गुरु रविदास जी की आबरू, आदपुरुष ने रखी।
।।गुरु रविदास जी की आबरू, आदपुरुष ने रखी।
गुरु रविदास जी महाराज की परीक्षा, महाराजा कुंभसिंह की राजधानी चितौड़गढ़ के महल में चल रही थी। गुरु जी अहंकारियों के अहंकार को तोड़ने के लिए, छल कपट कर के भरी सभा में अपमानित करने वालों से, अपनी आबरू की रक्षा करने के लिए, मन ही मन में, भगवान के पास प्रार्थना कर रहे थे। वे मन में ईश्वर का ध्यान लगा कर अरजोई कर रहे थे, कि राजे, महाराजे और ब्राह्मण मेरी इज्जत उतारने पर आमादा हैं, आप ही मेरे सहारे हो, आप ही मेरी नैया को पार लगाने वाले हो, ये सभी मुझ से ईर्ष्या और बैर विरोध कर के मुझे नीचा दिखाने का षडयंत्र रचे हुए हैं, आज फिर आप ही का सहारा है, आ कर मेरी नैया को किनारे लगा दो। गुरु रविदास जी षड्यंत्रकारियों के षडयंत्रों को असफल करने के लिए, निरंकार से अरजोई कर रहे थे, जिस का वर्णन स्वामी ईशरदास जी ने, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 564-565-566 पर बड़े ही सुंदर ढंग से किया हुआ है:----
।।शब्द आसा।।
नाम रटत हत सगले रोग हरि। महीपति के दर द्विज रिस खाए। महां वर दिव्य शोभ सिंघासन बनाए। सालिगराम आए चल मम गोद हरि। जै करवाई द्विज शरमाई। निरप की रानी झाली हरखाई। अनक रविदास कीए द्विज दीए जोग हरि। जागियो पवीत कंचन कराइयो। निज मम को कर हरि दरसाइयो। की गुण कहिए तेरे पुंन पुंन शोध हरि। रविदास गोविंद गुण रट मन मेरे। संकट उद्धार कर अनक हरि तेरे। जपत जपत जाई विकलप सोग हरि।
गुरु रविदास जी महाराज फरमाते हैं कि, राजा के दरवार में, ब्राह्मण ईर्ष्या से जल भुन रहे थे, मगर आप का नाम लेते लेते सभी प्रकार के रोग समाप्त हो गए थे। जब मैं ने, आप जी का ध्यान लगाया था तब वहां बने, दिव्य सिंहासन पर आ कर, आप मेरी गोदी में बैठ गए थे। आप ने मेरी जय जयकार करवा दी थी, जिससे ब्राह्मण बड़े शर्मिंदा हो गए थे। यज्ञ में आप ने ब्राह्मणों के साथ अनेकों रविदास बैठा दिए थे, जिससे यज्ञ को भी पवित्र कर दिया था। आप ने मुझे भी अपने दर्शन दे दिए थे। राजा कुंभसिंह की रानी, झालाबाई ये कौतुक देख कर बड़ी खुश हुई थी। हे आदपुरुष! आप के कितने कु गुणों का वर्णन करूं? जिन का कोई हिसाब किताब नहीं है। गुरु रविदास जी अपने मन को कहते हैं, हे मन! भगवान के गुणों का ध्यान कर, वे तेरे असँख्य दुखों, संकटों को दूर कर के, तेरा कल्याण कर देंगे, भगवान का नाम लेते, लेते सभी रोग, दुख और संताप मिट जाएंगे।
।।शब्द कलँगड़ा।।
मेरी लाली ठाकुर आ के दीनानाथ रख लई। हंकारी बन्दीआं दी आदत तेरे नाम ने रख लई।कसीरा विपर कर फड़ाया। गंगा हाथ कढ उर लाया। कंगन दक्षणा लाया। उहदी चोरी कर रख लई।भूप भूसर बंधाए। कलश कंगन दिलाए। तूँ धंन धंन रघुराई। देख भगत चख लई। सकीम हमरी उठाए। दे अशर्फियाँ भूप राए। विपर वेख कै खुशनाए। भूप दे मारन झख लई। नागरमल रणवास बुलायो। सरूप गंगा मध तरायो। अभिमान विपराँ गुवायो। लीला तेरी परख लई। रविदास ने पुकारा। दसों दिशा जो पसारा।तैनूं तेरा जन पिआरा। जात परख लई।
गुरु रविदास जी की विनम्र अरजोई को आद पुरूष ने तुंरत सुन लिया और आ कर सिहांसन पर विराजमान हो गए, तब गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, दिन दुखियाँ के नाथ अर्थात मॉलिक ने, आ कर मेरी लाली (इज्जत) रख ली। अहंकारियों की गन्दी सोच को आप के नाम नाम ने निगल लिया। ब्राह्मण के हाथ में देकर, गंगा को कसीरा भेजा था तब भी आप ने गंगा को हाथ निकाल कर लेने को विवश कर दिया था, जिसे गंगा ने पकड़ कर छाती से लगाया था। गंगा ने, दक्षणा में कंगन भेजा था जिस की उस ने चोरी कर ली थी मगर फिर भी आप ने उस की उस की रक्षा कर ली थी। राजा ने भूसर अर्थात ब्राह्मण को हथकड़ी से बंधा लिया था, आप ने कलस से निकाल कर उसे कंगन दिलाया था, हे रघुराय आप धन्य है, सँगत ने, ये कौतुक देख कर मेरी भगती देख ली थी। जले भुने ब्राह्मणों ने राजा को भी जान से मारने की सोच ली, मगर राजा ने उन्हें अपने रनवास में बुला लिया और वहां पर,उन्हें गंगा का वही स्वरूप दिखाया जिसे गंगा में तैराया था, जिससे ब्राह्मणों का घमंड टूट गया था, तब भी तेरी लीला परखी गई थी। गुरु रविदास जी ने आद शक्ति की स्तुति करते हुए कहा, कि दस दिशाओं में आप की रचना फैली हुई है, आप को, सच्चा भगत ही प्यारा लगता है, आप ने तब सभी जातियों की परीक्षा ले ली थी अर्थात आप को जातिपाति से कोई भी सरोकार नहीं है, आप के मन को तो केवल, सच्चा सुच्चा प्रेमा भक्ति करने वाला व्यक्ति ही भाता है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्टूबर 26, 2020।
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