गुरु रविदास जी और साधु का पारस धातु।

।।गुरु रविदास जी और साधु का पारस धातु।।
गुरु रविदास जी को, मनुवादी केवल अनपढ़ चमार ही समझते रहे, क्योंकि अछूतों को पढ़ने लिखने सत्संग करने, कराने का कोई मौलिक अधिकार था ही नहीं जिस के कारण इन मूर्ख, अंधविश्वासी तिलकधारियों ने उन को सत्पुरुष, ज्योतिर्ज्ञानी, की मान्यता कभी नहीं दी। गुरु जी अपनी  क्रान्ति की ज्योति ले कर अग्निपथ पर निरन्तर चलते ही रहे। गांव गांव डेरा डाल कर कुछ दिन वहां रुकते फिर आगे चल देते। ऊँच नीच, छुआछूत, छोटे बड़े, अमीर गरीब, जात कुजात, श्रेष्ठ पतित, वर्ण अवर्ण की दीवारों को ध्वस्त करते हुए, अपने विजय रथ को हांकते हुए कन्याकुमारी से ले कर ईरान इराक तक निरन्तर सफर जारी रखा, जिस के सबूत जगह जगह पर बनी हुई, उनकी स्मृतियाँ आज भी मिलती हैं। एक बार गुरु जी दिल्ली के समीप महिपालपुर ठहरे हुए थे, कि वहां एक साधु गुरु जी के दर्शन करने आ गया। अपनी विद्वता, श्रेष्ठता, जातीय अहंकार और ज्ञान को दर्शाते हुए, उस ने गुरु जी को एक पारस धातु दिया और कहा कि, ये आप रख लो, बुरे और बदहाली के समय, आप इससे सोना बना लेना। गुरु जी ने पारस को लेने से इन्कार कर दिया मगर साधु, पारस धातु को गुरु जी की विश्राम स्थली की छत से लगा कर चला गया। स्वामी ईशरदास जी महाराज, दिव्य गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 558-559 पर वर्णन करते हैं:---
              ।।शब्द जिला ताल ३।।
लै जाऊ सन्त जे पारस तुमारा। इस दौलत लख तस्कर चुरावत। नाम धन राखे कोउ निकट ना आवत। जिन मोद होत दातारा। रमापति ने तब रब्बी रंग पाया। लोहे ते कंचन कर दुख लाया। संत कहे रख अमानत हमारा। तेहरवें मास पुनः संत चल आए। पारस की तब बात बतावे। श्री रविदास ने पुकारा। जहाँ तुम राखत भये उन्हां ही होवत। राखी करत दिन रैन फिकर खोवत। संत अमान ना लजारा।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे सन्त जी! ये पारस आप का है, इसे ले जाओ। इस धनदौलत को चुराने वाले लाखों चोर हैं। जो लोग राम नाम रूपी धन इकट्ठा करते हैं, उस धन को चुराने के लिए कोई समीप नहीं आता है, जिस के पास नाम धन होता है, उस से दाता अर्थात करतार प्रसन्न होते हैं। ईश्वर जब अपना रव्वी अर्थात ईश्वरीय रंग लोहे को लगा कर सोना बनाता देता है, तब उसे अनेकों दुख लग जाते हैं। सन्त गुरु जी को पारस अपने पास रखने के लिए वहुत जोर डालता है, और कहता है, महाराज! आप हमारी धरोहर पारस रख लो, जब गुरु रविदास जी ने पारस को छुआ तक नहीं, तब वह पारस को गुरु जी की पवित्र धर्म स्थली की छत में छुपा कर चला गया था मगर जब तेरह मास के बाद वह साधु वापस आया तो, तो वह पारस के बारे में, गुरु जी को पूछता है। गुरु जी ने कहा, जहाँ तुम रख कर गए वहीं होगा। इस की चौकीदारी करते करते, हमें चिंता लगी रहती थी कि कहीं गुम ना हो जाए। साधु गुरु रविदास जी के ईमान की बातें सुन कर बड़ा लज्जित हुआ।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदिधर्म मंडल।
अक्टूबर 22, 2020।

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