गुरु रविदास जी के समय विश्व में भारी जुलम।।

।।गुरु रविदास जी के समय विश्व में भारी जुलम।।
गुरु रविदास जी महाराज के समय से पूर्व भारत कत्लगाह बना हुआ था। शुद्र और नारी तो कहीं भी, कोई दलील अपील के अधिकारी नहीं थे। दोनों को हर क्षेत्र में बलि का बकरा बनाया हुआ था, मनुवादी मुस्लिम शासकों के साथ मिल कर, शूद्रों और नारी के ऊपर अथाह अत्याचार करते थे, शूद्र दिन रात, पशुओं की तरह काम करते थे मगर भूख मिटाने के लिए, भरपेट भोजन तक  नहीं दिया जाता था, नारी को भी भोग विलास की सामग्री समझा जाता था, पति की मृत्य पर, औरत को जिंदा जला दिया जाता था, नाम उसी औरत का लिया जाता था कि, वह खुद ही जौहर कर रही हैं, मगर हिन्दू खुद ही ढोल, नगाड़ों और घण्टियाँ की जोरदार आवाज के बीच उस नारी की चीखों को मंद कर के बड़ी बेरहमी से जला दिया करते थे, ऐसे थे, भारत के मानवतावादी ब्राह्मण। जलती चिखाओं की चीख़ें, भूख से कराहते गरीब शूद्रों की आवाज, आदपुरूष के घर सुनाई पड़ी, जिससे उस का सिंहासन हिल गया और गुलाम नारी और शूद्रों को जुल्मों से बचाने के लिए, वह खुद धरती पर आने के लिए विवश हो गया। स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ 403-406 पर लिखते हैं कि:----
                    ।।दोहा।।
जुलम होंवदे जगत में, सो ना हरि नूँ भाऊंदे।
जिन पर जुलम करे कोई, रक्षा हरि जी कराउंदे।
सलाहकार ब्राह्मण, क्रूर, जाहिल, बेदर्द मुस्लिम बादाशाहों द्वारा, भारत की जनता पर अथाह अत्याचार करवाते जा रहे थे, जो भगवान को अच्छे नहीं लग रहे थे। शूद्रों और नारी के ऊपर जो कोई अत्याचार करते हैं, उन अत्यचारियों से रक्षा खुद भगवान करवाते हैं।
                       ।।शब्द विहाग।।
जिमी आसमान कंब गए, जद ज़ुल्म होंण लगे भारे। हिन्दू ब्राह्मणा कानून वणाऐ हैं। गरीब भोलियाँ नूँ फतवे लगाए हैं। चंगे खाणे गेहूं आदि छुड़ाए हैं। जपे राम नाम जीभ नूँ कटाई है। सुणे वेद वाणी कंन सिक्का पुवाई है। किसे पाणीयां डुबोंण। खूनी हाथियों सटाऊँण। उत्ते सूलियां चढाऊँण। किसे तीर वाण चक मारे। वेखे अखर तां अखियाँ कढाऊँदे जी। गुड़ तत्ता कर सिराँ च पांऊँदे जी। तेल लाल कर कड़ाहे में सताउंदे जी। करन जग पथरां नूँ मार गुआऊँदे जी। सिर नाल हथियाराँ कटाऊंदे जी। किसे कुतियाँ जां शेरां तों  तुड़ाऊंदे जी। कई आगाँ बिच साढ़े। कुछ गुड़डां बिच काहड़े। कई जानवरी पाड़े। वेखो तरस जरा ना आवे।
स्वामी ईशरदास जी फरमाते हैं कि, जब भारत में जुल्म, तसद्दत, अत्याचार वहुत होने लगे, तब धरती और आकाश कांप उठे। हिन्दू ब्राह्मणों ने काले कानून बना कर, भोलेभाले गरीब शूद्रों के ऊपर कई प्रतिबंध लगा कर, गेहूं आदि अनाज खाने बन्द कर दिए, गन्दगी खाने पर विवश कर दिया। अगर कोई राम नाम का स्मरण कर ले, तो जीव काट देते, यदि धर्म कर्म की वाणी सुने तो कानों में भी सिक्का पिघला कर भर देते, किसी को पानी में डूबा देते, किसी को खूनी हाथी के पास फैंक देते, किसी को फांसी पर लटका देते, किसी को तीर से मार देते। कोई पढ़ने के लिए अक्षर भी देख या सुन भी ले तो उस की आंखें निकाल देते, कानों और सिर में गर्म गर्म पिघला हुआ गुड़ भर देते, गर्म गर्म लाल तेल के कड़ाहे में फैंक देते, अगर कोई यज्ञ करे तो उस में पत्थर मार मार कर बाधा डालते, हथियारों से सिर काट देते, किसी को तो खूंखार कुत्तों, शेर और चीतों  से नुचवा देते, कई तो अग्नि में जलाए जाते, कई गुड़ के साथ उबाले जाते, कई जानबरों से चीर फाड़ करवाए जाते थे, जिन को देख कर ना तो किसी को दया आती, ना ही किसी को कोई भी तरस आता था। ऐसे निर्मम और निष्ठुर लोगों को समझाने के लिए गुरु रविदास जी महाराज प्रकट हुए। स्वामी ईशरदास जी महाराज, गुरु आदि प्रकाश ग्रँथ के पृष्ठ संख्या 404-405 के ऊपर लिखते हैं कि:----
                ।। स्वामी ईशरदास।।
जे तां झूठ कहो गल नूँ पियारिया। तप करदा शंबूक नूँ सी मारिया। जग चेतानन्द जद सी कराया। दर्योधन ने कैद कर डारिया। करे जग पूजा जात दा चमारिया। ऐसा कर्म ना तूँ कर। कहना ब्राह्मणा पुकार। तूँ है जात दा चमार। चक पात्र जमना दे डारे। अजे वी किते धाड़ है। जा के वेखिया तां विच जो पहाड़ है। जूति पैरीं पाके पिंड लंघे जो चमार है। पौंदे छत्री ब्राह्मण बगाड़ है। रहे वरण अवरना नूँ ताड़ है। नादौन आछूतां दी जिंदी लाड़ी साड़ है। राजा सी नादौन। गए मत्थे नूँ टकौऊंण। जींदा चीखा में सड़ाऊँण। पिंड कूहना लैहगा हलवान दा मारे। एक राम दी अंश सदाई सभ। मन घडन्त कानून बनाए सभ  जोर वाले गरीबां नूँ दबाए सभ। इन्हां जुलमा तों गरीब सताई सभ। अरज दाते दे अगे गई सुणाई सभ। धाहाँ मार मार गल पल्ले पाई सभ। पई जुलमा दी आह सुनी बिच दरगाह। गल पास इह कहा। रव्वी नूर चों नूर आरे। दाते दुखियाँ दी सुण के पुकार जी। होया नूर चों नूर तियार जी। अंश अपणी दी लैंण आया सार जी। जिंन्हा जिंन्हा नूँ रहे दुरकार जी। ब्राह्मण छत्री तां गए हैं हंकार जी। तोड़ा उचियाँ दा मान चमार जी। दाते मेहर कराई। लिआ रूप बदलाई। मानस जनम बनाई। रविदास तां नाम रखाई।
स्वामी ईशरदास जी फरमाते हैं कि, यदि आप हमारी बात को झूठ समझते हो, तो रामायण को पढ़ लो, किस तरह, राम ने तपस्या करते हुए, महाऋषि शंबूक को, बड़ी निर्दयता से मार दिया था। महाऋषि चेतनानंद ने भी यज्ञ करवाया था, जिस के कारण राजा दुर्योधन ने भी उन्हें कैद में डाल दिया था, कि चमार ने यज्ञ क्यों किया है? ब्राह्मण ने डराते हुए उसे कहा, तुम ऐसा काम मत करो, तूँ जाति का चमार है, इसलिए उन्होंने सारे बर्तन जमना नदी में फैंक दिए थे। आज भी जा कर पहाड़ों में जा कर देखो, कई जगह मार धाड़ चल रही है, वहां चमार मनुवादियों के बेहड़े से, पांवों में जूते डाल कर जाए तो ब्राह्मण और क्षत्रियों से, शूद्रों का झगड़ा हो जाता है। आज भी सवर्ण अवर्णों को वहुत परेशान कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर के नादौन कस्बे में अछूतों की लाड़ी अर्थात नवदुल्हन को जिंदा जला दिया था, दुल्हन के सुसराल वाले, शादी के तुरंत बाद नादौन के राजा के पास चरण वंदना करवाने गए थे, मगर जब मगरूर राजा ने नवदुल्हन को लाल रंग के लंहगे में ( स्थानीय बोली में लुहाण कहते हैं ) देखा तो, वह क्रोधित हो गया और उस ने दुल्हन को जिंदा ही चीखा में जला दिया था, ये पाप कर्म गांव कूहना, तैसील नादौन, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश में किया था। हिन्दू एक तरफ तो कहते हैं, कि सभी राम की अंश हैं, फिर मनघड़ंत काले कानून भी, इन्ही लोगों ने बनाए हुए हैं। ताकतवरों ने गरीबों को, दबा कर गुलाम बनाया हुआ है, इन्हीं अत्याचारों के द्वारा गरीबों को दुखी कर रखा था। सभी दुखी गरीबों, मजलूमों और दुखियों ने भगवान के पास, विलाप कर कर, छाती पीट पीट कर, दर्दनाक अरदास की, जिसे दाता ने सुन लिया, ब्राह्मणों और राजाओँ के खिलाफ अत्याचारों की हाय उन पर पड़ गई, दरगाह में उन की हाय सुनी गई, और अत्यचारियों के गले में फंदे की डोर पड़ गई, ईश्वरीय ज्योति से ज्योति तैयार हो कर धरती पर आ गई। भगवान ने दुःखियों की पुकार सुन ली और ज्योति से ज्योति तैयार हो कर आ गई। अपने वच्चों की खबर लेने के लिए, जिन्हें ब्राह्मणवादी दुत्कार रहे थे, उनकी शुद्व लेने आप भारत भूमि पर गुरु रविदास बन कर आ गए। ब्राह्मण क्षत्रिय तो अहंकारी हो गए थे, इन सभी ऊँचे लोगों का चमार ने, घमंड और अहंकार तोड़ दिया। भगवान ने दया की, अपना मानस स्वरूप बदल लिया, तभी तो ज्योति पुंज ने, अपना नाम रविदास रखाया था।
रामसिंह आदवंशी।
अध्यक्ष।
विश्व आदधर्मी मंडल।
अक्टूबर 18, 2020।


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