गुरु रविदास जी और आदपुरुष कि माया।।
।।गुरु रविदास जी और आदपुरुष की माया।।
गुरु रविदास जी महाराज ने, आदशक्ति को ही सर्वोच्च मानते हुए, धरती की रचना और जीव जगत के उन्मेश की जन्मदात्री माना है। सारे प्राणियों को धरती पर सजा संवार कर जीवन दान देकर, उनका संहार का कारण भी खुद बनी हुई है। जहाँ छोटी सी चींटी से लेकर शेर, हाथी और मछली आदि को बनाया है वहीं पर इनका लाभ लेने वाला और इन का संहार करने वाला सर्वश्रेष्ठ, सर्वशक्तिमान मानव भी बनाया हुआ है। आदमी को सभी खूंखार जानबरों का नियंता बना कर प्रकृति को नियंत्रित करने वाला बनाया हुआ है। आदमी को संतुलित रखने के लिए, उस की बागडोर को अपने हाथ में रखा हुआ है, जब आदमी तानाशाह हो जाता है तो, उसे भी नकेल डालने के लिए, खुद मानव का रूप धारण कर के, उस के अहंकार को चकनाचूर कर के रख देता है, फिर भी ना समझे तो पापी को पापी से मरवा देता है। स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रगाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 331 पर लिखते हैं कि, आद पुरुष ने ही सारे संसार को कार्यों में व्यस्त कर रखा है:-----
।। शब्द आसा।।
सभ जग धन्धे लाया हरि ने, सभ जग धन्धे लाया है। साधु संत ग्रैहि महंत समूह पंथ आदि लओ।करदे कीरत विरत निज आहार की वाणी नाम जपाया है। मीर वजीर फकीर अमीर शहनशाह ते रंक सभी सुबह शाम तक कार करत हिसा धंधा बनाया है। कीटी कीड़म जंगम भुजंगम करँगम बिहंगम गन गने, जलचर नभचर सरिता सिंध निज निज पेट भराया है। सभ जग धन्धे माहे फसिया धंधा धंधा सभै कहे, रविदास विरला प्रेमी नाम तेरा लिव लाया है।
स्वामी ईशरदास जी महाराज के शब्दों में गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, आदपुरुख ने सारे विश्व को किसी ना किसी काम में लगाया हुआ है। साधु, सन्त, महंत और गृहस्थी सहित किसी ना किसी धन्धे के साथ जोड़े हुए हैं। उसी ने ही सभी को अपने अपने आहार के लिए, कोई ना कोई हस्तकार्य दिया हुआ हैं और अपना नाम भी जपाते हैं। भगवान ने ऐसा काम शुरू किया हुआ है कि, मीर, अमीर, बजीर, फकीर, राजा और रंक और बादशाह सुबह से शाम तक काम करते हैं। कीड़े मकोड़े, जंगलों में निवास करने वाले पशु, पक्षी जल में रहने वाले, धरती, आकाश, नदियों और सागरों में रहने वालों का पेट भरने के लिए, भूख मिटाने के लिए साधन बनाए हुए हैं। सारा संसार धन्धे के बीच उलझाया हुआ है, सभी लोग काम काम कहते हैं, गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि कोई बिरला ही है जो आदपुरुष से लगन लगाए हुए है, क्योंकि सारा संसार धन्दे में ही उलझा हुआ है। गुरु जी समझा रहे हैं कि, आद के साथ लगन लगाओ, उस के अतिरिक्त कोई भी, आप को प्यार करने वाला नहीं है।
।। शब्द भैरुँ।।
आद पुरूष ते अभ कुझ होया। आद का डंका सगली समोया। गगन पतालां दा तूँ दाता।सभ जीव धन्धे लाया डाटा। सभ जीव धन्धे लाया विधाता। बिन भिन जूनी खले खिलाया। सभ के दिल खुद समाया। आद ते काल इक बूंद लिआया। उस तों लख करोड़ जून वणाया। मन्त्र आदि बिंना ना छूटे। झूठी रचना गियो मध लूटे। सुन जीव आद का मंत्र पढ़ तूँ।काल जाल से छिन ना डर तूँ। जातपात कई मजहब बनाये। आदि अजात ना मजहब कहाऐ। आद बिंना ना दुआ जानीं। आद को छोड़ नरक नशानी। आद की वाणी निशदिन गाईं। अंतक वेले मोक्ष पाई।मोक्ष का इह मारग सच्चा। आद बिंना है सभ आवा कच्चा। कचे ते सो पक्का होया। आद का मंत्र कंठ परोया। रविदास आद ना खिंन खिंन बिसरे। सिमरन कर मिल जाऊ गे बिछड़े।
गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि,आदपुरुष से सब कुछ उतपन्न हुआ है। आदि की ध्वनि सारे जीवों में समाई हुई है। आदपुरुष ही धरती आकाश को बनाने वाला है उसी ने सभी को काम पर लगाया हुआ है। भिन्न भिन्न योनियों के जीवों को खाना खिलाता है और सभी के दिलों में समाया हुआ है। काल, आदपुरुष से एक बूंद लाया था, उसी से ही लाखों योनियों के जीवों की उतपति हुई है, इसी लिए आदि के बिना मुक्ति संभव नहीं है। जीव! मन की झूठी और स्वार्थी इच्छाओं को उतपन्न कर के संसार में, बुरी तरह से लूटा जा रहा है। हे जीव! सुन, तूँ आदि को ही याद कर। मृत्यु के जाल से क्षण भर के लिए भी भयभीत मत हो। मूर्खों ने जातपात और अनेकों मजहब बना हुए हैं, कोई भी आदि के बनाए हुए मजहब नहीं हैं। आप आदपुरुष के बिना किसी दूसरे को सृष्टि का जन्म दाता मत समझो, सभी उसे छोड़ कर ही दुखों को प्राप्त होते हैं। जो जो आदि की वाणी हररोज स्मरण करते हैं, अंत समय वे सुख पूर्वक मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उन्हीं की ही अच्छी मुक्ति होती है। यही अच्छे कर्म करना ही सुखी जीवन का रास्ता है, आदि के बिना सारे काम अधूरे हैं अर्थात उस के बिना कुछ भी संपूर्ण नहीं होता है। जिस जीव ने आदि को याद रखा, बार बार उस का ध्यान लगाया, वही कच्चे से पक्का हुआ अर्थ दुखों से छुटकारा प्राप्त कर के सुखों को प्राप्त करता है। गुरु रविदास जी फरमाते हैं कि, हे जीव! आदि को याद करने से वे मिल जाएंगे, इसीलिए एक क्षण भर के लिए भी उसे बिसारने का प्रयास मत कर।
।।छंद।।
जात वरण को पूछत नाहीं, ना हिन्दू ना तुरका। साध ब्राह्मण ना ग्रैहि राजा नर मदीना फुरता। करे अमल चंगेरे सोई चंडाल डूब उजरता। दरगाह दे बिच पुछ उन्हां दी, जो भजन करे ठाकर दा।
स्वामी ईशरदास जी महाराज फरमाते हैं कि, हे मानव! कोई भी जाति और वर्ण को नहीं पूछता है, ना ही कोई हिन्दू और मुसलमान है। ना ही कोई साध और ब्राह्मण है, ना ही कोई जन्मजात राजा है और ना कोई नर है ना ही मुदीन है। जो आद को स्मरण करता हुआ, दिन रात केवल अच्छे कर्म करता है, वहीं चंडाल वर्ण से उभरता है। भगवान का नाम जपने वालों की ही, दरगाह में इज्जत होती है, यही आदपुरुष की माया है, जिस ने सभी जीवों को अनेकों, काम धंधों में व्यस्त किया हुआ है।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्मी मंडल।
अक्तूबर 12, 2020।
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