गुरु रविदास जी महाराज और मीरांबाई का वैराग्य।।

।।गुरु रविदास जी और मीरांबाई का वैराग्य।।
गुरु रविदास जी महाराज के अलौकिक उपेदश को सुन कर, मीरां संसार से पूर्णरूपेण विरक्त हो गई। अपने मनःस्थिति को स्पष्ट करते हुए, गुरु जी को विश्वासः दिलाते हुए मीरांबाई उन के प्रति अपनी आस्था बताती हुई, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 568-569 पर, स्वामी ईशरदास जी के शब्दों में कहती है:---
             ।।शब्द शाम कल्याण ।।
समझ लिआ जग कूड़ दिसदा। भैंण भाई अंग संग साक कौण किसदा। छुट गए झूठे पिआर गुरुआ। भेद पाया सिरजण हार गुरुआ। गुरु बिन जग में ना और दिसदा। अंत के बेले ना सहाई कोई है। शब्द गुरु बिन हैं ना कोई ढोई। पाएगा मरतबा प्रेम जिसदा। प्रेम वाली डोर हुण नहीं टुटदी। अमली अफीम मुशकल छुटदी। भरिया प्रेम पियाला कौण कहिदे विषदा। श्री रविदास गुरु ना बिसारियो। मिल गया खैर तेरे दरबारियों। तुझ बिन बाली कौण रूह इसदा।
मीरांबाई, गुरु रविदास जी के समझाने बुझाने के उपरांत, गुरु जी को विनम्रतापूर्वक कहती है कि, गुरु जी मैं समझ गई हूं कि, ये सारा संसार कूड़ा कर्कट ही है। बहन भाई आक साक अर्थात सगे संबधी कोई भी किसी का नहीं है। अब आप के सानिध्य से गुरु जी, सांसारिक प्यार खत्म हो गए हैं, हे दुनिया के सृजन करता गुरु जी! मैं ने सारे भेद, भी समझ लिए हैं, सारे रहस्य समझ गई हूं। मुझे गुरु के बिना कोई भी संसार में दिखाई नहीं देता है। जब मेरा अखीरी समय आएगा तब कोई भी सहायक नहीं होगा। गुरु जी आप की शिक्षा  के बिना कोई बेली वारिश नहीं होगा, किसी के पास शरण नहीं मिलेगी। प्रेम का श्रेष्ठतम रुतवा उसी को मिलेगा जो गुरु जी से प्रेम करेगा। गुरु जी मेरी प्रेम की डोरी है, अब कभी नहीं टूटेगी। जिसे अफीम का नशा चढ़ जाता है, वह कभी खत्म नहीं होता है। प्रेम के भरे प्याले को विष का प्याला कौन कहेगा। मैं तो गुरु जी आप को कभी भुला नहीं सकती हूं, मुझे आप के दरबार में भिक्षा मिल गई है। आप के बिना मेरी आत्मा का कौन रक्षक है? गुरु रविदास जी के अतिरिक्त कोई भी किसी का सहारा नहीं है।
वास्तव में ही, हम मूल भारतीयों का गुरु रविदास जी महाराज के अतिरिक्त कोई भी बाली, सहारा नहीं है। गुरु रविदास जी ने ही गुरुओं की मंडली तैयार की थी, जिस में सतगुरु कबीर साहिब जी, सतगुरु नामदेव जी, सतगुरू सेन जी, सतगुरू सधना जी शामिल थे। हमें आज इन्हीं गुरुओं को अपना गुरु मान कर, अपने अपने घर पर रह कर  ही सोहम नाम का हंस प्राणयाम करना चाहिए और इसी पवित्र शब्द के जाप करते हुए ध्यान लगा कर, हमें आत्मिक शुद्धि करके, जीवन को सुखमय बनाना चाहिए, किसी भी अधूरे बाबे की शरण में जाने की कोई जरूरत नहीं है, हमें केवल गुरु रविदास जी की मूर्ति के समक्ष, अर्ज कर के यही कहना काफी है कि, कि आप ही को मैं अपना गुरु धारण करता हूं या करती हूँ। आप ही मेरे गुरु हैं, आप के सिवाए मेरा कोई दूसरा पीर, पैग़ंबर और औलिया, नहीं है।
मीराबाई, वास्तव में ही एक वीरांगना स्त्री हुई है। जिस अंधकारमय युग में वह हुई है, वह विधवा नारी के लिए काला युग था। भारत की राजपूत जाति ब्राह्मणों के, अमानवीय कानूनों की क्रूरता को नहीं समझ पाती थी, कि किसी औरत को, जिंदा क्यों जलाया जाए? औरत भी मनुस्मृतियों के काले नियमों को अपना श्रेष्ठ धर्म मॉन कर, आत्मबलिदान करने में ही अपनी श्रेष्ठता और सम्मान समझती थी। मीराँ ने, मनुस्मृतियों का जनाजा निकाल कर, नारी की मुक्ति की लड़ाई लड़ी जिस का नेतृत्व गुरु रविदास जी ने किया था, गुरु जी के कुशल नेतृत्व में वह जीती और राजपूतों की भी आंखें खोलीं, जिस के कारण मीराँ इतिहास में नारी की सर्वोच्च अवतार बन गई है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्म मंडल।
अक्तूबर 28, 2020।

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