गुरु रविदास जी और तीर्थ स्थान का ढोंग।।
।।गुरु रविदास जी और तीर्थ स्नान का ढोंग।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, ब्राह्मणवादी सोच, चिंतन और मूक छलकपट को उजागर कर के सत्य के आधार पर जीवन यापन करने का क्रांतिकारी आंदोलन शुरू किया था, जिस ने विश्व को एक तर्कपूर्ण सिद्धांत, नियम, चिंतन के आधार देकर, क्रांतिकारी परिवर्तन करने के लिए आधार बना कर दिए हैं, जिन विचारों ने विश्व के चिन्तकों, विचारकों, समाज सेवकों, धर्म के रास्ते पर चलने वाले धार्मिक व्यक्तियों और राजनेताओं को तर्कपूर्ण दिशा दी है। गुरु रविदास जी के ही सिद्धान्तों के अनुकरण से ही, विश्व के नेताओं ने, समाजवाद और वैश्विक संयुक्त राष्ट्र मंडल जैसी संस्थाओं को मूर्त रूप दिया और उस के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। गुटु जी ने मानवीय एकता के लिए, धर्मों की बाढ़, जातियों की निरर्थकता, ऊँच नीच काले गोरे के भेदभाव को मानव एकता के मार्ग में रुकाबट बताया है। छलों, प्रपंचों के अड्डे भारत में जन्म लेकर, यहीं से समाज सुधार शुरू कर के, वेदों पुराणों की तर्कहीनता को फटकारते हुए गुरु रविदास जी लिखते हैं कि:-----
।।दोहा।।
वेद पढ़ी पंडित बन्यो, गाँठि पनहीँ तो चमार।
रविदास मानुष इक ही, पर नाम धरै हैं चार।
गुरु रविदास जी, भारतीयों के छलकपट को उजागर करते हुए, सामाजिक वैमनस्य को मानव जाति के मात्थे पर कलंक बताया है। विश्व के किसी भी देश में चार वर्ण नहीं हैं, केवल मानव के दो रंग होते हैं, उन्हीं के कारण, गोर काले की दीवार जरूर खड़ी हुई है मगर वह भी इतनी घातक और विनाशकारी नहीं है, जितनी भारतीय वर्णव्यवस्था है। गुरु जी फरमाते हैं कि, वेदों को पढ़ने वाले पंडित बन गए और जूतों की मरम्मत करने वाले चमार। गुरु रविदास जी कहते हैं कि, मनषय तो एक ही है मगर भारत के कपतियों ने उस के नाम चार रख दिये हैं, जिन से मानवता बड़ी शर्मसार हुई है। तेती करोड़ देवी देवताओं की खोज, अठाहसठ तीर्थों की खोज, नवग्रहों को खोज, उन के नाम पर भीख मांग कर, हराम का खाना, ये सब कुछ किसी भी दूसरे डेढ़ में नहीं है। किसी भी देश में नदी स्नान से कोई भी पवित्र नहीं होता, इसीलिए गुरु जी ने इन तीर्थों की, काल्पनिक कथाओं को, केबल मात्र ढकोसले, आडंबर सिद्ध किया है और उन पर तीखा प्रहार किया है। गुरु रविदास जी के इन भावों को, स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 1049-1050 पर लिखते हैं कि:----
।। शलोक।।
अठसठ तीर्थ मंजन करे, मन की मैल ना जाई।तन मन सुचा तउ भयो, गुर का शब्द कमाई।तन कपड़े मैले भए, साबन उदक में धोइए।मन मैल को सो धोवै स्वासां की माला परोइए।साबन गुर का शब्द है, पाणी सतिसँग लाइए।सतिगुरु धोबी धौंबंदा सुरत पटड़े झड़ाइए।
गुरु रविदास जी का एक एक शब्द, क्रांति की चिंगारी है, जिस की व्याख्या किसी भी साधु सन्त और चिंतक ने नहीं की, अन्यथा आज भारत विश्व गुरु बन गया होता। गुरु जी के अनमोल, नियमों और विचारों को, ब्राह्मणों ने दफन कर के भारत को प्रगति के शिखर पर पहुँचने से रोक रखा है। नदियों में स्नान करना, मिट्टी पत्थरों के बने नवग्रहों और काल्पनिक मूर्तियों की पूजा में, भारतीयों को उलझा कर, उन की वैज्ञानिक सोच को भी मिट्टी में दफन कर दिया है। वुरु जी ब्राह्मणों की अठाहसठ तीर्थों की, अमनोवैज्ञानिक खोज, की सत्यता के बारे में फरमान करते हैं कि, ब्राह्मण अड़सठ तीर्थों में नहा कर, शरीर को माँजता है, उस के जल से नहाता है मगर, उस के मन की गन्दगी दूर नहीं आती। इंसान का तन मन तभी पवित्र होता है जब वह गुरु के बताए शब्द की कमाई करता है। शरीर के कपड़ों को साबुन से धो कर साफ किया जाता है मगर मन की गन्दगी को तभी धोया जाता है जब साँसों की माला गले में डाली जाती। अच्छा गुरु ही धोबी की तरह, इंसान को सुरति के पटड़े पर बैठा कर, मन की मेल को धोता है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
नबंबर 23, 2020।
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