गुरु रविदास की शिष्या "मीराँबाई" कहती गुरुआ जहर को अमृत बना दो।।

।। गुरु रविदास की शिष्या "मीराँबाई" कहती गुरुआ जहर को अमृत बना दो।।
गुरु रविदास जी महाराज, अपने सभी शिष्यों की कड़ी से कड़ी परीक्षा लेते थे। कबीर साहिब, सदना, नामदेब, मीरांबाई को मारने की कोशिश की गई थी, मगर किसी की भी पेश नहीं चली थी। मूलनिवासी कभी भी किसी भी प्राणी की हत्या नहीं करते हैं, जिस के बारे में इतिहास ईमानदारी से बताता है, मगर मनुबाद तो अपनी बेटियों को जिंदा जला कर के सतीत्व की दुहाई देता आया है। मनुवादी बच्चियां जिनको सतीत्व के नाम पर आग में जलाया जाता रहा है, वे भी इस घोर अन्याय के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठातीं थी मगर मीरांबाई, नारी के अन्याय के खिलाफ खुद आगे आई और मनुबाद के मुंह पर जोरदार चांटा जड़ा। मनुवादी क्रूर व्यवस्था के खिलाफ जंग लड़ने के लिए, मीरांबाई ने सिर पर, कफ़न बांधा और ब्राह्मणों की बनाई जाति व्यवस्था को ध्वस्त करने की मिशाल कायम की। मीरांबाई ने जब, जाति व्यवस्था के उपर जोरदार हथौड़ा चलाया तो सारा मनुवाद चिल्लाया मगर गुरु रविदास जी के आशीर्वाद से कोई भी मीराँ का वाल बांका नहीं कर सका। उस के मायके ही अपनी बेटी को झूठी वर्ण व्यवस्था की रक्षा के लिए, मीराँबाई को मारने के लिए जहर देने पर आमादा थे, जब उस के भाई ने उसे जहर का प्याला तलवार की नोक पर हाथ में थमा दिया तब पीते पीते मीरांबाई, गुरु रविदास जी को स्मरण करती हुई, स्वामी ईशरदास महाराज के शब्दों में कहती है, जिस का वर्णन गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 571-572 पर बड़ी मार्मिकता से किया है:----
                ।।शब्द जिला।।
मेरा पिआला जहर दा भरिआ, अमृत करदे सत गुरुआ। मैं तेरी ओट तकाई। बैरी वण गए तात ते माई। लिआऐ पिआला आगे धरिआ। मैं सी तेरे नाम नूँ जपदी। तेरी मूरत आगे धरदी। इह जग वेख वेख के सड़िया। लोकी कहिन्दे जात चमार।मैं तां जाणिया तुंसी अबतार। गंग मध दो मन पथर तारिया। विपर करदे सभा तों बाहर। वणे रविदास कई हजार। झाली भूप ने जग करिया। मैंनूँ मरने दा ना शोक। मर जावां मिले परलोक। अगे भगती नूँ सभ डरिया। मीरांबाई तेरा लड़ फ़ड़िया।
जब मीरांबाई का भाई जहर का प्याला पीने के लिए विवश करता है, तब मीरा विलाप करती हुई गुरु रविदास जी से अर्ज करती हुई कहती है कि, गुरु जी मेरा प्याला जहर से भरा हुआ है, जिसे गुरु महाराज अमृत बना दो। मैं ने आप का सहारा ढूँढा था, जिस से माता पिता सहित सभी दुश्मन बन गए हैं, उन्होंने मुझे शहीद करने के लिए, मेरे मुंह के पास जहर रख दिया है। मैं तो आप की तस्वीर सामने रख कर, आप का नाम ही जप रही थी, जिसे देख देख कर सारा संसार जल उठा है। लोग तो आप को चमार कहते हैं, मगर मैं तो आप को केवल सर्वश्रेष्ठ अवतार ही समझती हूँ, आप ने गंगा के जल में दो मन का पत्थर तार दिया था। जब रानी झालाबाई और महाराजा कुंभसिंह ने यज्ञ किया था, तब मूर्ख ब्राह्मणों ने आप को सभा से बाहर कर दिया था, जिस के बाद आपने विराट स्वरूप धारण कर के, कई हजार रविदास बना दिए थे। मुझे मरने का कोई गम नहीं है, मैं तो मरने के बाद शहीद ही कहलाऊंगी मगर भविष्य में लोग भक्ति करने से डरने लगेंगे। मीरांबाई, गुरु रविदास जी के पास ये दुहाई करती हुई कहती है कि, मैं ने आप को आदर्श गुरु के रूप में अपना कर, आप का लड़ पकड़ा था, जिस के कारण आज प्रलय का समय आ गया है।
मनुवादी इतने काफर हैं कि, इन्हें भगवान से भी डर नहीं लगता है, जब कि भगवान किसी को माफ नहीं करता है। इतिहास को खोल कर देख लो, किस प्रकार अत्याचारी लोग तड़फ तड़फ कर मरते आए हैं, किस प्रकार पापी, निर्दयी क्रूर बादशाह, सम्राट और तानाशाह मारे गए, कई तो बमों से उड़ाए गए, कई गोलियों से मारे गए, कई फांसी पर लटकाए गए, कई तलबारों से कत्ल किये गए  थे। वीरांगना मीरांबाई के अत्याचारों से सबक ले कर, जातिपाति, ऊँच नीच को त्याग कर, सभी को आदर्श इंसान बनना चाहिए।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्टूबर 31, 2020।


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