गुरु रविदास जी की शिष्या, मीरांबाई को माता का फरमान।।

।।गुरु रविदास जी की शिष्या, मीरांबाई को माता का फरमान।।
गुरु रविदास जी ने, मीरांबाई को, भक्ति मार्ग का रास्ता बताते हुए, रास्ते में आने वाली मुशीबतों और सभी प्रकार की आने वाली रुकाबटों की पूरी जानकारी दे दी थी जिस की सूचना उस की माता को भी मिल गई। माता श्री भी ये सुन कर, बड़ी उद्विग्न हो गई कि, मीरां ने चमार जाति का गुरु बना कर, अपने लिये तो मुशीबतों का पहाड़ खड़ा कर ही लिया है मगर सारे राजपूत समाज के साथ भी दुश्मनी मोल ले ली है। माता श्री का दिल तो मोम होता ही है, चाहे वच्चे कितने ही उच्छृंखल क्यों ना, वे क्यों ना कितने ही अपराध कर दें मगर वह हमेशा अपने वच्चों के भले के लिए ही दिन रात सोचती है, इस कारण मीरांबाई की माता, मीरांबाई को समझाती है, जिस का चित्रण स्वामी ईशरदास महाराज ने, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 569-570 पर बड़ी संजीदगी से किया है:----
                    ।।शब्द पहाड़ी।।
साधां दे ना जा मान तूँ मीरां मेरा कहिणा। लाज काज की डुबिआ डुबोई ना शर्म ना भाई भैंणा। जात चमार जाए रविदास दे फड़या तूँ दिन रात बहिणा। तात भाई तेरे मार देवनगे तैं ना जगत में रहिणा। मात कहे जे कहिणा ना मानियो दुखड़ा घनेरा साहिणा।
मीराँ की माता, मीराँ को समझाती हुई कहती है कि, मीराँ तूँ मेरा कहना मान ले, तूँ साधु संतों के पास जाना छोड़ दे। तूंने शर्म हया को त्याग कर के हमारी नाक काट दी है, तुझे भाई बहनों का डर नहीं है, उनकी इज्जत भी मिट्टी में मिला रखी है।  एक तो तेरे गुरु की जाति चमार, दूसरा दिन रात उन के पास जा कर बैठी रहती है। तेरे पिता और भाई तुझे मार देंगे, तूँ संसार में जिंदा  नहीं रहेगी अर्थात भाईयों द्वारा मीराँ तुझे मार दिया जाएगा। माता, मीराँ को समझाती हुई कहती है कि, अगर तूने कहा नहीं माना, तो अनेकों दुख सहन करने पड़ेंगे। मीरांबाई भी, माता श्री को, समझाती हुई कहती है कि, हे माता! मेरे गुरु जी  कोई साधारण गुरु नहीं हैं, वे तो क्रांतिकारी और दिव्य शक्ति संपन्न आदर्श गुरु हैं। गुरु रविदास जी की स्तुति में मीराँ कहती है।
               ।। शब्द गौउड़ी।।
माता जी मैंनूँ गुरु जी ने जड़ी पलाई है। पीवत पीवत भुल गई तन मन की सभ सुध। चंगे मंदे उच्च नीच खबर ना कोई है। अंदर बाहर ऐको देखां और ना देखां सुदाई है। ऐधर देखां उधर देखां नदर खुदाई है। लाज काज शर्म हया दीन ईमान सभ भुल गए। जब डेरा ऐथे आ के प्रेम ने लाई है। सीना साफ कर, वेख लै चश्म लगाई। जिधर वेखो उधर चश्म रविदास आई है।
मीरांबाई, अपनी माताश्री की बातों को सुन कर, कहती है, माता जी मेरे गुरु जी महाराज ने, मुझे ऐसी जड़ी बूटी का अमृत पिला दिया है कि, मैं उसे पीते समय ही अपने मन की शुद्ध बुद्ध भूल चुकी हूं, मुझे अब कोई भी अच्छे बुरे, ऊँच नीच की कोई होश नहीं है। मुझे अंदर बाहर सब कुछ एक ही दिखाई देता है, जिस के अतिरिक्त और कुछ भी नजर नहीं आता है। मैं चाहे इधर देखूँ, चाहे उधर देखूँ, मुझे चारों ओर गुरु रविदास ही नजर आते हैं। शर्म, हया, दीन, ईमान  सब कुछ भूल गऐ है। अब तो, यहीं पर हम ने प्रेम सहित अपना डेरा जमा लिया है। अपना शरीर और मन साफ कर, आंखों में चश्मा लगा कर देख, माता जी, जिधर किधर देखोगी उधर गुरु रविदास जी ही नजर आएंगे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्तूबर 29, 2020।

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