गुरु रविदास जी महाराज और देश सेवा।।

  ।।गुरु रविदास जी महाराज और देश सेवा।।
गुरु रविदास जी केवल ज्योतिर्ज्ञानी ही नहीं हुए हैं, वे जन कल्याण, जन सेवा, दुखियों, पीड़ितों और बेसहारों की आवाज भी थे। उन्होंने जहाँ, छलकपट, हिंसा, अत्याचार, अनाचार, शोषण के ख़िलाफ़ जंग लड़ी वहीं उन्होंने भारतीयों को देश सेवा के लिये मर मिटने, देश की सुरक्षा के लिए आत्म बलिदान देने का भी आह्वान किया था, वे केवल मात्र धर्म योद्धा नहीं हुए, वे केवल मंदिरों की शोभा बढ़ाने के नाममात्र देवता नहीं हुए, वे खुद भी और सँगत को भी देश सेवा के लिए प्रेरित करते हैं। मन्दिरों में बैठ कर, शरीर को रंग-कुरंग कर के, इंसान से, बहुरूपिया बन कर सँगत के टुकड़ों पर पलने वालों के खिलाफ थे। वे तो शूरवीर बन कर और अच्छे बुरे समय का मुकाबला करने के लिए, सँगत को अपनी वाणी से जागृत करते थे, उनकी वाणी ही निर्बल को अन्याय के खिलाफ जंग लड़ने का साहस पैदा करती थी। गुरु जी सँगत को निठल्ले बन कर जीवन काटने की अपेक्षा, वीर बहादुर बनने का पैगाम देती है। गुरु जी फरमाते हैं:-----
                      ।। चौपाई।।
कौम देश दी सेवा करै, करावै। सो नर जगत बहादुर कहावै। ऋषि चेतनानंद कौरु कुल हरारे, शंबूक वीर अमर शहीद होई रखवारे। मूसन पैगंबर कौम दा दर्दी। फरऊन पातशाह फ़ौज लड़ मरदी। रविदास आछूतां लई कष्ट उठाया। थां, विपरां ने झगड़ा लाया। देश दी खातर महात्मा गांधी। जेहल उमर बीत सारी पुंन गोली खादी। देश कौम बदले दशमेश गुरु जी। दिल दे टुकड़े नींहाँ गए बैकुंठ धर जी। लखां ते करोडां शहीद होई आन भी। देश कौम दी खातर गुआई पिआरी जान भी। शरदूल भूप बिन राज कानन बर्बादी। भने दास बिन वहादर होई ना आजादी।
दिव्य गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 354 पर स्वामी ईशरदास जी महाराज के शब्दों में, गुरु रविदास जी, देश प्रेम करने वालों के लिए, एक अद्वितीय मिशाल हैं, जबकि सन्तों महंतों में ये गुण कम ही मिलते हैं। वे तो केवल, सँगत को स्वर्ग नरक के भंवर में उलझा कर ही, अपना उल्लू सीधा करते आए हैं। ये स्वार्थी लोग जन्म मरण के ख़ौफ़ पैदा कर के, सँगत को भ्रमजाल में उलझा कर अपने कर्म से ध्यान हटा कर, कहीं नरक ना मिल जाए, इसी उधेड़बुन में सँगत को लगाए रखते हैं। इन ठगों का सँगत को केवल पूर्व गुरुओं के बनाए गए रास्ते पर चल कर, धन दौलत संग्रह करने का ही, एक मात्र लक्ष्य होता है। 
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, जो लोग अपनी कौम, अपनी जाति, अपनी बरादरी और अपने देश के लोगों की उन्नति के लिए काम करते हैं और दूसरों से भी करवाते हैं, वहीं व्यक्ति संसार में वीर बहादुर होते हैं। महाऋषि चेतनानंद जी ने अपने ज्ञान से, बेईमान कौरव कुल को बुरी तरह से हराया और महाऋषि शंबूक ने छाती तान कर अपने प्राणों की आहुति दे दी मगर वे अत्याचारी के समक्ष झुके नहीं। भले ही शहीद हो गए मगर, अपनी शहादत से, कातिल को विश्व में, घृणित और अपमानित कर गए। पैगंबर मूसा भी कौम की हमदर्दी करता था। पापी बादशाह की फौज फरऊन से लड़ती हुई मर गई। गुरु रविदास जी ने अछूतों के लिए, असँख्य दुख उठाए मगर फिर भी वे निडर होकर ब्राह्मणों का प्रतिकार करते ही रहे। ब्राह्मणों ने उनके रास्ते पर कदम कदम पर रोड़े अटकाए, जगह जगह झगड़े पैदा किये मगर वीर, वहादुर, अजेय, गुरु रविदास जी के समक्ष, वे बुरी तरह से, पराजित और बर्बाद होते गए। महात्मा गांधी ने आयु भर जेल ही काटी मगर अंत में गोली खा कर ही मौत हुई। देश कौम के लिए, दशमेश गुरु ने अपने सपूतों को नींव में चिनवाया, इससे अतिरिक्त भी लाखों, करोड़ों की संख्या में लोग शहीद हुए, जिन्होंने देश, धर्म और कौम की खातिर अपने प्राणों की आहुति दी है। शेर के बिना जंगल की बर्बादी हो जाती है वैसे ही वीर, धीर, वहादुरों के बिना भी आजादी कभी नहीं मिलती है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्तूबर 13, 2020।

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