गुरु रविदास जी और साईँ (आदपुरुष) की अदालतें।।
।।गुरु रविदास जी और साईँ ( आदपुरूष) की अदालतें।।
गुरु रविदास जी ने, विश्व में व्याप्त, छल कपट, बेईमानी, हेराफेरी, अन्याय, अत्याचार, शोषण, कत्लेआम, भयावह युद्ध अपनी आंखों से देखे थे, जिसके कारण, उन्होंने अनुभव किया था कि, विश्व में मॉनवता मर चुकी है, दया मर चुकी है, कोई किसी भी, आदिपुरुख के प्राणी पर तरस नहीं खाता है, बड़ी बेरहमी से, मानव मानव को मूली की तरह कत्ल करता जा रहा था, ब्राह्मणों और मुसलमानों को केवल अपने धर्म ही नजर आ रहे थे, इंसानियत को किनारे रख दिया गया है। तानाशाही का दौर चल रहा था, किसी के पास फरियाद करना अपनी ही मूर्खता थी। कोई भी समाज सुधारक तानाशाही और ब्राह्मणवादी अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का साहस नहीं कर पा रहा था। चौहदवीं शताव्दी के इतिहास को खरोल कर देखा जा सकता है कि, गुरु रविदास जी से पूर्व केवल सतगुरू नामदेब जी ने, हैवानियत के खिलाफ अपने भावों को जाहिर करना शुरू किया था मगर कोई भी संगी साथी ना होने के कारण, वे भी असरदार कदम नहीं उठा सके थे, उन्हें उस समय बल मिला जब, गुरु रविदास जी की शक्ति का लोहा, ब्राह्मण मान कर, पराजित होते गए। गुरु जी ने अपनी क्रांतिकारी सेना में, सतगुरू कबीर साहिब, सतगुरू सदना, सतगुरू सेन, सतगुरु नानकदेव को भी शामिल कर लिया मगर ब्राह्मणवाद और मुस्लिमवाद दोनों ही मिल कर सँगत के नाक में बुरी तरह दम करते ही जा रहे थे। गुरु रविदास जी ने, अपनी वाणी को धार देकर, निर्भय हो कर, जो रचनाएं कीं, उन से समूचे मनुवादियों के किलों में विस्फोट शुरू हो गए। गुरु जी ने मानसिक रूप से, अत्यचारियों को समझाने का प्रयास किया मगर नहीं समझे तब उन्होंने कहा कि, साईं की अदालतों में न्याय अवश्य होगा जिन विचारों को, स्वामी ईशरदास जी महाराज ने, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ साहिब के पृष्ठ संख्या 401-402 पर वर्णन किया है:------
।।शब्द।।
साईं करूगा अदालतां तेरिआं। जो जाहर बातन जुलम करत हैं, लख लख कर हेराफेरियाँ। घट घट के साईं जानणहारा कर लै तूँ, उस ते तां लुकियाँ केहड़ियाँ। रविदास कूड़ के कोट उसारे गिर पड़े सभ ढेरियां। सीर को सीर आब को आब ज्यों कपि अशर्फियाँ तरवर गेरियाँ।
हे बन्दे! जिस प्रकार के तूँ कर्म करता है, फल उसी प्रकार के मिलते हैं, सतगुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, मालिक खुद अदालत में बैठ कर फैसले करेगा। जो लोग लाखों हेराफेरियाँ कर के, सरेआम या छुप कर अपराध करते हैं, उन के मन की प्रत्येक बात को वह जानता है, उससे कौन सी बात छुपी हुई है। श्री गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, चाहे कूड़े कर्कट के कितने ही महलों को बना लो, वह सभी के ढेर लगा देता है। दूध का दूध और पानी का पानी उसी तरह करता है जिस प्रकार बन्दर ने दूध बेचने वाले की अशर्फियों की थैली ले कर, वृक्ष पर चढ़ कर एक सिक्का पानी में और एक धरती पर फेंका था।
।।शब्द सोरठ।।
इह जग वास वसत वहु भांति। मीर कीर दोऊ सुख दुख पाती।कोउ नित मोहन भोजन खावत। कोउ नित साग चदे दा पावत। कोउ घट खाण फट पट तन लावे। कोउ सगल लीर गल पावे। कोउ हुकम मनत कोउ हुकम मनावे। कोउ अश्व बैठ कोउ वाग फरावे। कोउ सेवा करे कोउ सेव करावे। कोउ पेख पेख हरख बाद मचाना। कोउ दाता कोउ भिक्षा मांगे। कोउ तन सेते कोउ तन रांगे। हरखवाद पेख क्या नर कीजे। जैसा कीआ तैसा कोउ लीजे। कबीर करम का बीज जोऊ जो बोईया। तैसा बोईया अंकुर खलोया।
स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में, सतगुरु कबीर जी फरमाते हैं कि, यह संसार अनेक तरीकों से धरती पर निवास करता है। अमीर गरीब दोनों ही सुख दुख भोगते हैं, कोई प्रतिदिन अच्छा भोजन खाते हैं, कोई हररोज चदे का साग खाते हैं। कोई कम खाते हैं, कोई फ़टे पुराने ही कपड़े पहन कर शरीर को ढकते हैं। कोई लीरों को गले में डालते हैं। कोई किसी के आदेश का पालन करते है, कोई आदेशों को मनाते हैं। कोई घोड़े की लगाम को पकड़ कर चलता है, कोई उसी घोड़े के ऊपर सवार हो सवारी करता है। कोई दूसरों से सेवा करवाते हैं, कोई सेवा करते हैं।कोई देख देख कर, खुश होते तो कोई जलते हुए उड़धंग मचाते हैं। कोई देने वाला दाता, तो कोई मांगने वाला भिखारी ही होता है। कोई शरीर को सफेद रखता है, कोई अनेकों रंगों से रंग लेता है।आदमी ईर्षा और वादविवाद क्या नहीं करता है? जैसा कोई करता है, वैसा ही वह ले भी लेता है। सतगुर कबीर जी फरमाते हैं कि, कर्म का जैसा बीज बोया जाता है, वैसे का अंकुर भी वैसा ही निकलता है।
।।छंद।।
सुंन पुरखा अब नारी। गर्भवन्ती गाथा उच्चारी । गर्भवन्ती जपे जे नामा। उसके सुत ना होई कभी बदनामा। गर्भवन्ती सुने धर्म ग्रँथ। उनकी औलाद भगत जां सन्त। गर्भवन्ती सुने शूरवीर कहानी। उनकी औलाद शूरवीर जानी। गर्भवन्ती जम्मे खे खावे। उनकी औलाद छिन विद्या पावे।गर्भवन्ती खाए मिटी मास। उनकी औलाद भुसी जां होई उदास। अब जानत हूँ इह सभै। जैसा बीजे तैसा बढे। आदि प्रकाश में मुक़ा झेड़ा। करमा उत्ते होत नवेड़ा।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे पुरुष! अब नारी के बारे में कथा सुन। यदि गर्भवन्ती आद पुरुख का नाम का जाप करे, तो उस के बेटे कभी अपमानित नहीं होते, जो धर्म ग्रँथों की धार्मिक और सात्विक वाणी सुनती हैं, उनकी सन्तानें भगत और सन्त होते हैं। यदि वह वीर वहादुरों की कहानियों को सुने तो उनके वच्चे शूरवीर होते हैं, जो गर्भवतियां असन्तुलित खाना खाती हैं, उनकी सन्तानें वहुत कम विद्या प्राप्त करती हैं, यदि वह मिट्टी खाएँ तो उन की सन्तानें भुसड़, अल्प बुद्धि, निर्बल और उदास होती हैं। स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि, अब ये सब कुछ तुम समझ गए हो, कि जैसा बीजोगे वैसा ही काटोगे। जो गुरु आदि प्रकाश को पढ़ेगा, उनकी सारी समस्याएं यहीं समाप्त होंगी। कर्मो के आधार पर ही अच्छे और बुरे निर्णय होते है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्टूबर 17,2020।
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