गुरु रविदास जी का जगननाथ पुरी कौतुक।।
।। गुरु रविदास जी का जग्गनाथ पुरी कौतुक।।
गुरु रविदास जी महाराज अवतरित ही भारत के मूलनिवासियों के दुखों को दूर करने के लिए हुए थे। भारत के मूलनिवासी मनुस्मृतियों के काले कानूनों के कारण नारकीय जिंदगी जी रहे थे। मनुवादियों के साथ बैठकर खा पी नहीं सकते, उन के साथ विवाह-शादी नहीं कर सकते, एक कुएं से इकठ्ठे पानी ना तो भर सकते, ना ही पी सकते, जबकि उनके अछूत हाथों से उगाया गया अनाज खा जाते, उन के द्वारा घड़े में भरा हुआ पानी पी जाते, मंदिर में चढ़ाया हुआ धन डकार जाते। मनुवादियों के साथ, अछूत छू तक नहीं सकते थे, उनके सामने ऊँचे स्थान तो क्या, यहाँ तक कि उन के सामने अपनी चारपाई पर भी बैठ नहीं सकते थे, गेहूं, चने, चावल और दूध आदि स्वास्थ्य वर्धक अनाज तक खा नहीं सकते थे, जमीन तक के मालिक नहीं बन सकते थे। इन्हीं अत्याचारों और शोषणों से निजात दिलाने के लिए ही, गुरु रविदास जी ने विराट स्वरूप धारण किया हुआ था। एक दिन वे जग्गनाथ पुरी मंदिर में चले गए, जिस का वर्णन स्वामी ईशर दास जी महाराज ने गुरु आदिप्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 447-449 में इस प्रकार किया है:----
।।शलोक।।
बिकर्मी चौदह सौ अठत्तरे श्री गुरु रविदास। मेले जग्गनाथ दे कीआ नाम प्रकाश। फिरदे फिरदे गुरु जग्गनाथ गए आई। ढिढिआ मेला लगिआ अछूत दूर बैठाई। लैंवण चढ़ावे पांडे, बाहमन रखण दूरो दूर। देखिआ रविदास ने पुजारी गए मगरूर। बकत शाम दा आ गया आरती लगी होंण। थाली दीवे जगाई कर पण्डे लगे खलोंण।अछूत बठाले ऊहां जहाँ आरती सुनी ना जाई। विचे गुरु रविदास है कौतुक नया दिया बखाई।
बिकर्मी सम्मत चौदह सौ अठहत्तर को गुरुओं के गुरु रविदास जी महाराज, श्री जग्गनाथ जी के मंदिर जग्गनाथ पुरी के मेले को देखने आ गए, जिससे मेले में अद्वितीय रोशनी हो गई। गुरु जी ने मेले में देखा कि, अछूतों को दूर एक कोने में बैठाया गया है। ब्राह्मण उन से चढ़ावे तो ले रहे थे मगर मंदिर से दूरों दूर रख रहे थे। गुरु रविदास जी ने अनुभव किया कि पुजारी घमण्डी हो गए हैं, इनकी आंखों में जातीयता की चर्बी चढ़ गई है। जब शाम का समय आ गया और आरती की तैयारी होने लगी, पण्डे पुजारी, दीवे जला कर आरती के लिए खड़े होने लगे। अछूतों को वहां बैठाया गया, जहाँ से आरती सुनी ही नहीं जा सकती थी, इसी बीच गुरु रविदास जी ने, एक नया और अजब कौतुक रच दिया।
।। त्रिभंगी छंद।।
गल आरती दी सुन रहे, भील सी खलोई के। दसदे ऐ हाल अपना सी रोई के। लैंदे पंडे पूजा सातों धो मांज आण के। मंदर कोलों रखन सानूं दूर जाण के। जग्गनाथ मूर्ति ना दर्श कदे असीं पा लिया। भीलां दी अरजोई गुरां लई सुण जी। तुसां पास जग्गनाथ उठ के आ जाऊ हुण जी। कर लओ पूजा मन चित लाई के। हुण सब बैठ जाओ जग्गनाथ पास आई के।
जब गुरु रविदास जी ने आरती की बात की, तो भील बड़े खुश हुए और खड़े खड़े ही सुनते जा रहे थे। वे गुरु जी को आप बीती रो रो कर बता रहे थे। वे फरियाद कर रहे थे कि, ये पंडे हमारी पूजा साफ कर कर के, मांज मांज कर ले लेते हैं मगर जग्गनाथ जी की मूर्ति के दर्शन कभी करने नहीं देते। गुरु जी ने भीलों की अरज व अरदास सुन ली, गुरु जी ने बताया, जग्गनाथ अभी आप के पास आ जाएगा। आप चुपचाप बैठ कर, मन चित लगा कर, अर्थात शब्द सुरत को एक कर के, ध्यान लगा कर आरती करो।
।।आरती त्रिभंगी छंद।।
जदों अपनी आरती गुरां ने उच्चारी ऐ। ऐथे भी बखाली ते शक्ति भारी ऐ। चंद परिवार वांग घेरा भीलां पा लिया। आरती दा पाठ गुरां ने सुना लिया। सभनी प्रेम नाल पाठ गा लिआ। बल्ल पये सी दीवे उथे आ अघंम दे। आ के आदपुरुष खुद थाल थंमम दे। करदे आरती भील हाथ जोड़ जो। हजारां ते लखां दे हटाए कोहड़ जो। सुण के तां आरती राजा भी आप आ गया।
जैसे ही गुरु रविदास जी महाराज ने, नाम तेरो आरती भजन मुरारे--गाना शुरू कर दी, वैसे ही उन्होंने अपनी दैवी शक्ति को भी दिखाना शुरू कर दिया। सभी भीलों ने गुरु जी को वैसे ही घेर लिया, जिस प्रकार चांद को गगन के सारे नक्षत्र घेरा डाल लेते हैं। भीलों के साथ खड़े खड़े ही, गुरु रविदास जी महाराज ने, उन के साथ मिल कर आरती गाई। गुरु जी की दिव्य आरती शुरू होते ही, वहां अलौकिक दीवे स्वयं ही जल उठे, जिस के थाल को स्वयं आदपुरुष ने थाम रखा था। बेचारे भील हाथ जोड़ कर आरती कर रहे थे, जिस से लाखों, हजारों लोगों का कोहड़ भी ठीक हो गया।
।। शब्द मेघ।।
जदों पंगती आखीर दी आखी श्री गुरु रविदास जी। नठी मूरति मदरों जग्गनाथ दी गुरां दे तां आ गई पास जी। हाथ जोड़ के मूरति है बोलदी रखो मैनूं बुला कर सदा दास जी। उस मंदर दे विच नहीं रहणा करो मेरा ऐथे वास जी। पंडे रहि गए करदे आरती, अख खुली तां हो गए निरास जी। किसी सयाने उचारा पै जाऊ सरनि उन्हां दी जाई के, जेहड़े रविदास जी। बाहमन पंडे सारे चल आए भुल चुक करो माफ जी। उथे चढ़ गए चढ़ावे लखां भीलां दी तोड़ी फास जी। बनाया मंदिर जहाँ आई मूरति, फुल बरसाए आकाश जी। पुजारी कीते भील जग्गनाथ दे, पूरी कीती गुरां आस जी।
इधर जब गुरु जी ने, आरती की अंतिम पंक्ति गाईं, उधर जग्गनाथ की मूर्ति भागती हुई, गुरु जी के पास आ गई, मूर्ति हाथ जोड़ कर गुरु जी से बोलने लगी, महाराज मुझे हमेशा के लिए ही अपने पास रख लो, मैं उस मंदिर में नहीं रहना चाहती हूं, मेरा यहीं निवास कर दो। पंडे आरती करते ही रह गए, जब पण्डों ने आँखें खोली तो बड़े निराश हो गए। किसी बुद्धिमान ब्राह्मण ने कहा, अगर आप अपना कल्याण चाहते हो तो गुरु रविदास की शरण में जा कर गिर जाओ। सभी ब्राह्मण और पण्डे दोनों हाथ जोड़ कर, गुरु जी के पास दौड़े आए और भूल चूक माफ करने की अरजोई करने लगे। ज्यों ही गुरु रविदास जी की दैवी शक्ति के कारण, मूर्ति भीलों के पास हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई, त्यों ही वहाँ लाखों रुपये चढ़ावा चढ़ गया। गुरु जी ने भीलों की गुलामी का फंदा तोड़ दिया। जहां मूर्ति आ कर खड़ी हो गई थी, वहीं पर पुनः श्री जग्गनाथ का मंदिर बनवाया गया है। गुरु रविदास जी ने उस नए मंदिर के पुजारी भी भील ही नियुक्त किए। गुरु रविदास जी की आलौकिक शक्ति का लोहा सारी दुनियाँ मानती आई है मगर हिंदुओं, सिखों को, गुरु जी की जाति की घृणा ले डूबी है, जिस के भविष्य में बड़े गहरे आघात सहने पड़ेंगे।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अक्तूबर 20, 2020।
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