गुरु रविदास जी महाराज और स्वर्ग।

   ।।गुरु रविदास जी महाराज और स्वर्ग।।
गुरु रविदास जी, एक क्रांतिकारी, क्रान्तिनायक और समाज सुधारक लौह पुरुष हुए हैं। उन्होंने ब्राह्मणों की तरह विश्व की जनता को स्वर्ग नरक के काल्पनिक ढोंग रच कर मूर्ख नहीं बनाया था। उन्होंने .मानव को मानव बन कर, धरती पर ही सुख पूर्वक जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया हुआ है। गुरु जी ने, मानव के मन में स्वर्ग का लालच और नर्क का भय और नर्क के दुखों का आतंक पैदा कर, तनिक भी मानसिक तनाव पैदा नहीं किया है। स्वर्ग के नाम पर मानव को लूटने से बचाया है और नर्क के भय से निश्चिंत रहने के लिए, अपना दर्शन दिया है। वे स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 641-642 पर स्वर्ग के बारे में बताते हैं:-----
              ।।शब्द बघेसरी।।
जप नाम बैकुंठ को पाईऐ जी। मानस जनम ना बिरथा गुवाईऐ जी। ऐह समा फेर ना आवेगा। कब मानस जनम धरावेगा। बिन नाम दुख पाईऐ जी। पुंन दान नाम जिन जपिआ। सो बैकुंठ के मध जाई लखिआ। सो जीवन मुकत कहाइऐ जी। बैकुंठ सुगम तउ पावत है। जउ गुर के मारग जावत है। गुर वाक ना मनों कभी भुलाईऐ जी। रविदास जनम धन पाया जे। जिन शब्द सुरत कमाया जे। इस जनम को सफल कराइऐ जी।
गुरु रविदास जी महाराज, मानव को स्वर्ग की वास्तविकता के बारे में विस्तार से समझाते हुए फरमाते हैं कि, स्वर्ग इसी धरती पर है, दूसरी जगह पर कोई भी स्वर्ग नहीं है। इसी धरती पर ईश्वर को मन में रख कर, उस का नाम जपते रहो, परम पिता परमेश्वर का नाम जपने से और अच्छे कर्म करने से ही, इसी धरती पर, स्वर्ग मिलता है, इस मानव जीवन को सफल और सुखी बनाना चाहिए, ताकि ये व्यर्थ ना जाए। ये समय, ये जन्म दुबारा नहीं मिलेगा। ये मानव शरीर पुनः कब धारण करेगा, सत्य के मार्ग पर चलते हुए ही सुखी जीवन होगा और वही स्वर्ग होता है, नाम जपने के बिना दुख ही दुख प्राप्त होते हैं। जिन्होंने दान पुंन, जनकल्याण के काम किये होते हैं वही स्वर्ग देखते है और सुखी रहते हैं, उन्हीं का जीवन मुक्त कहलाता है। जो गुरु के बताए रास्ते पर चलते हैं, उन्हें स्वर्ग बड़ी सुगमता से मिलता है, इसलिए गुरु के बताए उपदेश मन से कभी भुलाने नहीं चाहिए। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, ये आप को जन्म धन के रूप में मिला हुआ है, जिन्हों लोगों ने शब्द और सुरति का मणिकांचन योग किया है, उन्होंने ही ये जन्म सफल बनाया है, अर्थात जिन्होंने इसी जन्म को आदर्श बनाया है वही धरती पर स्वर्ग का नजारा लेते हैं।
                ।।शब्द देव गांधारी।।
जिथे हरि नाम जपीऐ सोई बनिआ बैकुंठ धाम है। साध सँगत संग्रह सतिसँग होत जां तिस थां आई राम है। तन मन धन जिन अरपा गुर से ऊहां हरि बसराम है। सोहम शब्द की प्रीत घट माहें सो हरि का तन गाम है। रविदास राम नाम अमल लगाईऐ सच दा ऐहो धाम है।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जिस जगह पर भगवान का नाम लिया जाता है, भगवान को स्मरण किया जाता है, वही स्वर्ग धाम बन जाता है। जिस स्थान पर, साध सँगत इकठ्ठी हो कर सत्संग करती और सुनती है, वहीं भगवान आते हैं, अर्थात जब तुम मन्दिरों में, चो, नालों, शहरों , गांवों से दूर बने सत्संग घरों में जा कर सत्संग करेंगे, सुनेंगे तब तो भगवान भी उसी जगह पर आएंगे, आप के घर में तो आएंगे नहीं, फिर आप की भगती का क्या औचित्य? गुरु जी का कथन है कि, भगवान का ध्यान ही अपने घर में करना चाहिये, वहीं पर शब्द कीर्तन और सत्संग करना चाहिए, तभी निरंकार, आदि शक्ति हमारी गृहस्थ में आएगी अन्यथा, जहां निर्जन जगह पर हम बैठेंगे वहीं उस के चरणकमल पड़ेंगे। जिस जिस घर में, साधक अपना तन, मन धन अर्पित करते हैं, वही आदपुरुष का निवास होता है। जिस के शरीर, आत्मा, मन को सोहम शब्द से प्रेम होता है, वही शरीर भगवान का गाँव बन जाता है। गुरु रविदास जी मानव को समझाते हैं कि, अपने घर पर ही भगवान के नाम का अमल करो, उसी से अपना सत कर्म करते हुए लग्न लगाए रखो, वही सच्चा तीर्थ है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्टूबर 10, 2020।

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