भी भोग विलास की सामग्री समझा जाता था, पति की मृत्य पर, औरत को जिंदा जला दिया जाता था, नाम उसी औरत का लिया जाता था कि, वह खुद ही जौहर कर रही हैं, मगर हिन्दू खुद ही ढोल, नगाड़ों और घण्टियाँ की जोरदार आवाज के बीच उस नारी की चीखों को मंद कर के बड़ी बेरहमी से जला दिया करते थे, ऐसे थे, भारत के मानवतावादी ब्राह्मण। जलती चिखाओं की चीख़ें, भूख से कराहते गरीब शूद्रों की आवाज, आदपुरूष के घर सुनाई पड़ी, जिससे उस का सिंहासन हिल गया और गुलाम नारी और शूद्रों को जुल्मों से बचाने के लिए, वह खुद धरती पर आने के लिए विवश हो गया। स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ 403-406 पर लिखते हैं ...

गुरु रविदास जी और साईँ (आदपुरुष) की अदालतें।।

।।गुरु रविदास जी और साईँ ( आदपुरूष) की अदालतें।। गुरु रविदास जी ने, विश्व में व्याप्त, छल कपट, बेईमानी, हेराफेरी, अन्याय, अत्याचार, शोषण, कत्लेआम, भयावह युद्ध अपनी आंखों से देखे थे, जिसके कारण, उन्होंने अनुभव किया था कि, विश्व में मॉनवता मर चुकी है, दया मर चुकी है, कोई किसी भी, आदिपुरुख के प्राणी पर तरस नहीं खाता है, बड़ी बेरहमी से, मानव मानव को मूली की तरह कत्ल करता जा रहा था, ब्राह्मणों और मुसलमानों को केवल अपने धर्म ही नजर आ रहे थे, इंसानियत को किनारे रख दिया गया है। तानाशाही का दौर चल रहा था, किसी के पास फरियाद करना अपनी ही मूर्खता थी। कोई भी समाज सुधारक तानाशाही और ब्राह्मणवादी अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का साहस नहीं कर पा रहा था। चौहदवीं शताव्दी के इतिहास को खरोल कर देखा जा सकता है कि, गुरु रविदास जी से पूर्व केवल सतगुरू नामदेब जी ने, हैवानियत के खिलाफ अपने भावों को जाहिर करना शुरू किया था मगर कोई भी संगी साथी ना होने के कारण, वे भी असरदार कदम नहीं उठा सके थे, उन्हें उस समय बल मिला जब, गुरु रविदास जी की शक्ति का लोहा, ब्राह्मण मान कर, पराजित होते गए। गुरु जी ने अपनी क्रां...

गुरु रविदास जी का कथन, करनी-भरनी ही पड़ती।।

।।गुरु रविदास जी का कथन, करनी-भरनी ही पड़ती।। गुरु रविदास जी यथार्थवादी, क्रान्तिनायक और क्रांतिकारी समाज सुधारक हुए हैं, जिन्होंने पांच हजार सालों से चले आ रहे, वेदों, मनुस्मृतियों उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रँथों और ब्राह्मणवादियों के काले कानूनों को ललकारा, फटकारा, दुत्कारा और उनके पाखण्डों, आडंबरों को झूठा सिद्ध किया। ब्राह्मणवाद की जड़ों को खोखला किया और नेशतनाबूद भी किया था। स्वर्ग नरक जन्म मरण के झूठे प्रपंचों को तर्कहीन सिद्ध किया और सँगत को कर्म की ओर उन्मुख किया। गुरु रविदास जी ने स्वर्ग-नरक, जन्म-मरण, पुनर्जन्म को ब्राह्मणों की काल्पनिक खोज सिद्ध किया हैं ताकि शासक वर्ग और निरीह सँगत ब्राह्मणों के काल्पनिक जाल से बाहर निकल कर, सुकर्म कर के, वर्तमान में सुख की सांस ले कर जियें। स्वर्ग नरक के मानसिक आतंक को खत्म किया जाए। कर्म की महत्ता बता कर, सँगत को अच्छे सुकर्म करने के लिए तैयार किया जाए। गुरु जी नरक के भय से मुक्त करते हुए समझाते हैं कि, करनी का फल भरना पड़ता है, स्वामी ईशरदास जी महाराज के शब्दों में, वे गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 399-400 पर लिखते हैं :-----   ...

गुरु रविदास जी का निर्देश अपनी वस्तु ही काम आती।

गुरु रविदास जी का निर्देश अपनी वस्तु ही काम आती।। गुरु रविदास जी वचपन से ही स्वाभिमानी थे, वे  स्वयं तो स्वाभिमान से रहते थे, मगर सारे विश्व को भी स्वाभिमान से जीने के लिए प्रेरित करते थे। वे स्वाभिमान बनाए रखने के लिए, स्वराज, स्वधर्म, स्वधर्म ग्रँथ, स्वभाषा, स्वपन्थ के हामी थे। गुरु जी सेल्फ डिपेंडेंट बना कर शोषकों के शोषण से निजात दिलाना चाहते थे। दूसरों के सामने सीधा हाथ करना भिक्षा मांगना समझते थे और हाथ को उलटा कर के रखना किसी को कुछ देना मानते थे। गुरु रविदास जी पराई वस्तु को अपने लिए सम्मानजनक नहीं मानते थे, वे इसीलिए कहते हैं कि,:----                        ।।छंद।। वस्तु पराई राख कै, कितने कु दिन गुजारेंगे। एक तऊ वे लख लै जाई, शदियों के सूद भी नकारेंगे। आपणी वस्तु जोड़ कर खजाना पास। अपनी ही काम आएगी, भाई छोड बगानी आस। गीता सिमरती पोथियाँ पढ़े ग्रँथ हजार। जिहड़ी खींच कर ले गई अछूत मुरदार। उतों लुथफे खा लये करँग पये रुलेंदें। करंगा नूँ भी जगह नहीं, पराई थां रखेन्दे। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, दूसरों से उधार ली हुई व...

गुरु रविदास जी महाराज और देश सेवा।।

  ।।गुरु रविदास जी महाराज और देश सेवा।। गुरु रविदास जी केवल ज्योतिर्ज्ञानी ही नहीं हुए हैं, वे जन कल्याण, जन सेवा, दुखियों, पीड़ितों और बेसहारों की आवाज भी थे। उन्होंने जहाँ, छलकपट, हिंसा, अत्याचार, अनाचार, शोषण के ख़िलाफ़ जंग लड़ी वहीं उन्होंने भारतीयों को देश सेवा के लिये मर मिटने, देश की सुरक्षा के लिए आत्म बलिदान देने का भी आह्वान किया था, वे केवल मात्र धर्म योद्धा नहीं हुए, वे केवल मंदिरों की शोभा बढ़ाने के नाममात्र देवता नहीं हुए, वे खुद भी और सँगत को भी देश सेवा के लिए प्रेरित करते हैं। मन्दिरों में बैठ कर, शरीर को रंग-कुरंग कर के, इंसान से, बहुरूपिया बन कर सँगत के टुकड़ों पर पलने वालों के खिलाफ थे। वे तो शूरवीर बन कर और अच्छे बुरे समय का मुकाबला करने के लिए, सँगत को अपनी वाणी से जागृत करते थे, उनकी वाणी ही निर्बल को अन्याय के खिलाफ जंग लड़ने का साहस पैदा करती थी। गुरु जी सँगत को निठल्ले बन कर जीवन काटने की अपेक्षा, वीर बहादुर बनने का पैगाम देती है। गुरु जी फरमाते हैं:-----                       ।। चौपाई।। कौम देश दी सेवा करै, ...

गुरु रविदास जी का कथन हिन्दू मुस्लिम का विश्वासः नहीं।

।।गुरु रविदास जी का कथन हिन्दू मुस्लिम का विश्वासः नहीं।। गुरु रविदास जी महाराज, सभी धर्मों को त्याग कर धर्म को पकड़ कर रखने की बात सँगत को समझाते थे। उन्होंने धर्मों और उनके पूजा स्थलों को ठगी, लूटमार, छलकपट, लड़ाई, झगड़े की मूल जड़ बता कर, इंसानियत के खून के काले दस्तावेज ही घोषित किया है। इन्हीं धर्मों व धर्म स्थलों, धर्म के ठेकेदारों के कारण इंसानियत के टुकड़े टुकड़े हो गए हैं, एक दूसरे के घोर दुश्मन बने हुए हैं। भाई, भाई विभक्त हो चुका है, अगर एक भाई हिन्दू है तो दूसरा दुखी होकर मुस्लिम बन गया है, तीसरा क्रिश्चियन और चौथा बौद्ध बन कर आपस में लड़ मर रहे हैं और सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति आदधर्म के साए में जी रहा है, जिस के आगे पीछे चारों धर्म लगे हुए हैं। शाश्वत आदधर्म में कोई भी, किसी भी प्रकार का छलकपट, हेराफेरी, ऊँच-नीच, छूत-अछूत गोरा-काला, स्पर्शय-अस्पर्श्य नहीं है, आदधर्मी एक ही जन्मे है, जब कि चारों मजहब दो जन्में हैं। सभी अपने अपने पूजा स्थलों को श्रेष्ठ और उन के अलग अलग नमूने बनाए हुए हैं ,अलग अलग पहरावे पहन कर, इंसान के रंग रूप में बहरूपिये बने हुए है, इसीलिए स्वामी ईशरदास...

गुरु रविदास जी महाराज और देश सेवा।।

  ।।गुरु रविदास जी महाराज और देश सेवा।। गुरु रविदास जी केवल ज्योतिर्ज्ञानी ही नहीं हुए हैं, वे जन कल्याण, जन सेवा, दुखियों, पीड़ितों और बेसहारों की आवाज भी थे। उन्होंने जहाँ, छलकपट, हिंसा, अत्याचार, अनाचार, शोषण के ख़िलाफ़ जंग लड़ी वहीं उन्होंने भारतीयों को देश सेवा के लिये मर मिटने, देश की सुरक्षा के लिए आत्म बलिदान देने का भी आह्वान किया था, वे केवल मात्र धर्म योद्धा नहीं हुए, वे केवल मंदिरों की शोभा बढ़ाने के नाममात्र देवता नहीं हुए, वे खुद भी और सँगत को भी देश सेवा के लिए प्रेरित करते हैं। मन्दिरों में बैठ कर, शरीर को रंग-कुरंग कर के, इंसान से, बहुरूपिया बन कर सँगत के टुकड़ों पर पलने वालों के खिलाफ थे। वे तो शूरवीर बन कर और अच्छे बुरे समय का मुकाबला करने के लिए, सँगत को अपनी वाणी से जागृत करते थे, उनकी वाणी ही निर्बल को अन्याय के खिलाफ जंग लड़ने का साहस पैदा करती थी। गुरु जी सँगत को निठल्ले बन कर जीवन काटने की अपेक्षा, वीर बहादुर बनने का पैगाम देती है। गुरु जी फरमाते हैं:-----                       ।। चौपाई।। कौम देश दी सेवा करै, ...

गुरु रविदास जी और आदपुरुष कि माया।।

।।गुरु रविदास जी और आदपुरुष की माया।। गुरु रविदास जी महाराज ने, आदशक्ति को ही सर्वोच्च मानते हुए, धरती की रचना और जीव जगत के उन्मेश की जन्मदात्री माना है। सारे प्राणियों को धरती पर सजा संवार कर जीवन दान देकर, उनका संहार का कारण भी खुद बनी हुई है। जहाँ छोटी सी चींटी से लेकर शेर, हाथी और मछली आदि को बनाया है वहीं पर इनका लाभ लेने वाला और इन का संहार करने वाला सर्वश्रेष्ठ, सर्वशक्तिमान मानव भी बनाया हुआ है। आदमी को सभी खूंखार जानबरों का नियंता बना कर प्रकृति को नियंत्रित करने वाला बनाया हुआ है। आदमी को संतुलित रखने के लिए, उस की बागडोर को अपने हाथ में रखा हुआ है, जब आदमी तानाशाह हो जाता है तो, उसे भी नकेल डालने के लिए, खुद मानव का रूप धारण कर के, उस के अहंकार को चकनाचूर कर के रख देता है, फिर भी ना समझे तो पापी को पापी से मरवा देता है। स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 331 पर लिखते हैं कि, आद पुरुष ने ही सारे संसार को कार्यों में व्यस्त कर रखा है:-----                 ।। शब्द आसा।। सभ जग धन्धे लाया हरि ने, सभ जग धन्धे लाया...

गुरु रविदास जी और शूरवीर की पहचान।।

।।गुरु रविदास जी और शूरवीर की पहचान।। गुरु रविदास जी क्रांतिकारी शूरवीर योद्धा हुए हैं जिन का कोई भी, हिन्दू मुसलमान ज्ञानी, ध्यानी साम्य, नहीं कर सकता था, क्योंकि पाठशालाओं और मदरसों में पढ़ने वाले लोग केवल, पूर्वजों की लिखी अतार्किक, मनोवैज्ञानिक पुस्तकों को पढ़ कर, केवल धर्मांध पण्डे, पुजारी और मौलबी ही बनते थे, इसीलिए, इन लोगों के साथ किसी भी प्रकार की धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक चर्चा नहीं की जा सकती थी, मगर इन्हीं अधूरे ज्ञानियों ने गुरु रविदास महाराज के नाक में दम कर रखा था, जिसके कारण गुरु रविदास जी ने अपना शिकार, पोंगापंथियों, तिलकधारियों, पुजारियों, मौलवियों, मुल्लों और राजाओं, महाराजाओं और बादशाहों को ही सब से अधिक बनाया था, इन सबसे वाकयुद्ध करने के लिए, दैवीय शक्ति चाहिए थी, वह केवल उन्हीं के पास थी जिस का उन्होंने कभी भी किसी को अहसास तक नहीं होने दिया था। उन्होंने अपनी मूलनिवासी सँगत को, धार्मिक, मानसिक और शारीरिक रूप से शूरवीर बनाने के लिए प्रेरित  किया और शूरवीरों की पहचान भी बताई है। वे फरमाते हैं कि शूरमा कौन होता है:----   ...

गुरु रविदास जी महाराज और स्वर्ग।

   ।।गुरु रविदास जी महाराज और स्वर्ग।। गुरु रविदास जी, एक क्रांतिकारी, क्रान्तिनायक और समाज सुधारक लौह पुरुष हुए हैं। उन्होंने ब्राह्मणों की तरह विश्व की जनता को स्वर्ग नरक के काल्पनिक ढोंग रच कर मूर्ख नहीं बनाया था। उन्होंने .मानव को मानव बन कर, धरती पर ही सुख पूर्वक जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया हुआ है। गुरु जी ने, मानव के मन में स्वर्ग का लालच और नर्क का भय और नर्क के दुखों का आतंक पैदा कर, तनिक भी मानसिक तनाव पैदा नहीं किया है। स्वर्ग के नाम पर मानव को लूटने से बचाया है और नर्क के भय से निश्चिंत रहने के लिए, अपना दर्शन दिया है। वे स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 641-642 पर स्वर्ग के बारे में बताते हैं:-----               ।।शब्द बघेसरी।। जप नाम बैकुंठ को पाईऐ जी। मानस जनम ना बिरथा गुवाईऐ जी। ऐह समा फेर ना आवेगा। कब मानस जनम धरावेगा। बिन नाम दुख पाईऐ जी। पुंन दान नाम जिन जपिआ। सो बैकुंठ के मध जाई लखिआ। सो जीवन मुकत कहाइऐ जी। बैकुंठ सुगम तउ पावत है। जउ गुर के मारग जावत है। गुर वाक ना मनों कभी भुलाईऐ जी।...

गुरु रविदास जी महाराज और क्रांतिकारी शूरवीर।।

।।गुरु रविदास जी महाराज और क्रांतिकारी शूरवीर।। गुरु रविदास जी एक क्रान्तिनायक, क्रांतिकारी, और सामाजिक परिवर्तन के मसीहा हुए हैं। उन की वाणी ही उनकी सुरक्षा की ढाल थी और खूनी क्रांति की तलवार थी। गुरु जी ने गुलामी की निजात का एक ही मूल मंत्र बताया था और वह था खूनी क्रान्ति क्योंकि जब तक शोषक को शोषण से हटाने के लिए, आत्मबलिदान देने की हिम्मत, साहस आदमी में नहीं आता है तब तक शोषक गुलाम का शोषण करता ही जाता है, जिसे रोकने के लिए प्यार की तलवार कम ही काम करती है, उसे उस की ही भाषा में जबाब देना पड़ता है, जब खून के बदले खून होता है तब अत्याचारी भयभीत हो जाता है, अत्याचार करने से पूर्व वह लाख बार सोचता है कि कहीं मुकाबला हो गया तो, मुझे भी प्राणों के लाले पड़ सकते हैं। लड़ाई की जड़ केवल धर्म ही बना हुआ है और भविष्य में भी, यही खून कत्लोगारद का कारण बना रहे गा, जिससे मुक्ति केवल खून के बदले खून से ही हो सकती है, जिस के लिए मूल धर्म, आदधर्म के लिए बलिदान देने के लिए शूरवीर बनना अति आवश्यक है। गुरु रविदास जी, स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में फरमाते हैं कि :----           ...