गुरु रविदास जी के विरुद्ध राजाओँ के पास विप्रों की शिकायतें।।

।।गुरु रविदास जी के विरुद्ध राजाओँ के पास विप्रों की शिकायतें।।
गुरु रविदास जी महाराज, ऐसे दिव्य पुरुष हुए हैं जिन के समक्ष कोई भी अस्त्र शस्त्र सफल नहीं होता था, हिन्दुओं, मुसलमानों और ब्राह्मणों ने ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर, गुरु जी को नीचा दिखाने का प्रयास किया मगर बुरी तरह ओंधे मुंह ही गिर कर चकनाचूर हुए। आठ साल के बालक रविदास जी के ऊपर निर्दयी, पापी पंडे, तिलकधारियों, ने वह जुल्मोसितम ढाए, जिन्हें कोई पहलवान भी सहन नहीं कर सकता था। गुरु जी ने अकेले ही, मनुबाद और ब्राह्मणवाद का मुकाबला किया था और सभी को पराजित किया था। ब्राह्मणों की जब गुंडागर्दी, गुरु जी का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकी तो, बड़े बड़े मुकद्दमें बना कर, उन्हें राजाओं की अदालतों में बुला कर, कड़ी से कड़ी शर्ते रख कर, परीक्षाएं ले कर, मानसिक रूप से परेशान किया गया। स्वामी ईशरदास महाराज ने, वैश्विक धर्म ग्रँथ, गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 562-563 पर इन शिकायतों का वर्णन किया है:----
                ।।शब्द पहाड़ी।।
विपराँ शिकायतां कीतीयाँ, झाली दर्श गुरां दे चल आई। चितौड़ शहर ते बनारस आई ललाट गुर पद टकाई। विपर साथ वेख भषम होत भये गुरुमंत्र जउ जपाऐ। द्विज निरप के ढिग पिशनी करावन भूपति कोप बधाऐ। मीच के घाट झाली को उतारा सुघड़ सुजान संझाऐ। दुरविदगद नरेश को आखन रविदास बड़ो औलिआऐ। सुअंबर रचा ईहां चरण पुआवो पत्रक झाली नूँ पाऐ। अनोखा कौतुक अदभुत देखो अनूप सिंघासन लाऐ। दास कहे तियूं कीन्ही महीपत रविदास सदवाऐ।
स्वामी ईशरदास जी फरमाते हैं कि, जब ब्राह्मण गुरु रविदास जी महाराज की आध्यात्मिक शक्ति के समक्ष हथियार डाल बैठे, गुरु जी को तनिक भी डरा धमका नहीं सके, तब मिल कर सभी ने चितौड़गढ़ के महाराजा कुंभसिंह को शिकायत पत्र भेजे। जिसे सुन कर गुरु जी की शिष्या रानी झालाबाई बड़ी दुखी हुई और अपने गुरु जी के दर्शन के लिए बनारस चली आई। झालाबाई चितौड़गढ़ से चल कर बनारस आ कर अपना शीश, गुरु रविदास जी के चरणकमलों पर झुक कर, निवाया जिस दृश्य को देखकर, उस के साथ गए, ब्राह्मण ईर्ष्या की अग्नि में जल कर भष्म हो गए। गुरु जी आई हुई, सँगत को गुरुमंत्र देकर, उनसे जाप भी करवा रहे थे, जिससे वे और उद्विग्न होते जा रहे थे। ब्राह्मण अज्ञानी राजा के पास जा कर, चापलूसी करके, रानी के खिलाफ भड़का रहे थे, जिससे राजा का क्रोध बढ़ता जा रहा था। वे राजा को भड़काते हए कह रहे थे कि, महाराज आप इतने सुंदर और सुजान हैं जिन की रानी चमार की सेवा कर रही है, फिर उस के चरणकमलों पर शीश झुका रही हैं, जिसे मौत के घाट उतार देना ही न्यायसंगत है। राजा को भड़का कर, कुविद्या देते हुए बोल रहे थे कि, क्या रविदास ही कोई बड़ा औलिया, अवतार है। गुरु जो को बुलाने के लिए, झाली के नाम पर, झूठा पत्र लिख कर चितौड़गढ़ बुलाया गया, कि यहाँ एक स्वयंबर हो रहा है, जिस में गुरु जी आ कर, आप अपने पवित्र चरणकमल डाल जाओ। चितौड़गढ़ नगर में यह अनोखा कौतुक रचा गया था, जिस में गुरु रविदास जी के लिए एक अनूठा सिंहासन लगाया गया। स्वामी जी फरमाते हैं कि, ऐसा झूठ फरेब कर के राजा कुंभसिंह ने, गुरु रविदास जी को चितौड़गढ़ में छलकपट और धोखे से बुलाया।
                ।। शब्द पहाड़ी।।
जी सँगतां जां होइयाँ कठियाँ श्री गुरु रविदास मध आए। अनेक निरप अनेक विपरन बैठे आ सिंघासन लगाए। असचरज अरू कौतुक देखन कारण पाती लग बठलाए। अरण विपर पिसन बैठो झाली भूप ने आलाए। सालिगराम मंच उरध बुलावे दास निरप सुणवाए।
महाराजा के निमंत्रण पर, गुरु रविदास जी आ गए, जिन के दर्शन करने के लिए, अनगिनत सँगतां आ गईं, जिन के बीच गुरु रविदास जी भी आ गए। अनेकों राजा और असँख्य ब्राह्मण भी, सिहांसन लगा कर विराजमान हो गए। आश्चर्य पूर्ण कौतुक देखने के लिए, हजारों सँगतों को अलग पंक्तियों में बैठाया गया। आग लगाने वाले ब्राह्मण राजा की चापलूसी में व्यस्त थे, जिन के कहने से राजा ने झालाबाई को वापस बुलाया था। राजा ने उठकर, गुरु जी को प्रार्थना की, कि गुरु महाराज, सालिग राम को हीरे मोतियों से सुसज्जित मंच पर बुलाओ।
                ।।शब्द पहाड़ी डूगर।।
करहि विनत भनै ठाकर आ के दर्श दखावो। नर नार विपर आन लागी पाँती तोरी ऊट तकावो। ज्यों धन्ने की धेन चराई वासा बिंजन खाया है। ज्यों गंग मध ते तट में आए नागरमल आजमाया है। रतन जड़त इह मंच है तेरा आके पग टकावो।
अमृत बूंदों तड़फे पपीहा चकवी रजनी लंघावो। सुत महितारी को निहारे कब दीए असीर को। दरद जुदाई वाला जिन्हें मिले तां बंधे धीर को। कर मन मोहन बन्द खलासी अनहद धुंन बजाए। परगट हो के इस सिंघासन धरापी पाती अघावो। शौध नेपथ्या काहे छपियो पग चल आ ऊहां ते यूँ। समूहे सँगत भंवर पाई हुई बजै कारां हूराँ ते तूँ। सपष्ट आसन तेरा सुआमी कदम मुबारक पा दे। लगी ऐ पिआस हर दम दरस उदक पिआवो। रविदास तेरा भवन ऊचा ऊँचे ते  तूँ ऊचा सूचा। नीचाँ ते तूँ ऊचा करहे करुणा तेरी ते सूचा आसां मुरादां सारियां करहि पूरियाँ जो जन तैनूं भाँउँदे। राना दासा अरू सभ आऊ चल ठाकर झाली भी हरखावो।
स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में, गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे आदपुरुष! मेरी बेनती सुन कर ठाकुर भेष धारण कर के, आ जाओ, आ के अपना स्वरूप दिखा दो। आज यहाँ स्त्री पुरुष और ब्राह्मणों की पंक्तियां लग गईं हैं, मैं आप की दया की आस लगा बैठा हूँ। जिस प्रकार आप ने धन्ना जाट की गऊओं को चराया था और उस का वासी भोजन खाया था, जिस समय मुझे राजा नागरमल ने आजमाया था, तब भी आप गंगा से बाहर आ गए थे। आज ये हीरे मोतियों और रत्नों से जड़ा हुआ मंच तैयार किया हुआ है, ये तेरा है और आ कर अपने पैर टिका दो। आज मैं, पपीहे की तरह आप के दर्शन रूपी अमृत बूंदों के लिए तरस रहा हूँ, जैसे चकवी चांद को देखते देखते रात्रि को गुजार देती है, हे आद पुरूष! आज वैसी ही हालत मेरी है। जैसे बेटा माता श्री को देखता रहता है, कब वह आए और उस को दूध पिलाए, वैसे आज मैं आप का इंतजार कर रहा हूँ। जिन को विरह की पीड़ा हो जाए तभी उसे अपने प्यारे के मिलने की आशा होती है। हे मेरे मन! आँख बंद कर के, खलास हो कर बज रही अनहद धुंन को सुंन। हे आद पुरुष! आज यहाँ प्रकट हो कर इस सिंहासन को सुशोभित कर दो। ये महल आप के बिना सूना सूना लँग रहा है, कहाँ छिप गए हो, चल कर पाँव यहाँ अपने पाँवों को टिकाओ। सारी सँगत मुझे, समुन्द्र में भंवर नजर आ रही है, इस भंवर से इनकी रूहों को पार करो। स्वछ आसन लगा हुआ है, ये केवल आप का ही है, आ कर अपने मुबारक चरणकमल रख दो। तुम्हारे दर्शन की प्यास लगी हुई है, आ के अपने दर्शन का पानी पिला दो।  गुरु रविदास बड़ी विनम्रता से पुकार रहे हैं, भगवान तेरा भवन ऊँचे से ऊंचा है, ऊँचे से भी पवित्र है। जो लोग आप को अच्छे लगते हैं, उन्हें आप नीच से उच्च कर देते हो, आप दया और करुणा से उन की सारी आशाओं को पूर्ण कर देते हैं। हे ठाकुर! यहाँ सभी राजा, रंक, दास और गुलाम  आए हुए हैं, झालाबाई सहित इन सब को खुश करो।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्मी मंडल।
अक्टूबर 25, 2020।

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